वैश्विक उन्नति का मापदण्ड और उसके प्रभावक पहलू

डॉ. मधुसूदन

(एक) प्रवेश:
शीर्षक देने में, कुछ कठिनाई,  अनुभव कर रहा हूँ। यदि प्रश्न उठाए जाएंगे, तो और उत्तर ढूंढने का प्रामाणिक प्रयास किया जाएगा।वैसे यह विषय एक से अधिक आलेखों के लिए उचित है।
आ.गङ्गानन्द जी के,अनुरोध पर इस आलेख में,  “पश्चिमी सभ्यता  (संस्कृति?)  के उन पहलुओं पर रोशनी डालनेका प्रयास किया हैजिन्हों ने उसे आज कीदुनिया का एजेण्डा एवम् स्वरुप निर्धारण करने की (हैसियत) योग्यता  दी है।”
(दो) उन्नति का  मापदण्ड
ये पहलु वही है, जिनके कारण,पश्चिमी सभ्यता (संस्कृति?) आज  संसार में उन्नति का  मापदण्ड निर्धारित करने की क्षमता रखती है। या जिनके कारण, संसार में महाशक्तियों का क्रम भी निर्धारित होता है।
वैसे कोई भी देश किसी दूसरे देश के समान नहीं होता। प्रत्येक देश की अपनी विशेषताएं होती है। उनके मौलिक स्रोत अलग होते हुए भी फलतः क्रमिकता (Ranking) के आधारपर उनकी तुलना की जाती है।
ऐसा प्रभाव शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, और आध्यात्मिक पहलुओं का अलग अलग मात्रा में, जोड हो सकता है। पश्चिमी सभ्यता का  प्रभाव अधिकतर भौतिक और कुछ मानसिक-बौद्धिक स्तर तक ही सीमित है। आध्यात्मिक प्रभाव निश्चित नहीं है। जो भी आध्यात्मिक प्रभाव हैवह भी छद्म प्रतीत होता हैक्यों कि उसका आधार  आर्थिक ही है।

(तीन) तटस्थ अवलोकन
इन पहलुओं को किसी संस्कृति से या देश से जोडकर देखने के पहले, तटस्थता पूर्वक देखते हैं। क्यों कि वस्तुनिष्ठ या निरपेक्ष अवलोकन, हमें सामान्य सिद्धान्त, जो प्रायः प्रस्थापित हो चुके हैं,  उनके आधार पर तुलना करने में सहायता करेंगे। वर्षों पहले, मॉर्गनथाउ की “पॉलिटिक्स अमंग नेशन्स” पाठ्य पुस्तक का अवलोकन किया था।उसके अनुसार, संसार की, साम्राज्यवादी सत्ताएं निम्नांकित तीन प्रकारों से वर्चस्व (प्रभाव)जमाने का प्रयास करती है।
(१) सैनिकी शक्ति से दास बनाकर,
(२) आर्थिक शक्ति के वर्चस्व से,
(३) सांस्कृतिक(?) या सभ्यता के बीजारोपण से प्रवेश कर।

(१) सैनिकी शक्ति के जड प्रयोग से वर्चस्व निश्चित स्थापित होता है, पर अब, असभ्य और जंगली माना जाता है।और ऐसा प्रभाव स्थायी नहीं होता, देश स्वतंत्र होने पर टिकता नहीं है।
(२) आर्थिक वर्चस्व भी धन की सहायता जब तक रहती है, तभी तक ही बना रहता है।
(३) पर सांस्कृतिक प्रवेश सूक्ष्म होता है। और देशों को दीर्घ काल तक (कभी कभी सदा के लिए भी ) प्रभावित करता रहता है। बहुत बार पीडित देश को इस प्रभाव की जानकारी तक नहीं होती।यह तीसरा सांस्कृतिक प्रभाव भारत पर आज भी सर्वोपरि प्रतीत हो रहा है। पर  इस विषय को आज छेडने का उद्देश्य नहीं है।


(
चार)आजका विषय
आज उन पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहता हूँ, जिन के कारण मेरी जानकारी में, पश्चिम को, संसार का एजेंडा एवं स्वरूप निर्धारित करने की क्षमता दी है।

