brahman ब्राह्मण कौन

आपने ब्रह्मराक्षस शब्द सुना होगा और कल्पना की होगी कि ये किसी दुष्ट व्यक्ति का नाम है,और मंदिरों में इसकी प्रतिमा देखकर इसके विषय में समझने की जिज्ञासा हो सकती है।
मडिकेरी के ओंकारेश्वर शिव मंदिर की क्षेत्रीय किंवदंती के अनुसार,मंदिर का निर्माण एक राजा द्वारा ब्रह्मराक्षस द्वारा उत्पन्न बुराई को दूर करने के लिए किया गया था।महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों जैसे केरल और कर्नाटक के कई हिंदू मंदिरों में बाहरी दीवारों पर ब्रह्मराक्षस की मूर्तियाँ अंकित की जाती हैं और आम तौर पर उनकी पूजा की जाती है । उनकी मूर्तियों के सामने नियमित रूप से तेल का दीपक जलाया जाता है। ब्रह्मराक्षस ज्यादातर आंखों से इशारे करता रहता है। इसकी आंखें तांबे जैसी और गोल दिखने लगती हैं। ऐसी मान्यता है कि जब किसी व्यक्ति को ब्रह्मराक्षस लग जाता है, तो ऐसा व्यक्ति बहुत ही शक्तिशाली बन जाता है। वह हमेशा खामोश रहकर अनुशासन में जीवन-यापन करता है।

पौराणिक मान्यताये :

इसके विषय में अनेकों परस्पर विरोधाभासी मान्यताएं है, इनमें प्रामाणिक कोई भी नहीं है। देखिए

1. यदि कोई ब्राह्मण आत्महत्या करता है अथवा उसकी असामयिक मृत्यु होती है तो वह प्रेतयोनि में जन्म लेता है और उसे ब्रह्मराक्षस कहते हैं।

2. मनुस्मृति में कहा गया है कि जो ब्राह्मण काला जादू करके अधर्म का जीवन जीता है, अन्य पुरुषों की पत्नियों को बहकाता है, या अन्य ब्राह्मणों की संपत्ति चुराता है, वह अपनी मृत्यु के बाद ब्रह्मराक्षस बन जाता है ।

3. ब्रह्म पुराण में एक चांडाल और ब्रह्मराक्षस के बीच बातचीत का वर्णन है। जब उससे उसके द्वारा किए गए पाप के बारे में पूछा गया, तो ब्रह्मराक्षस ने बताया कि वह कभी सोमशर्मा नामक ब्राह्मण था। चूँकि उसने एक बहिष्कृत राजा की ओर से एक यज्ञ किया था , जिसकी सेवा में मंत्रों का प्रयोग वर्जित था, इसलिए उसे ब्रह्मराक्षस बना दिया गया था।

4. ब्रह्मराक्षस उन आत्माओं को कहा जाता है जो उच्च जन्म लेते है। लेकिन उनके कर्म बुरे होते है, या फिर वे लोग जो अपनी ज्ञान और प्रतिभा का प्रयोग समाज कल्याण के बजाए अपनी निजी स्वार्थ या गलत कामों के लिए करते है। ऐसे लोग ही मरने के बाद अपने ज्ञान और प्रतिभा के कारण ब्रह्मराक्षस बन कर अपनी सज़ा भुगतते है।

विश्लेषण : एक बार हमारे प्रधान मंत्री जी ने कहा, इतिहास वह नहीं है जो पढ़ाया जाता है।यहीं बात धर्म के क्षेत्र में भी लागू होती है, हमारे धार्मिक साहित्य को अंग्रेजों और मुगलों द्वारा लिखवाकर भ्रम फैलाया गया और आज भी हम इसी भ्रम में जी रहे है।

उपरोक्त पौराणिक मान्यताये केवल एक कपोल कल्पना है। ना तो मनुस्मृति में और ना किसी वैदिक साहित्य में ब्रह्मराक्षस नाम का कोई पात्र नहीं है। किसी नाटक मण्डली या काव्य का कोई पात्र हो सकता है।

उपरोक्त मान्यताओं में ब्राह्मण के विषय में लिखा है जो आत्म हत्या कर लेता है आदि ।ये समझना चाहिए कि मनुष्य ब्राह्मण अपने कर्म से होता है ,जन्म से नहीं।

ब्राह्मण कौन होता है ?

तो उत्तर होगा कि पढने-पढ़ाने से,चिंतन-मनन करने से, ब्रह्मचर्य, अनुशासन, सत्यभाषण आदि व्रतों का पालन करने से,परोपकार आदि सत्कर्म करने से, वेद,विज्ञान आदि पढने से,कर्तव्य का पालन करने से, दान करने से और आदर्शों के प्रति समर्पित रहने से मनुष्य का यह शरीर ब्राह्मण किया जाता है।-मनुस्मृति 2/28

प्राचीन काल में ब्राह्मण बनने के लिए शिक्षित और गुणवान दोनों होना पड़ता था। ब्राह्मण का कर्म है विधिवत पढ़ना और पढ़ाना, यज्ञ करना और कराना, दान प्राप्त करना और सुपात्रों को दान देना।

ब्राह्मण शूद्र बन सकता और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते है। -मनुस्मृति 10/64

शरीर और मन से शुद्ध- पवित्र रहने वाला, उत्कृष्ट लोगों के सानिध्य में रहने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से रहित, अपने से उत्कृष्ट वर्ण वालों की सेवा करने वाला शूद्र भी उत्तम ब्राह्मण जन्म और द्विज वर्ण को प्राप्त कर लेता है। -मनुस्मृति 9/335

उपरोक्त विश्लेषण से ये प्रतीत होता है की यदि कोई व्यक्ति विद्वान ब्राह्मण है लेकिन उसके कर्म ब्राह्मण जैसे नहीं है, यानि विपरीत आचरण वाला दुराचारी मनुष्य को समाज ने उपहास स्वरूप ब्रह्मराक्षस उपनाम दिया।

एक अन्य भावार्थ ये भी हो सकता है कि जो व्यक्ति ईश्वर ब्रह्म की आज्ञाओं के विपरीत दुराचारी है उसको ब्रह्मराक्षस कह सकते है ।
इसके अतिरिक्त और कुछ भावार्थ नहीं है बाकि कपोल कल्पना है और भारत के ब्राह्मण वर्ण की छवि धूमिल करने का वाममार्गी प्रयास है।

– डॉ डी के गर्ग

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