भाषा पौरूषेय नही अपौरूषेय है

संस्कृत के विषय में ये सर्वमान्य और सर्वग्राह्य तथ्य है कि संस्कृत विश्व की सर्वाधिक प्राचीन भाषा है। इसीलिए हमारे भारतीय मत के अनुसार संस्कृत मनुष्य की ईश्वर प्रदत्त भाषा है। यही कारण है कि संस्कृत को देव भाषा भी कहा जाता है। पश्चिमी जगत के कई विद्वान भी भारत की इस देवभाषा के विषय में इसी मान्यता के रहे हैं और तेजी से इसी मत के होते जा रहे हैं कि संस्कृत एक देव भाषा है जिसे सृष्टि प्रारंभ में ईश्वर ने ही मनुष्य को दिया।mtnl-multi-lingual

विश्व के स्वनामधन्य विद्वान भी भाषा के विषय में कोई स्पष्ट और सर्वमान्य परिभाषा नही दे पाए हैं। इसका कारण यही है कि मानव इतिहास के विषय में उनका ज्ञान अपूर्ण है। इसलिए उनके चिंतन में यह बात प्रारंभ से ही रहती है कि विश्व में प्रारंभ से ही मानव समाज के लिए बहुत सी भाषाएं रही हैं। ये लोग नही समझ पाते कि कौवे और कोयल, बंदर और भालू की समस्त भूमंडल पर एक जैसी ही अपनी भाषा है।  भारतीय कौवा जैसी कर्कश भाषा निकालता है वैसी ही वह विश्व में अन्य स्थानों पर निकालता है, ऐसा नही है कि भारत में तो उसकी भाषा कर्कश हो और रूस में जाकर वह कोयल की सी मीठी तान सुनाने लगे अत: जब अन्य जीवधारियों के साथ ऐसा है कि वे अपनी भावभिव्यक्ति को विश्व में हर स्थान पर एक ही ढंग से व्यक्त करते हैं तो मनुष्य के साथ ऐसा क्यों हो सकता है कि वो हर देश और हर प्रांत और कभी कभी तो हर जिले में भी अपनी भावाभिव्यक्ति को विभिन्न रूपों में प्रकट करे। सिद्घ हुआ कि मनुष्य की भाषा एक ही होनी चाहिए।

विद्वानों की परिभाषाएं अस्पष्ट

भाषा की परिभाषा करते हुए प्रसिद्घ दार्शनिक प्लेटो ने अपने ग्रंथ सोफिस्ट में कहा है-भाषा और विचार में बहुत ही कम भेद है। प्लेटो का मानना था कि ‘आत्मा की अव्यक्त’ ध्वनि रहित और मौन बातचीत ही विचार है। उनके अनुसार आत्मा के ये अव्यक्त और अमूर्त भाव जब ध्वनियों से युक्त होकर होठों पर व्यक्त (प्रकट) होते हैं, तो तब उसे भाषा की उपाधि से महिमामंडत किया जाता है। मि. स्वीट का कहना है कि ध्वनि युक्त शब्दों के माध्यम से विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है।

विन्द्रेज का कथन है कि मानव समाज अपनी बात को प्रतीकात्मक या सांकेतिक शैली में कहने का प्रयास करता है और शनै: शनै: ये सांकेतिक शैली भाषा का रूप ले लेती है। विद्रेज ऐसी सांकेतिक शैली को नेत्र ग्राहय, श्रोत्र ग्राह्य और स्पर्श ग्राहय नामक तीन विभागों में विभक्त करते हैं।

नेत्रग्राहय में वह बताते हैं कि जैसे किसी हो हल्ला करने वाले बच्चे को उसका अभिभावक आंखें तरेर कर या नासिका की सीध में मुंह के ऊपर एक उंगली रखकर शांत करने का संकेत करता है और आंखों से संकेत देता है कि बोलना नही है, तो बच्चा उस संकेत को उसी रूप में समझ लेता है। यह नेत्रग्राहय प्रतीक है। इसी प्रकार स्पर्श ग्राहय में प्रेमी प्रेमिका परस्पर स्पर्श के माध्यम से अपने संकेतों से एक दूसरे को अपने मन की बात समझा देते हैं। जबकि कानों में आने वाले किसी संगीत की स्वर लहरियां भी व्यक्ति को मस्ती में डुबा देती हैं। कानों के माध्यम से हम शब्दों को सुनते हें और तदानुसार अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए सावधान या सचेष्ट होते हैं।

