आगामी 13 अप्रैल 2020 को बैसाखी पर्व पर : बैसाखी पर्व जलियांवाला बाग नरसंहार की दुखद घटना का स्मरण कराता है

ओ३म्

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आर्यों को परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में चार वेदों का ज्ञान दिया था। अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न चार ऋषि व स्त्री-पुरुष विश्व के सभी मनुष्यों व मत-मतान्तरों के आचार्यों व अनुयायियों के पूर्वज थे जिन्हें अधिकांश मत व विश्व के लोग विस्मिृत कर चुके हैं। वेद व ऋषियों से ही हमें काल गणना करने के लिये बारह महीने मिले हैं जिनका आरम्भ चैत्र शुक्ल पक्ष से तथा समाप्ति चैत्र कृष्ण पक्ष की अमावस्या को होती है। वैसाख चैत्र के बाद दूसरा महीना होता है। यूं तो सृष्टि में ईश्वर के बनाये प्रत्येक दिन व प्रत्येक क्षण का महत्व है परन्तु कुछ दिन व घटनायें अविस्मरणीय होती हैं। इनको स्मरण कर इनसे शिक्षा लेने से हम भविष्य में उस प्रकार की दुर्घटनाओं से बच सकते हैं। उनकी अवहेलना करना व उन पर उचित ध्यान न देना वैसी दुर्घटनाओं व उससे भी बड़ी विडम्बनाओं को आमंत्रित करना होता है। वैसाख के महीने में ऋतु वा मौसम अच्छा व सुहावना होता है। इस महीने में न शीत होता है और न ही अधिक ग्रीष्म का प्रभाव। यह ऋतु स्वास्थ्य की उन्नति के लिये भी अच्छी मानी जा सकती है। इसमें हम अपने धार्मिक व सामाजिक कर्तव्यों की पूर्ति कर अपने शुभ कर्मों से भावी प्रारब्ध का निर्माण कर सकते हैं।

ऋषि दयानन्द के जीवन पर दृष्टि डालते हैं तो उन्होंने शिवरात्रि के व्रत के दिन बोध होने पर अपने जीवन का एक-एक क्षण अपने जीवन के उद्देश्य को जानने व लक्ष्य की प्राप्ति पर केन्द्रित रखा और अन्ततः उसे प्राप्त किया। उन्होंने न केवल अपने जीवन का ही कल्याण किया अपितु सृष्टि के प्रत्येक मनुष्य के जीवन व आत्मा को ईश्वर से मिलाने, उन्हें आत्म-साक्षात्कार और ईश्वर-साक्षात्कार कराने का प्रयत्न किया। उन्हीं की कृपा व दया से आज वैदिक धर्म एवं संस्कृति रक्षित है। यदि वह न आते और वेद धर्म एवं संस्कृति की रक्षा के उपाय न करते, वेद प्रचार व सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों की रचना सहित विपक्षियों से शास्त्रार्थएवं आर्यसमाज की स्थापना न करते तो ईश्वर द्वारा सृष्टि के आरम्भ में हमारे पूर्वज ऋषियों को प्रदान किया हुआ हमारा प्रिय अमूल्य वेदज्ञान हमें सुलभ न हो पाता। हम विचार करते हैं तो पाते हैं कि महाभारत के बाद तथा ऋषि दयानन्द द्वारा वेद प्रचार आरम्भ करने के बीच के समय में सारा विश्व वेदज्ञान सहित ईश्वर व जीवात्मा के यथार्थ ज्ञान से प्रायः अपरिवित व अनभिज्ञ था। ऋषि दयानन्द की कृपा से उनके समकालीन लोगों को वेद ज्ञान व सत्यधर्म का ज्ञान प्राप्त हुआ और उसके बाद उनके शिष्यों के पुरुषार्थ, प्रचार व ग्रन्थ लेखन से पूरे देश व विश्व के लोग लाभान्वित हुए। जो लोग वेद से अनभिज्ञ हैं यह उनका दुर्भाग्य है। यदि वह पुरुषार्थ करें तो वह वेदज्ञान को प्राप्त हो सकते हैं। वेदज्ञान को जानने व प्राप्त करने का मुख्य उपाय सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन है जो आज विश्व की अनेक भाषाओं में उपलब्ध होता है। इस ग्रन्थ को हम पीडीएफ द्वारा भी देश देशान्तर में प्रेषित कर सकते हैं। हम समझते हैं कि यह ऋषि दयानन्द की अपनी देन तो है ही, इसके साथ ही यह ईश्वर की भी सभी मनुष्यों को महती कृपा है। आश्चर्य है कि लोग सुख भोग व लोभों में डूबे व फंसे हुए हैं और वेदज्ञान की उपेक्षा कर अपने जन्म व मरण तथा भविष्य को बिगाड़ रहे हैं।

