राष्ट्रवाद की अलख जगाने वाले धन सिंह गुर्जर कोतवाल

dhansingh kotval

हमारे जितने भी महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी हुए वे सबके सब भारतीय स्वाधीनता और संस्कृति के ध्वजवाहक और रक्षक थे। इन महान क्रांतिकारियों में धन सिंह कोतवाल गुर्जर का नाम अग्रगण्य है। यदि यह प्रश्न किया जाए कि धन सिंह कोतवाल गुर्जर को स्वतंत्रता सेनानी और भारतीय संस्कृति का रक्षक क्यों कहा जाए ? तो हमारा मानना है कि कोतवाल साहब भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के ऐसे महान योद्धा हैं, जिन्होंने देश की स्वाधीनता और संस्कृति की रक्षा के लिए अपने अनेकों साथियों सहित अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान दिया था। उन्हें भारतीय स्वाधीनता का महान सेनानायक और संस्कृति रक्षक इसलिए भी माना जाना चाहिए कि उन्होंने पुलिस विभाग की नौकरी करते हुए अपने वास्तविक राज धर्म और राष्ट्र धर्म को पहचाना अर्थात उन्होंने किसी प्रकार की चाटुकारिता को शिरोधार्य न करके देश की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पण करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया था ।
अंग्रेजों की नौकरी करते हुए उन्हें यह पूरा विश्वास था कि उनके द्वारा क्रांतिकारी आंदोलन को आरंभ करने का परिणाम क्या होगा ? लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना क्रांति चलाने का निर्णय लिया । निश्चित रूप से उनका यह निर्णय भारतीय स्वाधीनता और संस्कृति की रक्षा के लिए लिया गया निर्णय था।

उनके इस ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय से यह स्पष्ट हो जाता है कि वह आग से बचकर निकलने वाले नहीं थे बल्कि आग में कूदने में विश्वास रखते थे। क्योंकि वह जानते थे कि इस समय आग में कूदने से ही राष्ट्र बच सकता है । उस समय आग में कूदना ही राष्ट्र धर्म था और इस राष्ट्र धर्म को पहचानना उस समय बहुत बड़े साहस की बात थी । उस साहस को नमन करना आज हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है । इसके साथ-साथ उस राष्ट्रधर्म का निर्वाह करने वाले महापुरुष को संस्कृति रक्षक, धर्म रक्षक और स्वाधीनता का पुजारी घोषित करना और करवाना भी हम सब का सामूहिक राष्ट्रीय कर्तव्य है ।
उनके इस एक निर्णय ने उन्हें राष्ट्रवादी चिंतक, राष्ट्रवादी नेता और राष्ट्रीयता का ऐसा पुंज बना दिया जो आज तक हम सबके लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
कोतवाल साहब भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद के पुजारी थे। उनके भीतर भारतीय राष्ट्रवाद और संस्कृति का अजस्र स्रोत निरंतर बहता रहता था। भारत की संस्कृति में विश्वास रखने वाला हर योद्धा यह मानता है कि भारतीय राष्ट्र धर्म और गायत्री मंत्र का गहरा संबंध है ।जिसमें कहा जाता है कि “हे परमपिता परमेश्वर ! आपका जाज्वल्यमान तेज जहाँ पापियों को रुलाता है , वहाँ अपने भक्तों, आराधकों, उपासकों के लिए आपका यह तेज आनंद प्रदाता है। ऐसे भद्र पुरुषों के लिए आपका तेज ही प्राप्त करने की एकमात्र वस्तु है। उनके ज्ञान – विज्ञान, धारणा – ध्यान की वृद्धि कर उनके सब पाप -ताप -संताप आपके तेज से नष्ट हो जाते हैं।”