इनमें दोष क्या है

इन परिभाषाओं में भारी दोष है। प्लेटो भाषा और विचार में बहुत कम भेद मानते हैं। इसी परिभाषा पर विचार करते हुए हमें सोचना चाहिए कि विचार वहीं उतपन्न होता है जहां भाषा होती है। भाषा से पहले विचार नही है, अपितु विचार से पहले भाषा है। विचारों की अभिव्यक्ति भाषा से होती है तो इतने मात्र से ही भाषा दूसरे स्थान पर नही चली जाती है। अपितु विचारणीय बात ये है कि अभिव्यक्ति होने वाले विचारों को एक व्यवस्थित स्वरूप भाषा ही प्रदान करती है। भाषा भाव दे रही है और भाव विचार को स्पष्ट और सुव्यवस्थित कर रहे हैं। मनुष्य मननशील है इसीलिए वेद ने उसे मनुष्य शब्द से महिमामंडित किया है। किसी अन्य जीवधारी को तो ये उपाधि देकर महिमामंडित नही किया गया है। इसी से स्पष्ट हो जाता है कि अन्य जीवधारी मननशील नही हैं। इसीलिए उनकी भाषा भी कोई नही है। अन्य जीवधारी भय, मैथुन, नींद और आहार की अपनी नैसर्गिक ज्ञान संबंधी क्रियाओं का संपादन स्वाभाविक रूप से करते हैँ और इसीलिए अपने किये गये किसी कार्य के परिणाम पर न तो सोचते या विचारते हैं और न ही परिणाम को लेकर कभी चिंतन करते हैं। इसलिए उनके संसार में सब कुछ एक ढर्रे से में ढलकर होता चलता है। परंतु मनुष्य को ईश्वर ने भाषा का ज्ञान दिया तो उसे बताया कि तू आहार, निंद्रा भय और मैथुन से आगे भी सोचेगा और समझेगा, क्योंकि तू सारे प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है। इसलिए कर्म भी कर और कर्म के भोगों को भी भोग। अब जो स्वयं मननशील है वही-विचारशील होता है और वही विवेकशील (समझदार) होता है। कहा जाता है कि समझदार के लिए इशारा (संकेत) ही काफी होता है। इससे स्पष्ट होता है कि समझदार के लिए ही इशारा किया जाता है। बालक स्वभावत: आपके उस संकेत को नही समझता जिसे आप आंखें तरेरकर उसे शांत रहने के लिए करते हैं, बल्कि वह आपके उस संकेत के बार बार दोहराए जाने से यह समझता है कि उसे क्या समझाया जा रहा है?आंखें तरेरने का अर्थ उसे आपकी भाषा ही समझाती है-जिसे आप उसे उसकी पहली शरारत पर समझाते हैँ कि जब मैं आंखें तरेर रहा था तो भी तूने शरारत जारी क्यों रखी? इसलिए बच्चा अपनी अगली शरारत पर स्वयं को आपके साथ समायोजित कर लेता है और जैसे ही आप आंखें तरेरते हैं तो वह शांत हो जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि सांकेतिक भाषा को भी व्यक्ति की स्वाभाविक भाषा ही सही स्वरूप प्रदान करती है। बच्चे को आंखें तरेर कर शांत करने की इस प्रकार की संकेत शैली के विषय में यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि विश्व के सब देशों में यह समान नही होती है। इसी प्रकार के अन्य संकेत भी हर स्थान पर एक जैसे नही होते हैं। जिस जिस प्रकार से जहां जहां लोगों को अपने अपने ढंग से आचार्य लोग या उनके अभिभावक बताते या शिक्षा देते हैं वहां वहां उसी प्रकार से अलग अलग संकेत एक ही बात को समझाने के बन जाते हैं।

