लाल किले की प्राचीर पर किसानों ने जो भी कुछ किया वह राष्ट्रीय अपमान का प्रतीक है

नवीन कुमार पांडे

देश की राजधानी में गणतंत्र दिवस के मौके पर ऐसे दृश्य देखना हर देशवासी के लिए अपमानजनक और पीड़ादायक है। संयुक्त किसान मोर्चे ने बाद में बयान जारी करके पूरे मामले पर लीपापोती करने की कोशिश की।

72वें गणतंत्र दिवस पर राजधानी दिल्ली में किसान आंदोलन ने जो रूप दिखाया, वह किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज के लिए भयानक और शर्मनाक ही कहा जाएगा। अभी तक दिल्ली के बॉर्डरों पर शांतिपूर्ण ढंग से बैठकर सरकार से बातचीत करते किसानों के बीच कुछ असामाजिक और देशविरोधी तत्वों के घुस आने की बात काफी पहले से कही जा रही थी, लेकिन ऐसे तत्व पूरे आंदोलन को ही इस तरह हाइजैक कर लेंगे, इसका किसी को अंदाजा नहीं था। इस भरोसे की एक वजह यह भी थी कि किसान आंदोलन का नेतृत्व लगातार सार्वजनिक रूप से यह कहता आ रहा था कि सब कुछ उसके कंट्रोल में है और कोई अप्रिय घटना किसी भी स्थिति में नहीं घटित होने दी जाएगी।

यही वजह रही कि दिल्ली पुलिस ने अपनी आशंकाओं के बावजूद जरूरी शर्तें मनवाने के बाद और तमाम एहतियात बरतते हुए कुछ खास रूटों पर किसानों को ट्रैक्टर रैली निकालने की इजाजत दी। मगर हालात गणतंत्र दिवस की सुबह से ही बेकाबू होने के संकेत मिलने लगे, जब किसान नेताओं द्वारा दिल्ली पुलिस से किए गए वायदे के मुताबिक 12 बजे रैली शुरू करने के बजाय किसानों ने आठ बजे ही पुलिस बैरिकेडिंग तोड़ कर अपने ट्रैक्टर सेंट्रल दिल्ली की तरफ दौड़ा दिए। इसके बाद पुलिस द्वारा उन्हें रोकने की सारी कोशिशें नाकाम होती गईं और नियम-कानून, मान-मर्यादा की धज्जियां उड़ाते हुए किसानों की अराजक भीड़ राजधानी में उत्पात मचाती रही। और तो और, कुछ उपद्रवियों ने लाल किले में घुसकर वहां अपने संगठन का झंडा फहरा दिया।
देश की राजधानी में गणतंत्र दिवस के मौके पर ऐसे दृश्य देखना हर देशवासी के लिए अपमानजनक और पीड़ादायक है। संयुक्त किसान मोर्चे ने बाद में बयान जारी करके पूरे मामले पर लीपापोती करने की कोशिश की। उसका दावा है कि कार्यक्रम लगभग शांतिपूर्ण रहा। सिर्फ पांच फीसदी लोग ही लालकिले और आईटीओ की तरफ गए और उनमें से कुछेक ने गड़बड़ी फैलाने वाले काम किए। इस बयान का भला क्या मतलब है? एक राष्ट्रीय दिवस पर राजधानी में मचे उपद्रव के बारे में राय क्या उपद्रवियों का प्रतिशत नाप कर बनाई जाएगी? हकीकत यही है कि किसान नेतृत्व पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। सच कहें तो संयुक्त किसान मोर्चा खुद में कोई मोर्चा भी नहीं है।
ये महज छोटे-छोटे ग्रुप हैं और कथित किसान नेताओं की भूमिका किसी का मोहरा बन जाने से ज्यादा नहीं है। इन्हें कुछ भी नहीं पता। कोई अंदाजा तक इन्हें नहीं था कि आगे क्या होने वाला है। यह पूरा प्रकरण इसलिए भी अफसोसनाक है क्योंकि इसने देश में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक किसान आंदोलन की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। अब तो सरकार से यह भी नहीं कहा जा सकता कि किसान आंदोलन के नेताओं से बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाकर मामले का कोई सम्मानजनक हल निकाला जाए। बातचीत होगी भी तो किससे, जब यह साफ हो चुका है कि इन नेताओं की कोई कुछ सुनने वाला ही नहीं! सरकार आखिर भीड़ से तो बात नहीं कर सकती।

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