विश्व का कोई भी देश नहीं चाहता युद्ध

-ललित गर्ग-

अमेरिका एवं ईरान के बीच बढ़ते तनाव से बनती विश्व युद्ध की स्थितियों ने समूची दुनिया को संकट में डाल दिया है। इन वैश्विक तनावों के बीच व्यापार और तकनीकी संघर्ष के चलते वैश्विक बाजार अस्थिर हो रहे हैं, विकास की गति मंद हो रही है, महंगाई बढ़ती जा रही है, मानव जीवन जटिल हो रहा है और असमानताएं बढ़ रही हैं। आर्थिक असंतुलन एवं जलवायु संकट बढ़ता जा रहा है। तमाम दुनिया के लोगों पर निराशा और हताशा के बादल मंडरा रहे हैं। भयंकर विनाशकारी शस्त्रों के प्रयोग की आशंका से सारी दुनिया भयग्रस्त है। विश्व जनमत युद्ध का अंधेरा नहीं, शांति का उजाला चाहती हैं।

युद्ध के लिये तत्पर राष्ट्र भी युद्ध नहीं चाहते, लेकिन उनका अहंकार उन्हें न केवल स्वयं को बल्कि दुनिया को नष्ट करने पर तुला है। इन जटिल एवं संकटकालीन स्थितियों को देखते हुए शांतिकर्मी शक्तियों को इस स्तर तक मुखर होना चाहिए कि बड़ी शक्तियों एवं युद्ध को अग्रसर राष्ट्रों को इनके दुरुपयोग से रोका जा सके, अन्यथा एक मर्यादा लांघने के बाद सर्वनाश की शुरूआत हो जाएगी। वैज्ञानिक इस बात की घोषणा कर चुके हैं कि युद्ध में प्रत्यक्ष रूप में भाग लेने वाले कम और दुष्परिणामों का शिकार बनने वाले संसार के सभी प्राणी होते हैं। युद्ध वह आग है, जिसमें मानव के लिये जीवन-निर्वाह के साधन, साहित्यकारों का साहित्य, कलाकारों की कला, वैज्ञानिकों का विज्ञान, राजनीतिज्ञों की राजनीति और भूमि की उर्वरता भस्मसात् हो जाती है।

पिछले तीन महीनों में खाड़ी देशों में बहुत कुछ हुआ है। सबसे शक्तिशाली जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद पश्चिम एशिया में तनातनी बढ़ी है। तेल टैंकरों और अमेरिकी ड्रोन पर हमले हुए। इन सबके बावजूद ईरान पर आर्थिक दबाव डालने की अमेरिका की नीति प्रभवी नहीं बन पाई है। अमेरिका ने ईरान के खिलाफ जो रुख अपनाया है, उसके पीछे इराक में ईरान का प्रभाव भी बड़ा कारण है। दूसरा कारण यह भी है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश तमाम कोशिशों के बावजूद सीरिया की वशर अल असद को सत्ता से हटा नहीं सके हैं।

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का प्रभाव भारत पर पड़ने लगा है। भले ही युद्ध के बादल हजारों मील दूर मंडरा रहे हैं परन्तु भारत का हर क्षेत्र प्रभावित है। उद्योग, व्यापार, खाद्यान्न एवं पैट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति सब युद्ध की आशंका से ही प्रभावित हो गये हैं। यहां तक कि हर घर और एक रोटी पकाने वाले का चूल्हा भी युद्ध की संभावनाओं से कंप-कंपा रहा है। गरीब के लिए तो ये घने अंधेरे बादल एवं उससे बढ़ रही महंगाई ”स्कड“ मिसाईल है। इस तनाव से भारत की आर्थिक स्थिति पर भारी असर पड़ने लगा है। विदेश मुद्रा विनिमय बढ़ा तो खाद्य वस्तुओं से लेकर परिवहन, रेलवे, प्राइवेट ट्रांसपोर्ट पर बुरा असर पड़ेगा। इससे बेरोजगारी भी बढ़ सकती है। युद्ध को तत्पर देशों में हजारों भारतीय रहते हैं। यदि युद्ध न रोका गया तो इसका गैसीय प्रभाव न केवल पेयजल, नदी, झीलों और दलदली क्षेत्रों को विषाक्त करेगा बल्कि पक्षी शरण स्थलों का भी सर्वनाश कर देगा।