अत: ये भाषा के विषय में प्रतीकात्मक चिन्हों की बात बेमानी है। आत्मा की अव्यक्त ध्वनि को भीतर ही भीतर समझना और उसे एक विचार के रूप में व्यक्त करने की ऊपरिलिखित विद्वानों की बात पर भी चिंतन करने की आवश्यकता है कि आत्मा की मौन बातचीत भी किसी भाषा में ही होती है। इसलिए वह भाषा खोजी जाए जो सभी मानवों के लिए एक जैसी हो और विश्व के हर मानव को जिसकी आत्मा सहज रूप में स्वीकार करे।

एक ध्वनि पर सबकी सहमति

ऊं की एकाक्षरी ध्वनि पर विश्व के अधिकांश विद्वानों की सहमति है कि यह ध्वनि सारे मानव समाज को एकसूत्र में पिरोती है और मनुष्य की कितनी ही व्याधियों तनावों और चिंताओं को ‘प्रणव जाप’ (ओउम नाम का जप) समाप्त करता है। हर व्यक्ति की आत्मा में इस एकाक्षरी ध्वनि के साथ तारतम्य होते ही एक अनोखी आनन्दानुभूति होती है और हर व्यक्ति उस आनन्दानुभूति का केवल अनुभव कर सकता है उसे वर्णित नही कर सकता। इस उदाहरण से तो यही सिद्घ होता है कि आत्मा की मूक बातचीत को भी केवल अनुभव ही किया जा सकता है उसे वास्तविक रूप में व्यक्त नही किया जा सकता। स्थूल विचारों को स्थूल भाषा रूप देती है। लेकिन एक अवस्था ऐसी आती है कि जहां जाकर भाषा ही मौन हो जाती है। भाषा की उस मौन अवस्था को कैसे व्यक्त किया जाएगा, क्या पश्चिमी जगत का कोई वैज्ञानिक या भाषाविद आत्मा की भाषा की इस मौन अवस्था का उल्लेख कर सकता है? संभवत: नही और कदापि नही।

इस ओउम एकाक्षर को विश्व की अन्य भाषाओं में भी आमीन,ओमिनी जैसे शब्दों से स्वीकार किया गया है। इस प्रकार संस्कृत के मूल शब्द का स्वरूप परिवर्तन किया गया है और उसकी प्राधान्यता पर सबने अपनी स्वीकृति प्रदान की है।