बैसाखी का माह रबी की फसल की कटाई का होता है। किसान अपने खेतों में फसल की कटाई करते हैं और फसल यदि अच्छी होती है तो वह अपने व्यवहार से प्रसन्नता व्यक्त करते हैं। पर्व मनाने का कारण ईश्वर का धन्यवाद करने के साथ सुख व समृद्धि की प्राप्ति होता है। अन्न की प्राप्ति से अपनी प्रसन्नता को प्रकट करने के लिये ही वैशाखी पर्व पर किसान व अन्य सभी लोग नाना प्रकार के उत्सव करते हैं जिनमें से होली भी एक पर्व है। मध्यकाल में वैदिक धर्म की श्रेष्ठ परम्परायें विकिृतियों को प्राप्त हुईं थी। ऐसे समय में हिन्दू जनता इस पर्व को गंगा स्नान आदि के रूप में मनाने लगी। हरिद्वार मध्यकाल में धर्म की नगरी रही है। यहां लोग आश्रमों में विद्वानों के दर्शन करने आते थे। इसी कारण से इसे तीर्थ कहा जाता था। कालान्तर में यहां विद्वान समाप्त हो गये और इस नगरी ने एक पौराणिक नगरी का रूप ले लिया जो आज भी यथावत है। अतः वैशाखी पर्व का सम्बन्ध रबी की फसल व इसकी कटाई से होने के साथ इसके माध्यम से किसान अपनी प्रसन्नता को उत्सव के रूप में अभिव्यक्त करते हैं। हमारा देश व इसका क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत हैं। इसकी जनसंख्या भी विश्व में सर्वाधिक है व होने को है। यह पर्व वैशाख महीने में 13 व 14 अप्रैल को मनाया जाता है। वैशाखी का दिन अनेक राज्यों में नववर्ष के रूप में भी प्रचलित है। इसे देश के अन्य भागों में पोहेला बोशाख, बोहाग बिहू, विशु, पुथंडु आदि अनेक नामों से मनाया जाता है। वैसाखी 13 अप्रैल, 1699 के दिन सिखों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। अतः यह पर्व सिख मत का स्थापना दिवस भी है। पंजाब में इस अवसर पर अनेक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं और सरकारी अवकाश रखा जाता है।

सृष्टि में हम देखते हैं कि अन्धकार के बाद प्रकाश अर्थात् रात्रि के बाद दिन आता है। इसी प्रकार जब अत्याचार बढ़ जाते हैं तो कोई पवित्र आत्मा पीड़ित मनुष्यों की रक्षा एवं सहायता करती देखी गई है। ऐसा ही समय औरंगजेब के समय में आया था। उसके अत्याचारों व अन्याय की कथा शब्दों में वर्णन नहीं की जाती है। इतना ही कह सकते हैं कि वह कहीं से भी मनुष्य या इंसान नहीं था। उसने हिन्दुओं पर धर्म के नाम पर भीषण अत्याचार किये व उन्हें यातनायें दी तथा लाखों व करोड़ों की संख्या में उनका धर्म परिवर्तन किया व कराया। उनके समकालीन गुरु तेग बहादुर ने उसके जुल्मों व अत्याचारों को समाप्त कराने के लिये दिल्ली के चांदनी चैक में अपनी शहादत दी थी परन्तु अपना धर्म नहीं बदला था। ऐसे बलिदानों के कारण ही आज भी वैदिक सनातन धर्म का अस्तित्व बना हुआ है। इस सनातन धर्म में घुल-मिल गये अविद्या व अन्धविश्वासों को दूर कर शुद्ध रूप देने का काम ऋषि दयानन्द ने अपने समय में किया था। सिखों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह जी ने वैशाखी के दिन 13 अप्रैल, 1699 को श्री केसगढ़ साहिब, आनन्दपुर में हिन्दुओं की साधारण जातियों के लोगों को संगठित कर खालसा पंथ की स्थापना की जिसका लक्ष्य धर्म व परोपकार के लिये तत्पर रहना व मुस्लिम अत्याचारों से हिन्दुओं की रक्षा करना था। सिख गुरुओं सहित वीर बन्दा वैरागी आदि हिन्दू वीरों ने भी मुस्लिम काल में हिन्दू जाति की रक्षा करने का जो साहस व गौरवपूर्ण कार्य किया है उसके लिये सभी महापुरुष श्रद्धा व आदर के पात्र हैं।