गायत्री मंत्र के केवल सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अर्थ ही नहीं हैं बल्कि इसके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित करने वाले राजनीतिक ,राष्ट्रपरक अर्थ भी हैं। हमारे यहां राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है। राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माने जाने का कारण है कि वह राजा के समान न्यायकारी और तेजस्वी होकर दुष्टों, पापाचारी, अत्याचारी, उपद्रवियों, उग्रवादियों ,आतंकवादियों आदि का विनाश करेगा और जो लोग विधि के शासन में विश्वास रखते हैं उनका कल्याण करेगा। जैसे ईश्वर का जाज्वल्यमान तेज पापियों को रुलाता है वैसे ही राजा का भी तेज पापियों, उपद्रवियों, उग्रवादियों आदि को रुलाने वाला हो। वह अपने देश के लोगों की स्वाधीनता का संरक्षक हो, भक्षक नहीं । वह उनके अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाला हो, संघर्ष से भागने वाला ना हो। अपने देश के लोगों को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में ले जाने वाला हो। यहां पर अंधकार के कई अर्थ हैं। जिस देश के लोग सुख समृद्धि से वंचित होकर दरिद्रता में जा फंसते हैं या किसी भी प्रकार के दुख दारिद्र्य में जीवन व्यतीत करते हैं, उसके राजा का होना भी निरर्थक होता है । इसलिए राजा का यह परम कर्तव्य अथवा राष्ट्र धर्म होता है कि वह अपने देश के लोगों की स्वाधीनता की रक्षा के साथ साथ उनके दुख दारिद्रय को दूर करने के लिए भी सदैव जागरूक और क्रियाशील रहे।
भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का निर्माण इसी प्रकार के विचारों ने किया है। देश- काल – परिस्थिति के अनुसार कोतवाल साहब ने अपने राष्ट्र धर्म को पहचाना और उन्होंने यह निर्णय लिया कि मेरे देश पर जो अत्याचारी शासक इस समय शासन कर रहे हैं, उनका सर्वनाश करना हमारे लिए सर्वोपरि कर्तव्य है। इसी कर्तव्य से प्रेरित होकर उन्होंने हथियार उठाए और उस समय की अत्याचारी सरकार का विरोध करने के लिए मैदान में उतर आए । जब वह ऐसा कार्य कर रहे थे तब वह न केवल भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पोषण कर रहे थे बल्कि उस समय वे गीता में महाराज कृष्ण द्वारा दिए गए अत्याचारियों के विनाश करने के संदेश के साक्षात प्रतीक भी बन गए थे। इस प्रकार भारतीय तेजस्वी राष्ट्रवाद के उन्नायक के रूप में धनसिंह गुर्जर कोतवाल का स्मरण किया जाना आवश्यक है । क्योंकि वह उस तेज के पोषक, धारक और संवाहक थे जो शत्रु विनाश के लिए धारण किया जाता है। इस प्रकार गुर्जर वंश में पैदा हुआ यह वीर योद्धा गायत्री का साक्षात पुजारी बन गया था।
वैदिक संस्कृति हिंसा, घातपात, रक्तपात, मारकाट और अत्याचार की विरोधी है। यही कारण है कि भारत के राजाओं ने कभी निरपराध लोगों पर हिंसा, घातपात या रक्तपात करने में विश्वास नहीं किया। इतना अवश्य है कि भारत के राजाओं ने हिंसा, घातपात, रक्तपात और मारकाट करने वाले लोगों का न केवल विरोध किया है बल्कि उनका सफाया करने के लिए भी हर संभव प्रयास किया है । ऐसे प्रयास को ही उन्होंने अपना राष्ट्र धर्म स्वीकार किया है। वैदिक धर्म की यह स्पष्ट मान्यता रही है कि जो योद्धा अपने इस राष्ट्र धर्म से दूर भागता है ,उसे योद्धा होने का अधिकार नहीं होता।