(पाँच)आज की क्रमिकता।
आज की परिस्थिति में, ऐसे प्रभाव की वरीयता या क्रमिकता निम्न क्रम में मानी जाती है। इस आलेख में,  अमरिका नाम से केवल  USA.  ही समझा जाए; दक्षिण अमरिका और कनाडा छोडकर।
पहला स्थान
पहला स्थान, अमरिका का प्रायः निर्विवाद ही माना जाता था । कुछ इस स्थान को, सम्प्रति क्षति अवश्य पहुंची है। पर दूसरा कोई,  आज प्रतिस्पर्धा, करने की संभावना दिखाई नहीं देती। ऐसा स्थान प्राप्त करने के मौलिक कारण भी अनेक है।
संयुक्त राज्य अमरिका (USA) आज भी, सर्वश्रेष्ठ शक्ति  मानी जाती है, पर इस पद की सच्चाई, और  उसकी वैधता और परिणामकारकता  और उसके नेतृत्व के चिरस्थायित्व पर संसार में, कुछ संदेह  व्यक्त किया जा रहा है। इसका कारण है, उसकी संदिग्धता,  आंतरिक एवं बाह्य चुनौतियाँ।

दूसरा स्थान
चीन  का स्थान अमरिका से  अवश्य ही नीचे, माना जा रहा  है। कारण है, चीन की आर्थिक नीति, वर्धिष्णु   प्रगतिशीलता, स्पष्ट असंदिग्ध निर्णय शक्ति, जो उसके अपने  राष्ट्र के  हित में.प्रेरित है। इसके अतिरिक्त,किसी  प्रकार के अंतर्राष्ट्रीय(promises) वचनों से मुक्तता, और उसकी सतत बढती हुयी सैन्य संहारक  शक्ति भी इसका कारण है। दूसरे संसार के अन्य देश अपेक्षा करते हैं, कि, शीघ्र ही अमरिका को चीन आह्वान करेगा, और सर्वोच्च स्थान प्राप्त करेगा।

तीसरे स्थान
पर रूस, जापान,  और भारत, माने जाते हैं।
चौथे स्थान
पर  ब्रितानिया, जर्मनी, और फ़्रान्स की  गणना  की जाती है।

(छः) क्रमिकता कैसे निर्धारित होती है?
आप जानना चाहेंगे, कि, किस कारणों से इनको ऐसा क्रम दिया जाता है?  इस प्रश्न के अनेक पहलु हो सकते हैं; और ऐसी क्रमिकता सुनिश्चित करने में अनेक घटकों पर विचार किया जाता है। ऐसी  क्रमिकता भी स्थायी नहीं होती, इस लिए, समय समय पर  क्रम बदलते रहता है।
प्रत्येक देश का वैश्विक प्रभाव जो, अन्य देश आंकते हैं; उसपर ऐसा क्रम निर्धारित होता है। ऐसा प्रभाव अन्य देशों को जो सामान्यतः प्रतीत होता है, उसपर ही  निर्भर करता है। ऐसी शक्ति उस देशकी  वास्तविक है या नहीं, इसका विशेष महत्व नहीं है। पर कुछ न कुछ सामर्थ्य हुए बिना ऐसी प्रतीति भी संभव नहीं हो सकती।
कुछ पहलु निश्चित है, कि, किस देश के पास कौनसे अस्त्र शस्त्र है, अणुबम है, कितनी संख्यामें सेना है। कितना विशाल भू भाग है? किस निष्ठावाली जनसंख्या है, कितना वह देश आत्मनिर्भर है,  कितने प्रतिभा सम्पन्न विद्वान उस देश की प्रगति में शोधकार्य में लगे  हैं। ऐसे अनेक घटक हो सकते हैं।

(सात) राष्ट्र शक्ति के प्रमुख घटक
१. देश की भौगोलिक (Geography) स्थिति और उस देश की विशालता या क्षेत्रफल
२. उस की सीमा की गुणवत्ता
३. प्राकृतिक संसाधन और सम्पन्नता
४.खाद्यान्न में आत्म निर्भरता
५.औद्योगिक सामर्थ्य या क्षमताएं।
६. जनसंख्या
७.सैनिकी शक्ति
८. अमरिका के कुछ विशेष जानने योग्य पहलु
वैसे संसार में भारत, चीन, ब्राज़ील, अमरिका, रूस, इत्यादि  क्षेत्रफल में बडे देश हैं। संसार में बडे देशों को महाशक्ति की प्रबल संभावना के रूपमें देखा जाता हैं। और उनकी बात सुनी जाती है।
एक समय इंग्लैण्ड जो अनेक देशों पर राज करता था, महाशक्ति ही था। पर अब उसका क्षेत्र घट जाने से महाशक्ति की क्षमता खो बैठा है।