आज के माहौल में युद्ध कोई भी नहीं चाहता, ईरान से जंग के खिलाफ अमेरिका में भी लोग आवाज बुलंद कर रहे हैं। यद्यपि अमेरिकी अब और जंग नहीं चाहते लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी सनक में कुछ भी कर सकते हैं। इराक और लेबनान में परोक्ष युद्ध चल रहा है। ईरान और सऊदी अरब के मध्य शीत युद्ध में कितनी तबाही हुई है। सीरिया बर्बाद हो चुका है। लीबिया में भी मारकाट मची हुई है। सारा विश्व जानता है कि इराक में भयानक विध्वंस हुआ। अफगानिस्तान में अमेरिका ने विध्वंस किया। लीबिया, सीरिया, यमन में उसने खूनी खेल खेला। इन स्थितियों के बीच संयुक्त राष्ट्र ने बड़ी चेतावनी दे दी है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटारेस ने कहा है कि इस सदी में भूराजनीतिक तनाव अपने उच्चतम स्तर पर है। कई देश अप्रत्याशित एवं विध्वसंक फैसले ले रहे हैं, जिससे गम्भीर खतरा पैदा हो गया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव की चेतावनी को समूचे विश्व को गम्भीरता से लेना चाहिए। काश संयुक्त राष्ट्र ने पूर्व में अपनी भूमिका सही ढंग से निभाई होती और अमेरिका के दबाव में न आया होता तो आज दुनिया इस मुहाने पर खड़ी न होती। यह सर्वविदित है कि इराक के मामले में अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र की बात नहीं मानी थी। इन जटिल से जटिलतर होते हालातों में भारत ने शांति स्थापना एवं अहिंसक वातावरण बनाने की दिशा में सार्थक प्रयत्न किये हैं। विध्वंस के बाद जब पुनर्निर्माण की बात आई तो भारत ने हमेशा पहलकदमी की। कैसी विडम्बना है कि विध्वंस अमेरिका करे और पुनर्निर्माण का दायित्व भारत और अन्य देश निभाएं। भारत आज भी अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में बड़ी भूमिका निभा रहा है।

कासिम सुलेमानी को दफन किए जाने के बाद ईरान प्रतिशोध की ज्वाला में जल रहा है। तनाव के बीच अमेरिका ने हिन्द महासागर में अपने बमवर्षक विमान भेजने को तैयार बैठा है जबकि ईरान प्रतिशोध के तरीके सोच रहा है। ईरान ने ट्रंप की 52 ठिकाने तबाह करने की धमकी दी है तो बदले में ईरान के 250 ठिकाने तबाह करने की धमकी दे दी है। स्थितियां विकराल होती जा रही है। अगर जंग छिड़ती है तो उसके परिणाम भयंकर ही होंगे। भारत की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचेगी और यहां का जनजीवन त्रस्त एवं पीड़ित होगा। न केवल भारत बल्कि दुनियाभर में जनजीवन असंतुलित एवं समस्याग्रस्त होगा। बेहतर यही होगा कि संयुक्त राष्ट्र युद्ध रोकने में अपनी भूमिका निभाए। भारत समेत वैश्विक शक्तियों को शांति स्थापना के लिए भूमिका निभानी होगी, अन्यथा दुनिया में हाहाकार मच जाएगा। यह युद्ध दुनिया की एक बड़ी आबादी को विनाश की ओर ढकेलने वाला होगा, ऐसे युद्ध का होना विजेता एवं विजित दोनों ही राष्ट्रों को सदियों तक पीछे धकेल देगा, इससे भौतिक हानि के अतिरिक्त मानवता के अपाहिज और विकलांग होने का भी बड़ा खतरा है। मनुष्य का भयभीत मन युद्ध की विभीषिका से मुक्ति चाहता है। युद्ध अनिवार्य हो सकता है, फिर भी युद्ध के बारे में उनका अंतिम सुझाव या निर्णय यही है कि युद्ध में जय निश्चित हो फिर भी वह न किया जाए क्योंकि उसमें हिंसा और जनसंहार तो निश्चित है पर समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। युद्ध आज के विकसित मानव समाज पर कलंक का टीका है। युद्ध परिस्थितियां को दबा सकता है पर शांत नहीं कर सकता। दबी हुई चीज जब भी अवसर पाकर उफनती है, दुगुने वेग से उभरती है। युद्ध करने वाले और युद्ध को प्रोत्साहन देने वाले किसी भी व्यक्ति या राष्ट्र को आज तक ऐसा कोई प्रोत्साहन नहीं मिला, जो उसे गौरवान्वित कर सके। युद्ध तो बरबादी है, अशांति है, अस्थिरता है और जानमाल की भारी तबाही है।