अहिंसा को हमारे यहां पर संपूर्ण दुर्गुणों की खान माना गया है। यही कारण है कि हमारे ऋषियों ने अहिंसा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। भारत की ऋषि संस्कृति ने सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि का विधान – प्रावधान भी अहिंसा को ही मजबूती देने के लिए किया है। हमने युगों पूर्व समाज की रचना की थी और मनुष्य के लिए ऐसा विधान किया था जिससे वह समाज का एक सार्थक प्राणी होकर अपना जीवन यापन कर सके । हमने समाज को काटा नहीं, समाज में आग नहीं लगाई और समाज के जीवन मूल्यों को नष्ट करने के लिए मारकाट की किसी भी बुराई को अपने यहां पनपने नहीं दिया। हमने सबके अधिकारों की रक्षा करना अपना कर्तव्य माना। कभी भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को उचित नहीं माना। अपनी संस्कृति की इसी महानता और पवित्रता के कारण हम एक महान समाज और महान राष्ट्र की स्थापना करने में सफल हो सके। संस्कृति की इस महानता और पवित्रता की सुरक्षा और संरक्षा करना देश के प्रत्येक नागरिक ने अपना कर्तव्य माना। ऐसे में किसी धनसिंह गुर्जर कोतवाल जैसे स्वाधीनता सेनानी, संस्कृतिरक्षक योद्धा से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह संस्कृति के लिए स्पष्ट दिखने वाले खतरों से दूर भाग जाए या उनका सामना न करके पीठ फेर कर खड़ा हो जाए। यही कारण है कि जब समय आया तो अहिंसा की भारतीय महान परंपरा की रक्षा के लिए धन सिंह कोतवाल और उनके साथी हिंसा करने पर उतारू हो गए।
भारतीय संस्कृति की यह स्पष्ट मान्यता रही है कि संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए माला और भाला, संत और सिपाही, शस्त्र और शास्त्र सब एक साथ चलेंगे। यही कारण है कि अहिंसा की रक्षा के लिए हिंसक अत्याचारियों का विनाश किया जाना आवश्यक माना गया है। जहां अहिंसा की रक्षा के लिए शस्त्र, भाला और सिपाही आवश्यक हैं, वहीं संस्कृति की रक्षा के लिए शास्त्र, माला और संत आवश्यक हैं। इस प्रकार भारत धर्म क्षेत्र में सुधार करने वाले सुधारकों का जहां सम्मान करता है, वहीं राष्ट्र की रक्षा के लिए काम करने वाले योद्धाओं को भी हृदय से नमन करता है। ऐसे ही श्रद्धा और सम्मान के पात्र हैं धन सिंह कोतवाल।
हमारे श्रद्धा और सम्मान के पात्र धन सिंह कोतवाल भारतीय स्वाधीनता और संस्कृति रक्षक की अपनी पवित्र भूमिका को बड़ी सफलता और सार्थकता के साथ निर्वाह करते हुए दिखाई देते हैं । उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भी किया वह मां भारती की स्वाधीनता की रक्षा के लिए और संस्कृति की पवित्रता और महानता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अर्थात उसकी रक्षा करने के कर्तव्य भाव से प्रेरित होकर ही किया। भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और इतिहास की इन पवित्र मान्यताओं के दायरे में रखकर ही हमें अपने इतिहास के इस महानायक का मूल्यांकन करना चाहिए, न कि भारत द्वेषी इतिहासकारों की दृष्टि से ऐसा करना चाहिए।
श्रीकृष्ण जी अपने गीता उपदेश के अंत में अर्जुन को बताते हैं कि “अर्जुन ! अब तो मेरे उपदेश का अन्त ही आ गया है। अब तू इसका निचोड़ सुन ले और यह निचोड़ यही है कि तू अहंकार शून्य होकर, निष्काम होकर , निर्लिप्त और असंग होकर युद्घ के लिए तत्पर शत्रु पक्ष पर प्रबल प्रहार कर। क्योंकि ये लोग इस समय यहां पर भारत की सनातन संस्कृति के विरोधी होकर , उसके धर्म के विरोधी होकर और मानवता को तार-तार करने के उद्देश्य से प्रेरित होकर उपस्थित हुए हैं। अपनी आत्मा को पहचान, उसका बहिष्कार कर और युद्ध में भी साधु बनकर निष्काम बनकर अपने कर्त्तव्य कर्म को कर डाल। तू ‘मैं’ के भाव से ऊपर उठते यह मान ले कि ‘मैं’ कुछ नहीं कर रहा। निस्संग रहकर अपने कर्म को करने को तत्पर हो। यदि यह भावना तेरे भीतर आ गयी तो तू एक गृहस्थी होकर भी आध्यात्मिक व्यक्ति माना जाएगा। तब तू फलासक्ति से भी मुक्त हो जाएगा। उस स्थिति में तुझ पर कर्म का बंधन अपना प्रभाव नहीं डाल पाएगा।”
