देश के निर्माण में अग्रणी भूमिका में रहा है आर्यवीर दल : डॉ राकेश कुमार आर्य

aryavir dal shivir balia

बलिया। यहां पर आर्यवीर दल और आर्य प्रतिनिधि सभा बलिया के संयुक्त तत्वावधान में वैदिक युवा चरित्र निर्माण शिविर एवं शौर्य प्रदर्शन कार्यक्रम के समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान के राष्ट्रीय प्रणेता डॉ राकेश कुमार आर्य ने कहा कि देश के निर्माण में आर्यवीर दल की अग्रणी भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि इस दल की स्थापना बड़ी विषम परिस्थितियों में महात्मा नारायण स्वामी जैसे स्वनामधन्य आर्य नेताओं के द्वारा उस समय की गई थी, जब स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज जैसे अनेक आर्य नेताओं की हत्या किए जाने का एक सिलसिला आरंभ हो गया था। देश की तत्कालीन ब्रिटिश सरकार सहित कांग्रेस भी आर्य नेताओं को सुरक्षा देने में किसी प्रकार की रुचि नहीं दिखा रही थी।
उन्होंने कहा कि भारत की आजादी की लड़ाई में आर्य समाज के क्रांतिकारी युवाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था। 1930 – 31 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में जेल जाने वाले लोगों में 80% से अधिक आर्य समाज के लोग थे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारी नेता इस पवित्र संगठन को अपनी माता के रूप में सम्मान देते थे। इन सभी आर्य क्रांतिकारियों ने भारत को आजाद कराने के बाद स्वामी दयानंद के सपनों के अनुरूप खड़ा करने का संकल्प लिया था। जिसमें स्वसंस्कृति, स्वधर्म , स्वदेश, स्वराष्ट्र, स्वभाषा को प्राथमिकता दी जानी अपेक्षित थी। परंतु लॉर्ड मैकाले के मानस पुत्रों ने अपनी शिक्षा नीति में भारत और भारतीयता को पूर्णतया उपेक्षित कर दिया। जिसका परिणाम यह हुआ है कि आज की युवा पीढ़ी किमकर्तव्यविमूढ़ की अवस्था में खड़ी है। परंतु आज भी समय है कि हम अपने आपको पहचानें । हमारे भीतर संस्कृति बोध और राष्ट्रबोध की पवित्र भावना आर्य समाज के आर्यवीर दल जैसे पवित्र संगठन ही पैदा कर सकते हैं। इसलिए हमें आर्य वीरों के निर्माण पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
डॉ आर्य ने कहा कि आज के संदर्भ में भारत की शिक्षा नीति में व्यापक परिवर्तन करने की आवश्यकता है। जब तक शिक्षा नीति में राष्ट्र और राष्ट्रवाद के साथ-साथ नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक हम अपने स्वाधीनता सेनानियों के सपनों का भारत बनाने में सफल नहीं हो पाएंगे।

आर्यवीर दल उत्तर प्रदेश के प्रांतीय संचालक आचार्य पंकज आर्य ने अपने संबोधन में कहा कि आर्य समाज ने प्रारंभ से ही राष्ट्र ,धर्म और संस्कृति के लिए स्वयं को समर्पित किया । परिणामस्वरुप लोगों ने बढ़ चढ़कर देश की आजादी के आंदोलन में भाग लिया। अनेक आर्य विद्वानों ने भारतीय संस्कृति के मर्म से लोगों को परिचित कराया। सनातन की पुनर्स्थापना में आर्य समाज के महत्वपूर्ण योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज भी भारत को वास्तविक स्वरूप में पहचान दिलाने में आर्य समाज विशेष भूमिका निभा रहा है। यह भ्रांतियों का निवारण कर क्रांति का मार्ग प्रशस्त करता है। यद्यपि यह किसी प्रकार की खूनी क्रांति में विश्वास नहीं रखता, परंतु सात्विक भाव परिवर्तन में अपनी अटूट आस्था रखता है। इसी भाव परिवर्तन की क्रांति से ही राष्ट्र सात्विक उन्नति के पथ पर आगे बढ़ सकता है। इसलिए सारे देश को आर्य समाज की विचारधारा का अवलंबन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की शिक्षा नीति में जब तक हम विदेशी भाषा और विदेशी चरित्र का गुणगान करते रहेंगे तब तक हम अपने अस्तित्व से जुड़ नहीं पाएंगे। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि भारत के पास अपनी एक गौरवशाली परंपरा और विरासत होने के उपरांत भी हम विदेश की ओर देख रहे हैं। विदेशी मेधाशक्ति कभी भी भारत के निर्माण में सहायक नहीं हो सकती। भारत को विश्व गुरु बनाने के लिए भारत की आत्मिक मेधाशक्ति के साथ जुड़ना समय की आवश्यकता है।

इस अवसर पर आचार्य हरि सिंह द्वारा आर्यवीरों के अनेक प्रकार के रोमांचकारी प्रदर्शन कराए गए। जिसमें आर्य सागर, ओम प्रकाश भारद्वाज, श्रेयांश आर्य , वेदालोक आर्य, उदय प्रताप सिंह आर्य जैसे ब्रह्मचारियों और आर्य वीरों ने विशेष भूमिका निभाई। अनेक आर्य वीरों को चरित्र निर्माण के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण का संकल्प आचार्य श्री ज्ञानप्रकाश वैदिक द्वारा दिलाया गया। जिसमें सभी आर्य वीरों ने कोई ना कोई संकल्प लेकर उसे अपने जीवन का अनिवार्य अंग बनाने का वचन दिया। यह बहुत ही सुखद अनुभव था कि सभी आर्यवीरों ने गुरुकुल की शिक्षा नीति के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हुए वर्तमान शिक्षा प्रणाली के प्रति असंतोष व्यक्त किया और स्पष्ट शब्दों में कहा कि हमें जो कुछ गुरुकुल की शिक्षा नीति के अंतर्गत प्राप्त हुआ है , वह स्कूली शिक्षा के अंतर्गत प्राप्त नहीं हो पाता।

कार्यक्रम का सफल संचालन और आयोजन आर्य जगत के सुप्रसिद्ध विद्वान आचार्य ज्ञानप्रकाश वैदिक द्वारा किया गया।

उन्होंने कार्यक्रम के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि यह कार्यक्रम विगत 18 जून से आरंभ हुआ था। जिसमें अनेक आर्यवीरों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। सभी आर्य वीरों और उनके परिजनों ने कार्यक्रम में बढ़ चढ़कर भाग लिया और भारत की ऋषि परंपरा को आगे बढ़ाने में अपना सहयोग प्रदान किया। उन्होंने कहा कि भारत के शौर्य को पहचान दिलाने का काम आर्यवीर दल के माध्यम से ही किया जाना संभव है। आचार्य ज्ञान प्रकाश वैदिक ने कहा कि शौर्य, शक्ति, संयम, साहस, पराक्रम और पुरुषार्थ – भारत की पहचान रहे हैं । जिन्हें आर्य वीर दल अपना आदर्श मानकर कार्य करता है। इसके पीछे इस दल की यही मान्यता है कि भारत का प्रत्येक नागरिक इन्हीं गुणों को अपनाकर राष्ट्र सेवा में लगे। उन्होंने कहा कि आज जब सारा विश्व ईसाइयत और इस्लाम के दो खेमों में विभाजित हो गया है, तब इसराइल और भारत जैसे देशों का अस्तित्व बने रहना एक चुनौती बन गया है। आज नहीं तो कल भारत के लिए यह एक बड़ी समस्या बनकर आ सकती है। इसलिए समय से राष्ट्रवाद की प्रबल बयार बहाई जानी आवश्यक है। आचार्य श्री ने कहा कि आज जब विश्व में कलह अपने चरम पर है , तब भारत के वैश्विक समाज के प्रति वसुधैव कुटुंबकम के आदर्श को स्थापित करना विश्व समाज के लिए आवश्यक हो गया है। यदि विश्व समाज भारत के दर्शन और वैदिक संस्कृति के इन दो शब्दों पर भी सच्चे हृदय से काम करना आरंभ कर दे तो विश्व शांति स्थापित होना संभव है।

इस अवसर पर श्री कमला सिंह आर्य, प्रमोद आर्य ( प्रांतीय संचालक आर्य वीर दल उत्तर प्रदेश ) आर्यवीर दल के संरक्षक ओमप्रकाश आर्य , ईश्वरन श्री अग्रवाल, अजय राय ( अध्यक्ष सद्गुरु सदाफल देव आश्रम मिड्ढा बलिया ) ने भी अपने विचार व्यक्त किये।
कार्यक्रम में आर्यवीर दल बलिया के जिला संचालक राजेश कुमार आर्य, प्रमोद कुमार आर्य, जोरावर सिंह आर्य, चंद्रपाल सिंह आर्य सहित अनेक आर्यजनों की विशेष भूमिका रही।

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