भाषा अपौरूषेय है

ओउम की सर्वत्र व्याप्ति और उस पर सबकी सहमति और स्वीकृति के दृष्टिगत विभिन्न विद्वानों ने ये माना है कि वेद ईश्वरीय वाणी है। इसीलिए हर मंत्र के आदि में ओउम का उच्चारण किया जाता है। जिससे कि पाठक ओउम के साथ प्रतिक्षण और प्रतिपल तादात्म्य स्थापित किये रखे। वेद ईश्वरीय वाणी होने के कारण अपौरूषेय माने गये हैं। अत: हमारा मानना है कि भाषा भी व्यक्ति द्वारा निर्मित नही है, अपितु यह भी अपौरूषेय है। यदि भाषा को पौरूषेय माना जाएगा तो सारे ज्ञान विज्ञान पर व्यक्ति का एकाधिकार हो जाएगा साथ ही ज्ञान विज्ञान की अपरिमितता भी परिमित और सीमित हो जाएगी। ज्ञान विज्ञान की अनंतता इसलिए है कि वह ईश्वर प्रदत्त है। क्योंकि असीमित का ज्ञान विज्ञान भी असीमित ही होता है। व्यक्ति की सोच और उसके दृष्टिकोण की सीमाएं हैं। तब उसके ज्ञान विज्ञान की सीमा भी निश्चित हो जाएगी। लेकिन हम देखते हैं कि विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में नित नये नये आविष्कार और नई नई खोजें हो रही हैं। ये इसीलिए संभव है कि व्यक्ति अपनी सीमित ज्ञान विज्ञान की सीमाओं को तोड़कर जितना जितना अपने मेधाबल को ईश्वर के ज्ञान विज्ञान के साथ स्थापित करने में सफल होता जा रहा है उतना उतना ही वह नित नये नये आविष्कार और खोज करता जा रहा है। इसलिए भाषा को मनुष्य ने नही बनाया, अपितु ईश्वर प्रदत्त भाषा संस्कृत को अपने अंत:करण में वेदज्ञान के माध्यम से संचित किया और फिर कालांतर में लिपि के माध्यम से वेद ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए लिपि का आविष्कार किया। लिपि का आविष्कार ही आधुनिक भाषाविदों ने भाषा का आविष्कार माना है। जबकि यह मान्यता दोषपूर्ण है। भाषा तो तब भी थी जब लिपि नही थी, लेकिन मनुष्य की दुर्बलता ये थी कि वह ईश्वरीय वाणी वेदज्ञान को अगली पीढिय़ों में अक्षुण्ण रूप से यथावत देने में असफल होता जा रहा था। इसलिए कुछ लोगों के लिए वेद ज्ञान को लिपिबद्घ कर पढ़ाने समझाने की आवश्यकता हुई। तब भाषा के लिए अक्षरों की खोज का उदभव प्रारंभ हुआ। भारत के भाषा उत्पत्ति के इस दैवीय सिद्घांत को समझाने और मनवाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर की  संगोष्ठियों का आयोजन कराया जाना आवश्यक है, ताकि एक सिद्घांत प्रतिपादित हो सके और उस सिद्घांत को संपूर्ण विश्व में एकमत से मानने मनवाने का अनुकूल परिवेश सृजित किया जा सके।

अभी तक जितने मत भाषा उत्पत्ति को लेकर लाये गये हैं वो सभी अपूर्ण और अतार्किक हैं इनमें प्रमुख मत निम्न प्रकार है-

1 अनुकरणात्मक सिद्घांत -इस सिद्घांत के प्रतिपादक विद्वानों का मानना है कि अपने आसपास के जीवों के अनुकरण के आधार पर भाषा की उत्पत्ति होती है। अनुकरण से इन लोगों का अभिप्राय है कि कांव कांव की ध्वनि के आधार पर काक, कुकू करने के कारण कोकिल आदि शब्द बने हैं लेकिन बात वही है कि कांव कांव और कूकू को समझने के लिए भी पहले भाषा चाहिए। इससे भाषा की उत्पत्ति नही होती अपितु उत्पन्न हुई भाषा से ये बातें या ये संकेत समझे जाते हैं।

2. मनोभावाभिव्यक्ति सिद्घांत-इसे आवेश सिद्घांत या इंटरजक्शन थ्योरी भी कहा जाता है। मैक्समूलर ने इसे पूहू-पूहू सिद्घांत भी कहा है। यह सिद्घांत विचार प्रधानता की अपेक्षा भाव प्रधानता पर अधिक बल देता है। आह, वाह, हुर्रा, ओह, इत्यादि ध्वनियां अनायास ही प्रकट हो जती हैं। कहा जाता है कि इन्हीं ध्वनियों से धीरे धीरे भाषा का विकास हुआ। परंतु संक्षेप में यही कहा जाएगा कि भाषा उत्पत्ति का यह सिद्घांत भी अतार्किक है और सत्य को असत्य के ढेर में छिपाने का एक बचकाना प्रयास है।

3.यो होन्हो सिद्घांत-इस सिद्घांत में बताया गया है कि श्रम करते करते मनुष्य की सांस तेज हो जाती है और मनुष्य के मुंह से अनायास ही कुछ ध्वनियां निकलती हैं। जैसे धोबी कपड़ा धोते समय एक ध्वनि करता है। इस मत के प्रतिपादकों का तर्क है कि ऐसी ध्वनियां ही धीरे धीरे भाषा को जन्म देती हैं।