श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को ऐसा उपदेश देकर उसे शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध के लिए सन्नद्ध किया और हमने श्री कृष्ण जी के इस उपदेश को गीता के रूप में अपने लिए सृष्टि के शेष काल तक के लिए सुरक्षित कर लिया। गीता के इस ज्ञान को हमने खिलौना मानकर सुरक्षित नहीं किया था बल्कि इसका एक ही कारण था कि भविष्य में भी जब भारत की संस्कृति और स्वाधीनता का हरण करने वाले ‘शकुनि’ और ‘दुर्योधन’ किसी रूप में खड़े दिखाई देंगे तो हम उनका संहार भी गीता के उपदेश को अपने लिए मार्गदर्शक मान कर वैसे ही करेंगे जैसे अर्जुन ने उस समय किया था।
ऐसे में भारत के राष्ट्रधर्म को समझने के लिए हमें गीता के शाश्वत उपदेश को हमेशा याद रखना चाहिए,
जो मरे हुओं में भी जान डालने के लिए पर्याप्त है।
डा. राधाकृष्णन कहते हैं कि-”मुक्त मनुष्य अपने आपको विश्वात्मा का उपकरण बना देता है इसलिए वह जो कुछ करता है वह स्वयं नहीं करता विश्वात्मा उसके माध्यम से विश्व की व्यवस्था को बनाये रखने के लिए कर्म करता है। वह भयंकर कर्मों को भी स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों से या इच्छा के बिना करता है। केवल इसलिए कि यह उसका आदिष्ट कर्म है। यह उसका अपना कर्म नहीं भगवान का कर्म है।”
श्रीकृष्ण जी अर्जुन को यहां विश्वास का एक ऐसा ही उपकरण बन जाने की प्रेरणा दे रहे हैं, उसे समझा रहे हैं कि तू महान कार्य करने के लिए उठ तो सही, तेरा हाथ पकडऩे के लिए वह विश्वात्मा परमात्मा स्वयं प्रतीक्षारत है। वे तेरा हाथ पकड़ेंगे और जिस महान कार्य को (दुष्ट लोगों का संहार कर संसार में शान्ति स्थापित करना) तू स्वयं करना चाहता है-उसे वह स्वयं संभाल लेंगे।
सब लोगों को मारता हुआ भी नहीं मारता, यह बात आज के कानून विदों के लिए या विधि विशेषज्ञों के लिए समझ में न आने वाली एक रहस्यमयी पहेली है।
पर इसे हमारे धन सिंह गुर्जर कोतवाल जैसे महान योद्धाओं ने भारतीय स्वाधीनता और संस्कृति की रक्षा के अपने प्रण का निर्वाह करते समय पूर्णतया अपनी नजरों के सामने रखा था। उन्होंने इसे अपने लिए आदर्श बना लिया था। यही कारण रहा कि चाहे कोई मोहम्मद बिन कासिम आया या कोई सिकंदर और बाबर या अहमद शाह अब्दाली आया , हमारे वीर योद्धाओं ने सभी विदेशी आक्रमणकारियों का सभी कालों में समान वेग से और समान कर्तव्य भाव से प्रेरित होकर उसका सामना किया।
गीता ने युद्ध को उस समय धर्म युद्ध की संज्ञा दी है जब वह किन्हीं महान उद्देश्यों की रक्षा के लिए किया जाता है, जब यह देश की स्वाधीनता की रक्षा के लिए, देश के धर्म -संस्कृति और मानवता की रक्षा के लिए किया जाता है या मानवतावादी शक्तियों को प्रोत्साहित और संरक्षित करने के लिए किया जाता है, तब यह धर्म युद्ध बन जाता है। जब कोई युद्ध किन्ही के अधिकारों का हनन करने के लिए या किन्ही की संपत्ति, जमीन -जायदाद , स्त्रियों आदि को लूटने, अपमानित करने या उनका शीलहरण करने के लिए किया जाता है तो यह अधर्म प्रेरित युद्ध बन जाता है।