यह युद्ध दो सेनाओं के बीच नहीं है- दो अहंकारों के बीच है। अमेरिका का यह अहंकार ही है, सत्ता की महत्वाकांक्षा, स्वार्थ तथा स्वयं को शक्तिशाली सिद्ध करने की इच्छा ही है कि वह बार-बार युद्ध को ही अपनी ताकत समझने की भूल करता है। युद्ध मूलतः असंतुलित व्यक्ति के दिमाग में उत्पन्न होता है। बुरा आदमी और बुरा हो जाता है जब वह साधु बनने का स्वांग रचता है। अमेरिका ऐसा ही महसूस कराता रहा है। यह उसका अहंकार ही है कि शांति की बात करते हुए अशांति की दिशा में बढ़ता है। क्योंकि जब तक अमेरिका के अहंकार का विसर्जन नहीं होता तब तक युद्ध की संभावनाएं मैदानों में, समुद्रों में, आकाश में भले ही बन्द हो जाये, दिमागों में बन्द नहीं होती। इसलिये आवश्यकता इस बात की भी है कि जंग अब विश्व में नहीं, हथियारों में लगे।

शांति के लिए सब कुछ हो रहा है-ऐसा सुना जाता है। युद्ध भी शांति के लिए, स्पर्धा भी शांति के लिए, अशांति के जितने बीज हैं, वे सब शांति के लिए-यह वर्तमान विश्व नेतृत्व के मानसिक झुकाव की भयंकर भूल है। बात चले विश्वशांति की और कार्य हों अशांति के तो शांति कैसे संभव हो? विश्वशांति के लिए अणुबम आवश्यक है, यह घोषणा करने वालों ने यह नहीं सोचा कि यदि यह उनके शत्रु के पास होता तो। इसलिये युद्ध का समाधान असंदिग्ध रूप में शांति, अहिंसा और मैत्री है। क्योंकि शस्त्र परम्परा से कभी युद्ध का अंत नहीं हो सकता। शक्ति संतुलन के अभाव में बंद होने वाले युद्ध का अंत नहीं होता। वह विराम दूसरे युद्ध की तैयारी के लिए होता है। कोई भी राष्ट्र कितना भी युद्ध करे, अंत में उसे समझौते की टेबल पर ही आना होता है। यह अंतिम शरण प्रारंभिक शरण बने, तभी दुनिया राहत की सांस लेगी। मंगल कामना है कि अब मनुष्य यंत्र के बल पर नहीं, भावना, विकास और प्रेम के बल पर जीए और जीते। अंधकार प्रकाश की ओर चलता है, पर अन्धापन मृत्यु की ओर।

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