सन् 1919 के 13 अप्रैल के दिन जलियांवाला बाग नरसंहार की घटना घटी थी। देश के इतिहास में 13 अप्रैल का दिन एक दुखद घटना के रूप में अंकित है। इस दिन जलियांवाला बाग में रौलेट एक्ट के विरुद्ध एक शांतिपूर्ण सभा के लिए हजारों देशवासी जमा हुए जिन पर अंग्रेज शासकों ने अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं। ये सभी लोग वहां शान्तिपूर्ण सभा करने के लिए एकत्र हुए थे। जलियावाला बाग अमृतसर में ऐतिहासिक स्वर्ण मंदिर के निकट एक बगीचे के रूप में था। यहां अंग्रेजों की गोलीबारी से घबराई बहुत सी स्त्रियां अपने बच्चों को लेकर जान बचाने के लिए कुएं में कूद गईं थी। निकास का रास्ता संकरा होने तथा वहां से पुलिस द्वारा गोली चलाने के कारण कोई व्यक्ति बाहर नहीं जा सकता था। इस कारण भगदड़ हुई जिसमें लोग कुचले गए और हजारों लोग गोलियों की चपेट में आए। यह नरसंहार भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास का एक काला अध्याय व सर्वाधिक दुःखद घटना है। इस दिन अमृतसर में कर्फ्यू लगा हुआ था फिर भी सभा में सैंकड़ों लोग ऐसे थे जो बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे। बड़ी संख्या में स्थानीय लोग भी सभा में सम्मिलित थे। सभा की खबर सुन कर वहां हजारों की संख्या में लोग एकत्रित हो गये थे। जब नेता बाग में भाषण दे रहे थे तभी अंग्रेज अधिकारी जनरल डायर ने बाग से निकलने के सारे रास्ते बंद करवा दिए। बाग में जाने का जो एक रास्ता खुला था, उस रास्ते पर हथियारबंद गाड़ियां खड़ी करवा दी थी। जनरल डायर करीब 100 सिपाहियों के साथ बाग के गेट तक पहुंचा। उसके करीब 50 सिपाहियों के पास बंदूकें थीं। वहां पहुंचकर बिना किसी चेतावनी के उसने गोलियां चलवानी शुरु कर दी। गोलीबारी से डरे भोलेभाले लोग बाग में स्थित एक कुएं में कूदने लगे। गोलीबारी के बाद कुएं से 200 से ज्यादा शव बरामद हुए थे। इससे व्यथित शहीद ऊधमसिंह ने लगभग 21 वर्ष बाद 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में इस घटना के समय ब्रिटिश लेफ्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ओड्वायर को अपनी पिस्तौल से गोली चलाकर मार डाला। उन्हें 31 जुलाई 1940 को फांसी पर चढ़ा दिया गया था। देश की आजादी में शहादत किसी ने दी और सत्ता का सुख कुछ गिने चुने लोगों ने भोगा और अपने देश हितों के विपरीत अनेक कामों पर परदा डालने सहित अपने नाम से देश भर में नाना संस्थायें व भवन बनवायें।

बैसाखी पर्व हमें जलियावाला बाग काण्ड की याद दिलाता है। यह उस दिन वहां हताहत सैकड़ों बलिदानियों को याद करने का दिन है। किसानों को इस बैसाखी पर्व के अवसर पर अपना उत्सव मनाना ही चाहिये। इन अन्नदाताओं का भी देश ऋणी है। जो व्यक्ति किसान नहीं है उन्हें किसानों का आभार व्यक्त करना चाहिये। सरकार को इस दिन किसानों की उन्नति व समृद्धि के लिये नयी योजनाओं की घोषणायें व उनका शुभारम्भ करना चाहिये। यह दिन पंजाब के सभी वीर गुरुओं व योद्धाओं को भी स्मरण करने का दिन है जिन्होंने औरंगजेब आदि मुस्लिम शासकों के अत्याचारों से हिन्दू जाति की रक्षा की थी। अनेक राज्यों में यह उनके वर्ष के प्रथम दिन के रूप में आयोजित होता है। इसे परम्परानुसार अन्धविश्वासों से मुक्त होकर हर्षोल्लास से मनाना चाहिये। सबको प्रतिज्ञा लेनी चाहिये कि वह देश की सुख समृद्धि में योगदान करेंगे। सत्तालोलुप प्रवृत्ति के लोगों के मिथ्या प्रचार से प्रभावित नहीं होंगे। सबको सबसे धर्मानुकूल प्रीतिपूर्वक व यथायोग्य व्यवहार करने की प्रतिज्ञा भी लेनी चाहिये जिससे देश व समाज में सत्य अर्थों में अहिंसा की प्रतिष्ठा हो सके। शासन को भी देश में सिर उठा रही अराजक शक्तियों को कुचलने का प्रयत्न करना चाहिये जिससे देश के भोलेभाले लोगों के जान व माल की रक्षा हो सके।

मनमोहन कुमार आर्य

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