धन सिंह गुर्जर कोतवाल के जीवन पर यदि विचार किया जाए तो पता चलता है कि वह वैदिक धर्म के एक ऐसे महान योद्धा थे जो उसे संसार के किसी भी मत , संप्रदाय या हिंसा, रक्तपात, घातपात आदि में विश्वास रखने वाली विचारधारा के समक्ष प्राणों से प्रिय समझते थे। वह भारतीय संस्कृति की एक ऐसी मशाल थे जो हर जगह ज्ञान का प्रकाश करने में विश्वास रखती थी और संसार की उस प्रत्येक तथाकथित संस्कृति (अंग्रेजी कल्चर) का विरोध करने को अपना राष्ट्रधर्म मानती थी जो मशालों को जलाने में नहीं बल्कि बुझाने में विश्वास रखती थीं। वह भारत के पराक्रम और पौरुष के ऐसे जीते जागते उदाहरण थे जो सत्ता द्वारा पोषित और संरक्षित उग्रवाद का समूल विनाश कर देना चाहते थे और सरकारी उग्रवादियों को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानते थे।
भारतीय स्वाधीनता संग्राम और इतिहास का धन सिंह गुर्जर कोतवाल को एक महानायक इसलिए भी माना जा सकता है कि उनके विशाल व्यक्तित्व से उस समय के लाखों युवाओं ने प्रेरणा ली थी । ऐसा व्यक्ति निश्चय ही राष्ट्र नायक होता है जिसके व्यक्तित्व से लोगों के मन में बसी दुर्बलता दूर होती हो, शिथिलता और कायरता समाप्त होकर उत्साह और तेजस्विता का संचार होता हो, जिसके नाम स्मरण से हृदय से मोह समाप्त होकर प्राणों तक को राष्ट्र पर निछावर करने की भावना बलवती होती हो। हमें गर्व है कि धन सिंह गुर्जर कोतवाल जी ऐसे ही महानायकों में से एक थे।
हमें अपनी स्वाधीनता के रक्षक इतिहास के महानायकों के व्यक्तित्व का निर्धारण या मूल्यांकन करते समय भारत के राजधर्म की इसी विशिष्टता को दृष्टिगत रखना चाहिए। विदेशी इतिहासकारों और लेखकों के दृष्टिकोण से अपने इतिहासनायकों का कभी भी मूल्यांकन करने से हमें बचना चाहिए । यह कभी नहीं हो सकता कि हमारे आदर्श या हमारे लिए सर्वोत्कृष्ट बलिदान देने वाले बलिदानी या इतिहास नायकों का विदेशी शत्रु शासक या उनके चाटुकार दरबारी लेखक उनका उचित मूल्यांकन कर पाए होंगे।
इसलिए अपने इतिहास नायक धन सिंह गुर्जर कोतवाल को भारतीय स्वाधीनता संग्राम का महान रक्षक या महान सेनानी स्वीकार करके ही हमें आगे बढ़ना चाहिए।
हमें यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि हमारे देश की स्वाधीनता की लड़ाई की नींव में जिन लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी है वही वास्तविक राष्ट्रपिता हैं। क्योंकि उन्होंने कभी भी राष्ट्रपिता के सर्वोच्च सम्मान की अभिलाषा नहीं की।
बुर्जी की ईंट कभी भी नींव की ईंट की बराबरी नहीं कर सकती। इसलिए बुर्जी की ईंट को राष्ट्रपिता कहने का भ्रम हमें नहीं पालना चाहिए। जिन लोगों ने बुर्जी की ईंटों को राष्ट्रपिता कहकर सम्मानित किया है, उन्होंने बहुत सरलता से देश की रगों में विकृति का खून चढ़ा दिया है। विकृति के इस खून से ही हमारे भीतर पागलपन की वह स्थिति पैदा हुई है, जिसके चलते हम स्वाधीनता संग्राम को किसी बुर्जी की ईंट के मस्तिष्क की उपज तक मानने लगे हैं। ऐसा मानने लगे हैं कि जैसे स्वाधीनता संग्राम का इतिहास तो 50 या 60 वर्ष का है। उससे पहले तो यह देश गुलामी को सहज रूप में स्वीकार कर बैठने का अभ्यासी बन चुका था जब हम बुर्जी की ईंटों को पूजने की बजाए नींव की ईंटों को पूजने की ओर चलेंगे तो पता चलेगा कि यह संघर्ष तो उसी दिन आरंभ हो गया था, जब हमारे प्यारे भारतवर्ष की स्वाधीनता के हन्ता के रूप में विदेशी गिद्ध झपट्टा मारने लगे थे। जब ऐसी सोच हमारी बनेगी तो भारत की स्वाधीनता के हन्ता विदेशी गिद्धों का विनाश करने वाले प्रत्येक स्वाधीनता सेनानी का उचित सम्मान करना हम सीख जाएंगे और जब ऐसी स्थिति आएगी तो जो नाम सबसे पहले श्रद्धा के साथ लिया जाएगा वह नाम होगा – धन सिंह गुर्जर कोतवाल का।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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