साक्षात्कार : भारत के जीवन मूल्यों को अपनाकर ही विश्व वर्तमान महा दुख से मुक्त हो सकता है : राकेश छोकर (वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी )

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★ साक्षात्कार……….. ★ राकेश छोकर
{वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी}
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★ “आज मानव को आत्म परिष्कार की आवश्यकता”
★ बौद्धिक और आत्मिक उन्नति से महादु:ख से निपटारा संभव
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आज वैश्विक स्तर पर कोरोना जैसी वैश्विक महामारी ने संपूर्ण मानवीय साम्राज्य की चूलें हिला के रख दी हैं। मानव के कथित चेतनात्मक विकास के बाद जीवन की जिन अवांछित गतिविधियों ने दंभ भरा है, वह इस काल के अंत की ओर हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य के संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक एवं समाजसेवी राकेश छोकर से हमारे वरिष्ठ संपादक श्रीनिवास आर्य की दो टूक महत्वपूर्ण वार्ता हुई। जिस के कुछ अंश हम यहां पर पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।

प्रश्न :- छोकर जी ! वर्तमान में कोरोना जैसी महामारी से संसार बहुत ही दुखी है हस्ती खेलती सभ्यता यहां तक पहुंच गई इसे आप किस स्वरूप में लेते हैं ?

उत्तर :- देखिए , आज के संदर्भ में यह बात पूर्णतया सत्य है कि “जिओ और जीने दो के दिव्यत्व पर् वज्रपात हुआ है “- आज वैश्विक स्तर पर जो भयावह स्थिति पैदा हुई है वह वास्तव में मानवीय विकारों की देन है। मनुष्य ने कथित स्वचमत्कारिक शक्ति के बल पर प्राकृतिक व्यवस्थाओं पर कुठाराघात किया है। भौतिक शक्तियों के उपासक के रूप में आज का विज्ञान और उस विज्ञान से निर्मित यह मानव समाज नेटवर्क है जिसका परिणाम वह अपने विनाश के रूप में देख रहा है। इसी को आत्मप्रवंचना कहते हैं। इसी को आत्मविनाश का मार्ग कहते हैं। अब जो भयावह स्थिति पैदा हुई, उस स्थिति से निपटने के लिए विश्व की 7 अरब जनता में से कोई भी सक्षम नहीं है। मनुष्य ने अपना आत्मानुशासन खोकर जीवन की जानलेवा अव्यवस्थाए पनपाई हैं। वास्तव में मनुष्य ने सृष्टि की चरणबधता, नियमबद्धता के साथ उद्दंडता बरती और दिशाहीन हुआ । जिसका नतीजा सामने है। प्रकृति ने सदैव संदेश दिया है कि आत्मानुशासित होकर जियो और जीने दो। हमारे वेदों ने तो इससे बढ़कर बात कही है कि स्वयं तो उन्नति वृध्दि करो ही, दूसरों की वृद्धि में सहायक भी बनो।

प्रश्न :- जी , तो क्या आपके मुताबिक मनुष्य अपनी उद्दंडता और नियमभंगता का परिणाम भुगत रहा है ?

उत्तर :– यह शाश्वत सत्य है कि सृष्टि नियम पूर्वक चलती है। दिन-रात क्रम में होते हैं, हवा जल निरंतर बहते हैं, धूप छांव बनी रहती है और पतझड़ के बाद बसंत आती है। आज मानव ने प्रकृति के इसी स्वभाविक चरित्र को बदलने का काम किया है। यही इस महा दुख का कारण भी है। मर्यादा, नैतिकता, सदाचार भूल कर प्रतिस्पर्धा के नाम पर उद्दंडता के भाव फलीभूत किए, नतीजतन स्वार्थ की भूख में कोरोना जैसे जानलेवा वायरस को पैदा कर लिया। स्वार्थ लिप्सा की करणी से आज यह मनुष्य साम्राज्य थर थर काँप रहा है। सृष्टि नियमों के विरुद्ध यदि मनुष्य कुछ करेगा तो प्रकृति उसे छोड़ेगी नहीं।

प्रश्न :– वर्तमान दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों से मनुष्य कैसे बच सकता है ?

उत्तर :– जी सीधी सी बात है कि मनुष्य को अपने जीवन में अध्यात्मवाद और भौतिकवाद दोनों का मिश्रण करके चलना होगा । अकेला भौतिकवाद भी अक्षम्य है और निरा अध्यात्मवाद भी पलायनवाद है। दोनों के बीच का मार्ग खोज कर जीवन की गति को आगे बढ़ाना होगा । मनुष्य जीवन के सकारात्मक पहलुओं पर विचारे, प्रकृति से उत्कृष्ट सदाचार का जो अभिमंत्रण उसे मिला, उससे जीवन निर्वाह करें। अभी तत्काल अप्राकृतिक कृत्यों से दूर हटना होगा। भौतिकवाद का विकार त्याग कर अपनी जीवनशैली को प्रकृति के साथ स्वाभाविकता, सकारात्मकता प्रदत करनी होगी।

प्रश्न :- अंत में आप हमारे पाठकों के लिए संदेश रूप में क्या कहना चाहेंगे ?
उत्तर :– वास्तव में भारतीय जीवन शैली मानव के चेतनात्मक विकास की सिरमौर रही है, उसने पशुता को दिव्यत्व और देवत्व की ओर अग्रसर किया है। मानव समाज के ऊपर नियंत्रण करने वाली दो शक्तियों धर्म तंत्र और राजतंत्र को ठीक रखा है। इससे मनुष्य में अवांछनीय गतिविधियों पर नियंत्रण रहा। मनुष्य का नैतिकता के साथ विकास हुआ। आत्मिक आध्यात्मिक जनक्रांति के कारण समाज और राष्ट्र का नैतिक ह्रास नहीं हुआ। प्रकृति की शुद्ध संस्कारित जीवन व्यवस्था को नैतिकता और मूल्यों के साथ भारतीयता में जीया गया है। मानवीय मूल्यों की रक्षार्थ स्थितियां जटिल हुआ करती हैं, पर संस्कारों में निहित धीरता ,उपजी प्रतिकूलता पर हावी हुआ करती हैं।
आज दुनियावी शक्ति बनने की होड़ में जो अमानवीय कुकृत्य महाकाल के रूप में आ खड़ा हुआ है, वह नैतिक और चेतनात्मक पतन का परिणाम है। इस विपत्ति काल में वैमनस्यता, निराशा ,हताशा, दुख ,संकट , विद्रोह के साथ अशांति व्याप्त है। महा दुख की घड़ी से निपटने के लिए आज विश्व को भारतीयता की आत्मिक और बौद्धिक उन्नति को अपनाना होगा, जहां संस्कृति और प्रकृति को भोग विलास का साधन नहीं अपितु देव संपदा मान पूजा जाता है, उसे ईश्वरीय मान दिया जाता है।
मैं चाहूंगा कि भारत के लोग अपनी संस्कृति के प्राण तत्व पर चिंतन करें और उसे वैश्विक मान्यता दिलवाकर संसार के इस महादुख से पार होने का अपना दिव्य उत्तर प्रस्तुत करें।

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