4. धातु सिद्घांत-इस सिद्घांत के अनुसार संसार की प्रत्येक वस्तु अपनी एक अलग ध्वनि रखती है। सोने पर चोट करने से अलग ध्वनि निकलती है जबकि लोहे पर चोट करने से अलग ध्वनि निकलती है। यही दशा प्रारंभ में मनुष्यों की थी। मनुष्य प्रारंभ में जिस वस्तु के संपर्क में आता था उसी के लिए एक शब्द निकालता था और धीरे धीरे उन्हीं शब्दों के संकलन से भाषा का विकास हो गया।

 अधिक कुछ ना कहकर इस सिद्घांत के लिए भी यही कहा जाएगा कि ये सिद्घांत भी काल्पनिक और अतार्किक ही है। हर ध्वनि को एक शब्द मानना और फिर उसे जो माना गया है उसी रूप में स्मृति कोष में स्मरण रखना बिना भाषा और लिपि के संभव नही है।

 भाषा का विकासवादी सिद्घांत-इस मत के जनक स्वीट महोदय हैं। उनका कहना है कि प्रारंभ में मनुष्य हाथ के संकेत पर ही भावों को ग्रहण कर लेता था, और उसके आधार पर अपने विचारों को व्यक्त भी कर देता था, पर धीरे धीरे शब्दों के बढऩे पर इस प्रकार के संकेतों का अभाव हो गया और धीरे धीरे काल, क्रिया तथा लिंगों का जनम हुआ।

स्वीट का मानना है कि धीरे धीरे भाषा का विकास हुआ। उनका यह तर्क संस्कृत से भिन्न संसार की अन्य भाषाओ के विकास के संबंध में तो सहायक हो सकता है,परंतु प्रश्न संसार की अन्य भाषाओं के विकास का नहीं है,अपितु मनुष्य की प्रारम्भिक और स्वाभाविक भाषा का है कि पहले पहल भाषा का विकास कैसे संभव हुआ? देशों की भाषाओ ने अपना विकास स्वीट महोदय के विकासवादी सिद्धान्त के अनुसार कर लिया हो,यह तो संभव है,परंतु मनुष्य की भाषा का आदिकाल में कैसे विकास हुआ-यह बात तो अनसुलझी ही रह जाती है।

तब भाषा उत्पत्ति के दैवीय सिद्धान्त के भारतीय मत की पुष्टि करना ही उचित जान पड़ता है कि संस्कृत विश्व की एकमात्र भाषा है। यह विश्व की ही नहीं अपितु ब्रह्मांड की भाषा है और इसीलिए ये भाषा अपौरुषेय है।भाषा संबन्धी इसी मत के कारण वेदो को भी अपौरुषेय माना गया है।इसी मत की पुष्टि या अनुकरण करते हुए विश्व के अन्य सम्प्रदायो के धर्म ग्रन्थों को भी वेदो की भांति अपौरुषेय बताने या सिद्ध करने का प्रयास किया गया।वेद ईश्वर की भाषा ईश्वरप्रदत्त भाषा में सृष्टि के प्रारम्भ में अग्नि,वायु,आदित्य और अंगिरा नामक ऋषियों के अन्तःकरण में प्रकाशित हुए तो बाइबल आदि धर्म ग्रंथो की भाषा को भी उसी प्रकार देव भाषा सिद्ध करने का प्रयास किया गया जिससे कि उन धर्म ग्रंथो का महिमा मंडन भी वेद अनुरूप हो सके।अनुकरण करने का यह प्रयास यदि उचित है तो फिर यह भी सोचना चाहिए कि मनुष्य के सभी धर्म ग्रन्थों में जो सर्वाधिक प्राचीन हो वही उसका वास्तविक धर्म ग्रंथ है और उस धर्म ग्रंथ की भाषा ही मानव की वास्तविक और स्वाभाविक भाषा है।गुत्थी तो सुलझी पड़ी है लेकिन कुतर्को से बलात उसे उलझाया जा रहा है ।

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