राजस्थान के सवाई माधोपुर में होली के पर्व पर एक ही परिवार के पांच सदस्यों ने जहरीला मादक पदार्थ खाकर आत्महत्या कर ली। इस परिवार का मानना था कि शिव जी इस मादक पदार्थ से प्रसन्न होकर हमारे घर आएंगे और हमारी जान बचा लेंगे। लेकिन शिव तो नही आए, हां यमदूत अवश्य आ गये और एक अंधविश्वास के कारण हमारे बीच से एक खाता-पीता और हंसता-खेलता परिवार सदा के लिए चला गया। दूसरी बात इसी परिप्रेक्ष्य में ये है कि एक दैनिक समाचार पत्र जो अपने आपको सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला समाचार पत्र कहता है, ने होली के अवसर पर एक अपना शीर्षक बनाया कि प्रहलाद के विश्वास की एक बार फिर हुई जीतsoc-kanwarias
अध्ययन के अभाव में कलम के सिपाही केवल तात्कालिक लाभ उठाने के लिए क्वालिटी की घोर उपेक्षा कर देश का भला नही कर पा रहे हैं। गतानुगतिक (भेड़चाल) चक्र पर मोहर लगाना और उसी के साथ स्वयं को ढालना बड़ा आसान है, इससे तात्कालिक लाभ तो मिल सकता है, लेकिन दूरगामी लाभ तो विपरीत ही आते हैं। समाचार पत्रों में परमविद्वानों के माध्यम से पर्वों की वैज्ञानिकता और तार्किकता पर चर्चाएं आनी चाहिए और पर्वों के वास्तविक कारणों को स्पष्ट करना चाहिए। इससे प्रचलित रूढि़वादी सोच पर जहां अंकुश लगता है वहीं सच अपने समुचित स्थान पर महिमामंडित भी होता है। विद्वानों का कार्य सत्य का महिमामंडन ही होना चाहिए। इससे किसी की धार्मिक आस्था पर चोट का प्रश्न ही पैदा नही होता है, अपितु धार्मिक आस्था सांस्कृतिक आस्था के साथ एकीभूत हो जाती है। इसलिए समाचार पत्रों को या समाचार माध्यमों को चाहिए कि वे ऐसी चर्चाएं प्रसारित करें जो सत्य के अधिक निकट हों। होलिका दहन की प्रक्रिया हमारे देश में प्राचीन काल में रचे जाने वाले सामूहिक यज्ञों की एक टूटी फूटी कहानी का ध्वंसावशेष है। इस ध्वंसावशेष पर संस्कृति का रूदन हो रहा है। अपनी अपनी दृष्टि और अपना अपना दृष्टिकोण है-कुछ लोग हैं कि जो इस रूदन पर आत्मकुण्ठा से व्यथित हैं तो कुछ लोग हैं जो सच को जानकर भी स्वार्थवश आत्मप्रवंचना से ग्रस्त हैं। अध्ययनशील लोग भी यदि सच का महिमामण्डन करने से बचते हैं और विद्या के प्रकाश में सहायक न होकर तटस्थ भाव बरत रहे हैं-तो उनकी ये तटस्थता भी आपराधिक है। क्योंकि उनकी आपराधिक तटस्थता के कारण ही देश में हमारे सांस्कृतिक पर्वों के प्रति उदासीनता तथा विदेशी पर्वों (वेंलेंटाइन डे, मदर्स-डे इत्यादि) के प्रति लगाव बढ़ता जा रहा है। प्रहलाद प्रभुभक्त रहे होंगे उनका यह स्वरूप स्मरणीय है, लेकिन उनकी बुआ होलिका के कारण होली का दहन होना आरंभ हुआ, यह बात गलत है। पर जब इन गलतियों को एक दैनिक समाचार पत्र दोहराता है तो लोगों पर उस गलत का अनुकरण करने और उसे ही सच मानने का मनोवैज्ञानिक दबाव बनता है। इससे असत्य का खण्डन न होकर उसका मण्डन हो जाता है। क्योंकि जनता स्वभावत: बड़ों का अनुकरण करती है और जब वह किसी पुस्तक में, या किसी विद्वान के किसी लेख में या किसी स्थान पर किसी विद्वान के प्रवचन में कोई प्रसंग किसी प्रकार का कहीं सुनती या पढ़ती है तो वह उसे ही सच मानकर चल देती है। इसलिए बड़ी श्रद्घा से कलम के धर्म का पालन करना चाहिए।
सवाई माधोपुर में पांच लोग अंधविश्वास का शिकार हुए तो इसमें उनका दोष कम है और उस व्यक्ति का अधिक है जिसकी कलम ने अपना धर्म बेचकर असत्य का कहीं न कहीं महिमामण्डन किया होगा और उन्हें समझाया होगा कि अमुक अमुक ढंग से शिव का आवाहन करने पर या अमुक पर्व पर अमुक मादक द्रव्य का सेवन करने से शिवजी प्रसन्न होते हैं और साक्षात दर्शन देते हैं। यदि वह कलम ऐसा न लिखकर किसी भी पर्व पर या अवसर पर मादक द्रव्यों के सेवन को अपराध सिद्घ करती और किसी भी देवता के लिए लिखती कि वे मादक द्रव्यों का सेवन करने वाले लोगों से सदा दूर रहते हैं और ऐसे नरपिशाचों पर दैवीय कृपा (शक्तियां) कभी नही हो सकती तो हमारे बीच से उठने वाली पांच अनमोल जानें ऐसे कभी नही जातीं जैसे चली गयी हैं।
कठिन से सरल की ओर जाना आसान है, जबकि सरल से कठिन की ओर बढऩा कठिन है। मानव सरल की ओर भागता है और स्वार्थसिद्घि के कठिन मार्ग से पीठ फेर लेता है। ऐसी ही सोच अधिकतर समाचार पत्रों की हो गयी है जो विचारात्मक सामग्री कम और नकारात्मक (लूट, हत्या, डकैती, बलात्कार और अंधविश्वासों को पुख्ता करने वाले किस्से कहानियों) विचारों को अधिक फैला रहे हैं। भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए तनिक सोचा जाए कि हम अपने भारत की कैसी तस्वीर पेश कर रहे हैं और कैसा भारत बना रहे हैं, ईमानदारी से खोजे गये उत्तर से ही भारत का भला होगा।

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