सुमन, दुर्मन, अमन – मन की तीन अवस्थाएं

1.सुमन : जैसे सूर्य की किरणें मुरझाए कमल को नयी ऊर्जा देकर खिला देती हैं। ठीक इसी प्रकार जब मनुष्य का मन भगवान से जुड़ता है तो ईश्वर के दिव्य गुणों की तरंगें मनुष्य के मुरझाए मन को नयी ऊर्जा देकर उत्साह से भर देती है, जैसे चुंबक लोहे को अपनी तरंगों से अपने गुण देकर उसे भी चुंबक बना देती है। उस व्यक्ति के आचरण में दिव्य गुण अर्थात ईश्वरीय गुण भासने लगते हैं, फिर मन, मन नही रहता ‘सुमन’ हो जाता है। सत्व गुण प्रधान हो जाता है। मन सात्विकता, आर्जवता और पवित्रता से भर जाता है। यह मोटी पहचान है भगवान से जुडऩे की। भगवान कृष्ण गीता के अठारहवें अध्याय में 65वें श्लोक में कहते हैं-मन्मना भव मदभक्तो अर्थात हे पार्थ मेरे जैसे मन वाला हो जा, मेरा भक्त हो जा। जब ऐसी अवस्था आती है तो समझिए कि आपका मन ‘सुमन’ हो गया है। उस परमपिता परमात्मा के रंग में रंग गया है। उसकी कृपा का पात्र बन गया है।vijender-singh-arya
2. दुर्मन : बेशक आप जाप करते हैं, माला फेरते हैं, संध्या हवन करते हैं, किंतु आपका मन अनेक विकारों से भरा है। चालाकी और साजिश से दूसरे का हक छीनते हैं। यहां तक कि अपना स्वार्थ सिद्घ करने के लिए वीभत्स और जघन्यतम अपराध करते हैं अथवा कराते हैं तो समझिए आप भगवान से नही शैतान से जुड़े हुए हैं। तिलक छाप और माला, संध्या-हवन तो लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए छलावा है ऐसे लोग अपनी सुख सुविधा ऐशो आराम के लिए, विलासिता पूर्ण जीवन जीने के लिए दूसरों का गला घोंटते हैं, बात बात में छल कपट करते हैं। ऐसे लोगों का मन राजसिक और तामसिक प्रवृत्तियों से भरा होने के कारण ‘दुर्मन’ कहलाता है। प्राय: लोग ऐसे इंसानों को काले दिल का इंसान कहते हैं। इतना ही नही ऐसे लोगों को राक्षस और भेडिय़ा तक कहा जाता है। हो सकता है अपने किसी पूर्व जन्म के सत्कर्म के कारण वे संपन्नता का जीवन जी रहे हों किंतु आगे का जन्म अपने ही हाथों अज्ञान और अहंकार के कारण बिगाड़ रहे हैं। ऐसे लोग प्रभु कृपा से वंचित होते हैं। रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास भगवान राम की वाणी को उद्घत करते हुए कहते हैं-
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
3. अमन: जब मन प्रभु चरणों में निष्काम से लग जाए, जब मन भोग में नही, योग में आ जाए, आसक्ति में नही विरक्ति में आ जाए, माया (प्रकृति) से हटकर मायाधीश में जुड़ जाए, उसकी शरणागति के प्राप्त हो जाए तृष्णाओं को छोड़ दे और आत्मा से जुड़कर अंर्तमुखी हो जाए। उस आनंदस्वरूप आत्मा में अवस्थित होना ही समाधि कहलाता है। इसे गीता में निर्बीज और योगदर्शन में निर्विकल्प समाधि कहा गया है। इस अवस्था तक पहुंचाना कोई खाला जी का घर नही है। कोई बिरला ही यहां तक पहुंचता है। इस अवस्था तक पहुंचने पर मन चंचलता रहित और कामना रहित हो जाता है, शांत हो जाता है।
मन की इस अवस्था को ही ‘अमन’ कहते हैं। इस संदर्भ में रामचरित मानस के उत्तरकाण्ड की ये पंक्तियां कितनी प्रेरणास्पद हैं:-
सरल सुभाव न मन कुटलाई।
जथा लाभ संतोष सदाई।।
मन कब अमन होता हे? इस संदर्भ में ईश्वर भक्त सहजोबाई की ये पंक्तियां भी हृदयस्पर्शी हैं:-
जो सोवे सो शून्य में,
जागे सो हरिनाम।
बोले सोहै हरि कथा,
भक्ति करे नि:काम।।

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