१. देश की भौगोलिक(Geography) स्थिति,  और उस की विशालता या क्षेत्रफल
अमरिका ने अपने मोहरों को बडी कुशलता से क्रियान्वित किया है। हवाई प्राप्त किया, अलास्का U S S R से खरिदा। उसी प्रकार प्युर्टो-रिको भी प्राप्त किया। भारत की अपेक्षा तीन गुना क्षेत्र अमरिका का है। और एक तिहाई जन संख्या, यह उसे ९ गुनी लाभकारी क्षमता देता है। उसी प्रकार,सोविएट युनियन की विशालता नेपोलियन और हिटलर को पराजित करने में बडा घटक प्रमाणित हुइ थी। उससे विपरित, इज़राएल का छोटा और मर्यादित क्षेत्रफल, उसे  असुरक्षितता का भाव देता प्रतीत होता है। U S S R के १३ टुकडे हो जाने तक रूस और अमरिका प्रति स्पर्धी माने जाते थे। पर जैसे रूस के टुकडे हुए, और उसका भू-भाग घटा, उसीके साथ उसका क्रम पहले से घटकर तीसरा हो गया।
इसी लिए बडी सत्ताएं भारत को भी छद्म रीति से घटाने में ही जुटी हुयी हो, तो अचरज नहीं।

२. देश की सीमा की गुणवत्ता
भारत भी १९४७ के पहले, बहुत ऊंचा स्थान रखता था। क्यों कि, उत्तर में हिमालय, पूर्व, पश्चिम एवं दक्षिण में समुद्र हमें रक्षण दिया करते थे। यदि पाकीस्तान और बंगला देश नहीं बनते तो भारत के लिए अंतर्राष्ट्रीय युद्ध की संभावना विशेष थी नहीं। पर हमें, हमारी चारों ओर से सुरक्षित, सीमाओं में ही दो शत्रु-देश  स्वीकार करने पडे। अब चीन भी हिमालय को पार कर सीमा पर हलचल कर रहा है।

३. प्राकृतिक संसाधन और सम्पन्नता
( Raw Materials) कच्ची सामग्री का प्राप्ति स्रोत, औद्योगिक उत्पादन के लिए और युद्ध का सूत्रपात करने के लिए आवश्यक है। कच्ची सामग्री का होना, यंत्रीकरण और तकनिकी विकास के लिए भी महत्त्व रखता है। उदा: अमरिका (USA) और रूस पेट्रोल में आत्मनिर्भर है। और चीन Rare earth ( विरल मृदा -मिट्टी )  का नियंत्रण करता है। युरेनियम भी बहुत महत्वपूर्ण हो गया है महाशक्तियों के लिए।
u s, u k, रूस, फ्रान्स, और चीन के पास युरेनियम का होना, उनकी शक्ति बढा देता है। भारत के पास भरपूर कोयला, और लोहा खानों में उपलब्ध है। पर भारत अपनी युद्धोचित कच्ची सामग्रीका उचित उपयोग करने में सफल नहीं हो पाया है।

४.खाद्यान्न में आत्म निर्भरता
खाद्यसामग्री में आत्म निर्भरता देश की शक्ति मानी जाती है। जो देश खाद्यसामग्री में आत्म निर्भर नहीं होता, वह सुरक्षितता अनुभव नहीं कर सकता। उसी प्रकार पानी में आत्मनिर्भरता भी सुरक्षितता का भाव देती है। उदाहरणार्थ: पाकीस्तान की खेती,  कुछ मात्रा में निश्चित ही, भारत से वहाँ बहती सिंधु नदी के जलपर निर्भर करती है।   ऐसी निर्भरता पाकीस्तान को असुरक्षितता का भाव देती ही होगी। भारत ही है, जो, ऐसी नदीका पानी, कारगिल जैसी छद्म लडाई के समय  भी रोकता नहीं है। वैसे, हमारी भूमि  उपजाऊ होने के कारण, और हमारी ऋतुएं वर्ष में एक से अधिक फसले दे सकती है। कहीं कहीं ३ तक फसले उपजायी जाती है। विशेष में हमारा सिन्धु- गंगा –यमुना से प्रभावित  प्रदेश बहुत उपजाऊ है।

