सागरमाथा

:एक:
यह गंगाजल है या
हिमालय के आंसू
हिंद महासागर में छलकते
बयान कर रहे हैं –
प्रहारों को
किए गए थे
हिम-शिखर पर
किसी हिंसा-प्रतिहिंसा द्वारा
कलेजा चीर गई थी उसका
युद्ध की गोलियां
देवभूमि पर घायल हुआ था
भारत मां का मस्तक
सैनिकों से लहू मे सना
बहुत रोया था हिमालय
और अब आतंक का भस्मासुर
तील रहा है आबाल-वृद्ध को
सैलाब उतर आए हैं
तमाम दुनिया के आंसू
ज्वार-भाटे की तरह
देख रहा हूं
सागर तीरे टकराती लहरों में
थककर लेटी है वे
दे रही है संदेश
विश्व-शान्ति का
‘ॐ’ द्यों शांति के शब्दों में
डॉ श्याम सिंह शशि

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