जीवन में अनुकूलता पाने करें

वैचारिक तरंगों का इस्तेमाल

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

हमारा पूरा जीवन अदृश्य अनुनादों और तरंगों पर केन्दि्रत है जिनका ऊपरी तौर पर कोई संबंध नहीं दिखता लेकिन सूक्ष्म धरातल पर जाने पर अक्षर ब्रह्म, तरंगों और अनुनादों की अवधारणा को पूरी तरह स्वीेकारना ही होगा। अदृश्य तरंगों से भरी टैलीपेथी को विज्ञान भी स्वीकारता है। कभी आकस्मिक मनोवृत्तियों, कभी स्वप्न विज्ञान और कभी कुछ और माध्यमों, घटनाओं आदि से इन सूक्ष्म शक्तियों का अचूक प्रभाव स्वीकारा गया है और हम सभी लोग इनका अनुभव जीवन में हर क्षण करते रहते हैं।

हमारी अपनी अक्षमता या ग्राह्यता क्षमता में कमी से अपात्र होने की वजह से सूक्ष्म शक्तियों का मनोविज्ञान और व्यवहार हमारी समझ से परे होता है, इसका यह अर्थ नहीं है कि ये सूक्ष्म शक्तियाँ अस्तित्वहीन हैं। पंच तत्वों पर टिके संसार के साथ ही प्रत्येक जड़-चेतन में सूक्ष्म शक्तियों का अस्तित्व मौजूद है। इन्हें समझने, अनुभव तथा उपयोग करने के लिए हमें अपनी शुचिता और जीवनीशक्तियों को अपनाने की आवश्यकता है, स्थूल भावभूमि को पैनी धार देकर सूक्ष्मीय धरातल पाना जरूरी है और इसके लिए अपने भीतर वह ग्राह्यता क्षमता विकसित करने की आवश्यकता है कि ब्रह्माण्ड में कहीं भी हो रही किसी भी प्रकार की गतिविधि, जिसका हमारे भूत, भविष्य और वर्तमान से संबंध है, उनके संकेत हम तक निर्बाध रूप से पहुंचते रहें।

लेकिन इन संकेतों को पाने के लिए हमें भी अपने रिसीवर को बार-बार व्यस्त रखने की आदत से मुक्ति पानी होगी तभी उन संकेतों की पहुंच हमारे मन-मस्तिष्क तक हो पाएगी। इसके लिए दिन-रात में कई मर्तबा शून्यावस्था में रहना जरूरी है ताकि अपने से संबंधित संकेत स्वतः डाउनलोड होते रहें और हम अपने इन बॉक्स को देख कर भावी जीवन का निर्माण कर सकें, भविष्य की दिशा और दशा तय कर सकें और उन सभी खतरों से अपने आपको बचाकर रख सकें जो आने वाले हैं।

कई बार हम शंकाओं और आशंकाओं के साथ भ्रमों, दुराग्रहों व पूर्वाग्रहों से घिर जाते हैं और मन मलीनता का शिकार हो जाता है, हमारी स्थिति अन्यमनस्क हो जाती है, चिंताओं से घिर जाते हैं और यह सूझ नहीं पड़ती कि क्या करें, क्या न करें। इस अवस्था में तनाव का सीधा प्रभाव हमारे दिल और दिमाग से लेकर शरीर पर पड़ता है।

जीवन में चाहे पहाड़ जैसी समस्या सामने आ जाए, उसी क्षण कुछ मिनट की फुरसत निकालें और सहजावस्था में कहीं शांत व आरामदायक स्थान पर बैठकर आँखें बंद कर ध्यान करें तथा अपने आपको शून्य में ले जाने का प्रयास करें और कुछ देर निर्विचार हो जाएं।

यह शून्यावस्था ऎसा रामबाण साधन है जिसको अपना कर कोई भी इंसान अपनी विपदाओं, समस्याओं, तनावों और दुःखों को निर्मूल कर सकता है। जैसे कम्प्यूटर हेंग हो जाने पर रिफ्रेश की अवस्था जरूरी है उसी प्रकार मनुष्य के तन-मन-मस्तिष्क में आ जाने वाली नकारात्मकता के निवारण के लिए हमारा कुछ क्षण शून्यावस्था प्राप्त कर रिफ्रेश होना जरूरी है। एक बार ऎसा हो जाने पर सब कुछ स्वतः, ताजातरीन एवं सामान्य हो जाएगा।

इसी प्रकार जिस किसी व्यक्ति या विषय का विचार बार-बार आने से मन खिन्न होता है, अपने बारे में कोई व्यक्ति बुरा सोचता है अथवा अपनी ही किसी बात को लेकर दुःखी करने का प्रयास करता है अथवा हम स्वयं किसी बात को लेकर खिन्न मना हो जाते हैं, उस स्थिति में कुछ क्षण के लिए शून्यावस्था को प्राप्त करें।

कई बार हमें सामने वाले लोगों से परेशानी होती है कि ये अपनी कोई बात सामने न ले आए या हमें याद न करें, इस अवस्था में हमें उन लोगों की छवि, नाम और बात को अपने चित्त से पूरी तरह निकाल देनी चाहिए।  होता यह है कि हम ऎसे फालतू लोगों या बेकार की बातों का चिंतन करते हैं जो हमारे लिए दुखदायी  व तनाव देने वाली हैं। ,

इन लोगों या विषयों का हम जितनी बार चिंतन करते हैं उतनी ही बार उन लोगों या विषयों से हमारा संबंध व्योम में व्याप्त तरंगों के माध्यम से जुड़ जाता है और दोनों पिण्डों का संबंध जुड़ जाने से हमारा उनसे सीधा संपर्क हो जाता है, फिर इस संबंध के जुड़ते ही कई सारी नई चर्चाएं जन्म ले लिया करती हैं।

किसी भी सामने वाले व्यक्ति को अपने बारे में तभी याद आता है जब हम किसी न किसी रूप में उसका जिक्र करते हैं। इन सारी समस्याओं से अच्छा है कि उन विषयों या व्यक्तियों को अपने दिमाग से पूरी तरह निकाल फेंके, जिनसे हम संबंध नहीं रखना चाहते हैं।

किसी व्यक्ति या विषय की चेतना के बीज हमारे चित्त में सुप्तावस्था में पड़े होते हैं और जब भी हमें स्मरण आता है इनका सीधा संबंध लक्ष्य समूह से हो जाता है। इसलिए इन बीजों को ही कुचलकर बाहर निकाल फेंके। इससे सामने वालों से हमारा तरंगीय-संपर्क टूट जाएगा और इस अवस्था में सामने वाला भी हमें याद नहीं रख पाता।  चित्त की भावभूमि से सब कुछ हटा देने पर हमारे लिए प्रतिकूल सिद्ध होने वाला न कोई व्यक्ति हमें याद कर सकता है, न कोई विचार।  आत्म नियंत्रण की यह साधना प्रत्यक्ष और तत्काल फल देने वाली है।

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