५.औद्योगिक सामर्थ्य या क्षमताएं।
औद्योगिक उत्पादों की गुणवत्ता और क्षमता,  मनुज बल (Manpower) का तकनीकी कौशल्य, शोधकर्ताओं की संशोधन-क्षमता, प्रबंधन और व्यवस्थापन की क्षमता,
अमरिकाने, कुशल कारिगरों को, और प्रतिभाओं को, एवं विद्वानों को, ऊंचे वेतन पर लुभाकर देश की संशोधन शक्ति बढायी। अमरिका के बहुसंख्य शोध परदेश से यहाँ आकर बसे हुए विद्वानों द्वारा हुए पढा हुआ स्मरण है।
प्राथमिक शिक्षा से लेकर, एक कालेज का स्नातक शिक्षित करने तक, अमरिका को अनुमानतः $ ४००,०००( डॉलर )  का खर्च आता है। जब परदेश से सुशिक्षित को स्वीकार किया जाता है, तो अमरिका को ४ लाख डॉलर का उपहार मिलता है। यह है उसका गणित।

६. जनसंख्या
कोई देश प्रथम कक्षा की महाशक्ति नहीं बन सकता, जब तक उसके पास पर्याप्त संख्या में, प्रजाजन न हो। पर ऐसी जनसंख्या की गुणवत्ता और राष्ट्रभक्ति  भी  ऐसी राष्ट्र-शक्ति निर्धारित करने में एक बडा मह्त्व का घटक है।

७.सैनिकी शक्ति
सैनिकी शक्ति  देश की परदेश नीति होनी चाहिए।
नौसेना, वायुसेना, भूसेना और असंख्य तकनीकी पर आज की सैन्य शक्ति निर्भर करती है।
इसी विषय पर ही, पूरा अलग आलेख बन सकता है।
सेना के नेतृत्व पर, और उनकी संख्या और गुणवत्ता एवं शौर्य पर भी इस शक्तिका प्रबल आधार होता है।
साथ साथ देश की (सामरिक) रण नीति भी इसके लिए बहुत बडा योगदान दे सकती है।

८. अमरिका के कुछ विशेष जानने योग्य पहलु
अंतमें कुछ, अमरिका के  विशेष जानने योग्य पहलु लिखकर इस आलेख को समाप्त करता हूँ।
अन्य देशों की स्पर्धा के उपरांत, अमरिका संसार की ४.५ % जनसंख्या वाला देश, संसार का २२% GDP (कुल राष्ट्रीय उत्पादन) का निर्माण करता है। यह उसकी जनसंख्या से प्रायः ५ गुना है।
साथ में यह भी ध्यान रहे, कि, अपने डॉलर का ऊंचा मूल्य संरक्षित कर, यह ४.५ % की जनता, सारे संसार का ४४-४५ % प्राकृतिक संपदा का( अपनी जनसंख्या से १० गुना,  उपभोग भी करती है। और बचा हुआ ५५ % संसार के अन्य देशों के लिए छोडा जाता है।
भारत जो संसार की प्रायः १७ % की जनसंख्या रखता है, वह यदि अमरिका के जीवन स्तरपर जीना  चाहे तो उसे जनसंख्या के १० गुनी प्राकृतिक संपदा , १७० % मिलनी चाहिए।
अमरिका के  ४५ % के उपभोग  के पश्चात,  १००-४५ = ५५ % ही बचता है।
अब बची हुयी ५५ % संपदा में से १७० % लाए कहाँ से? और फिर क्या संसार के अन्य देश भी नहीं है?

अनुरोध:
मैं जानकारों से टिप्पणी की अपेक्षा रखता हूँ। मेरी जानकारी संक्षिप्त है।
उत्तर देने में विलम्ब हो सकता है।

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