कदमों का एहसास

बढ़ते कदमों का साहस कब
हारा है विस्तारों से ।
कायर हरदम हारा करता
खुद अपनी ही हारों से ।।

देख निशा के गहन तिमिर को
कब चन्दा घबराता है ।
तम के पग कम्पित हो जाते
जब दिनकर आ जाता है ।।
मोद मनाते हैं तारागण
साहस के व्यवहारों से । बढ़ते कदमों————

चरणों की गति से पथ की
तरुणाई भी घबराती है ।
अथक प्रयासों के राही तक
मंजिल खुद आ जाती है ।।
साधक कभी नहीं मरता है
असफलता की मारों से । बढ़ते कदमों———–

तट की लहरों का आलोड़न
माझी को भी भाता है ।
शौर्य सिन्धु में अरि के सपनों
से कब कौन डराता है ।।
कायर मुक्ति नहीं पा सकता
जनमत के धिक्कारों से । बढ़ते कदमों————

शुष्क कंठ व मृत होंठो से
जीवन कभी न मरता है ।
जग की पीड़ा हरने वाला
खुद पीड़ा से मरता है ।।
कभी न करना खुद को कुंठित
मन में पीला विकारों से । बढ़ते कदमों———–
अनिल कुमार पाण्डेय
संस्थापक-तुलसी मानस साहित्यिक संस्थान
जे-701 आवास विकास केशवपुरम, कल्याणपुर,
कानपुर ,(उ .प्र ) शब्ददूत -9198557973

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: