भारत का स्वाधीनता आंदोलन और इतिहास

भारत की दासता की कहानी का अन्त 15 अगस्त 1947 को हुआ। दासता की दास्तान सदियों तक भारत की आत्मा को झकझोरती रही और अपने निकृष्टतम स्वरूप में उसका दोहन करती रही। यातना और उत्पीडऩ के इस भयानक काल से मुक्ति के लिए हमारे वीर नायकों ने सदियों तक संघर्ष किया। भारत माता वीर प्रस्विनी है। इसकी दासता की रोमांचकारी कहानी बड़ी कारूणिक और मार्मिक है। इसका इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब इस देश की स्वतन्त्रता का हरण करने के लिए पहला हाथ सिकन्दर ने इसकी ओर उठाया तो उसका उत्तर कितनी वीरता से दिया गया था। इसका पोरस पौरूष उस समय भी जीवित था और बाद में भी रहा। राजा पोरस के पौरूष का ही पुण्य प्रताप था कि उसके पश्चात् सदियों तक किसी व्यक्ति, राष्ट्र अथवा शासक का साहस इस राष्ट्र की स्वतंत्रता का अपहरण करने के लिए नहीं हुआ। इसके पश्चात् जब मौहम्मद बिन कासिम भारत में 712ई. में प्रथम मुस्लिम आक्रांता बनकर आया तो उसका हश्र अपने बुद्घि चातुर्य एवम् कौशल से राजा दाहर की दो वीरांगना सुपुत्रियों ने क्या किया था, यह इतिहास का रोचक विषय है। उन दोनों राजकुमारियों ने अपना बलिदान दे दिया पर अपनी अस्मिता पर आँच नही आने दी। उनका बलिदान स्वतन्त्रता के लिए हुआ था और वह देश की स्वतन्त्रता संग्राम की ही सैनानी थीं। जिन्हें यह मान्यता आज तक नहीं दी गयी है? आखिर क्यों? स्वतन्त्रता आन्दोलन के इतिहास को हमें वहीं से लिखना चाहिए जहाँ से यह सिद्घ हो जाये कि यहाँ भारत की स्वतन्त्रता को अपहृत करने का पहला प्रयास किया गया था। यदि मोहम्मद बिन कासिम ने ऐसा प्रयास सर्वप्रथम किया था तो हिन्द की इन बेटियों को आज तक कांग्रेस के चाटुकार इतिहासकारों ने समुचित गौरवपूर्ण सम्मानजनक स्थान क्यों नहीं दिया? इसी प्रकार विश्व विजेता सिकन्दर का सामना करने वाले पोरस के साथ हमने न्याय नहीं किया है? वह भी तो देश की स्वतन्त्रता का ही एक सैनिक था। वास्तव में स्वतन्त्रता की हमारी लड़ाई सन् 1857 से आरम्भ नहीं हुई थी। यह लड़ाई उसी दिन आरम्भ हो गयी थी जिस दिन विदेशी आक्रांता भारत को गुलाम बनाने और यहाँ की संस्कृति और धर्म को मिटाने के लिए सर्वप्रथम यहाँ आया था। इस लड़ाई के अमर बलिदानियों में हमें 712ई. में राजा दाहर और उसकी सेना को सर्वप्रथम नमन करना होगा। इसी श्रृंखला में आगे चलकर सन् 1000 के लगभग भारत के वीर शूरमा राजा जयपाल के वन्दनीय कृत्यों को भी नमन करना होगा। उसके पश्चात पृथ्वी राज चौहान और उसके समकालीन हिन्दू वीर शासकों को भी नमन करना होगा। जिन्होंने मुस्लिम आक्रांताओं को देश से बाहर निकालने का वीरोचित कार्य किया। इसी प्रकार चित्तौड़ के राणा खानदान ;राजा गुहिल के नाम से गहलौत वंश के राजा बप्पा रावल के उन वन्दनीय कृत्यों का स्मरण और कीर्त्तन भी करना होगा जिसकी तलवार अफ गानिस्तान तक शासन करती थी और जिसके नाम से ही मुस्लिम आक्रांताओं ने इस देश की ओर देखना भी बन्द कर दिया था। संघर्ष की इस गाथा में सल्तनत काल के वो हिन्दू वीर राजा भी बधाई के पात्र हैं जिन्होंने किसी प्रकार से हिन्दू धर्म और संस्कृति का दीपक अपने सत्कृत्यों से बुझने नहीं दिया। यद्यपि बड़ी भयंकर आँधी उस समय चल रही थी। इसी प्रकार मुस्लिम मुगल बादशाहत के काल में महाराणा प्रताप का स्वातन्त्रय संघर्ष हमारे लिए वन्दन का हेतु है। महाराणा से प्रेरणा लेकर अन्य हिन्दू वीरों, सैनिकों, शासकों के प्रयास भी स्तवनीय हैं। जिन्होंने किसी भी प्रकार से भारत की स्वतन्त्रता को लाने में अपनी ओर से कोई न कोई प्रयास किया था। वीर बन्दा बैरागी, छत्रसाल, शिवाजी जैसे अनेकों वीरों को इतिहास की ‘टॉर्च, से ढूँढ ढूँढकर खोजना पड़ेगा। जिनके कारण हमें आज विश्व में स्वतन्त्र देश के स्वतन्त्र नागरिकों के रूप में जाना जाता है। ऐसे महान लोगों के बलिदानों के कारण हम जीवित हैं। इसी प्रकार अंग्रेजों के जमाने में सन् 1857 की क्रान्ति के लिए महर्षि दयानन्द ने किस प्रकार क्रान्ति भूमि तैयार की थी, यह जानना होगा। उन्होंने स्वयं मेरठ में ‘मौनी-बाबा ‘ के रूप में जिस प्रकार कार्य किया वह इतिहास का ओझल किन्तु रोमांचकारी हिस्सा है। जिनके वर्णन के बिना स्वतंन्त्रता का इतिहास अधूरा है। उनके उस स्वरूप को हमें ध्यान में रखकर इतिहास को पूरा करना होगा। रानी, लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना फ डऩवीस 1857 की क्रान्ति में लाखों भारतीयों की आवाज बने थे। इस आवाज के पीछे भारतीय वीर प्रजा की वीर भावनाओं का सम्मान करना भी आज हमारा राष्ट्रीय कत्र्तव्य है। इस क्रान्ति के हजारों नायकों और वीर प्रजा के वीर सैनिकों को भी आज हमें नमन करना चाहिए। इसके बहादुर नेता वृद्घ मुगल बादशाह बहादुरशाह जफ र के उस स्वरूप को भी हमें स्मरण करना है जिसके अन्तर्गत उन्होंने देश की बादशाहत किसी भी हिन्दू शासक को सौंपने तक की बात कहकर फि रंगी अंग्रेज को देश से बाहर निकालने का संकल्प व्यक्त किया था। इसके अतिरिक्त महादेव गोविन्द रानाडे, श्यामजी कृष्ण वर्मा, लाला लाजपतराय, गोपाल कृष्ण गोखले और इनकी विचारधारा से पैदा हुई आजादी की जंग की त्रिवेणी-गरम दल, नरम दल और क्रान्तिकारी दल को भी हमें उचित स्थान देना होगा जिसकी बदौलत यहाँ एक ओर हजारों की संख्या में रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद पैदा हुए। जिनकी क्रान्ति की धूम ने गाँधी की शांति का पिटारा खोल दिया और देश की जनता को क्रान्ति प्रिय बना दिया। हमें गाँधी जी को उचित सम्मान देते हुए भी ‘सम्मान के वास्तविक पात्रों का उचित ध्यान रखना होगा। स्वतन्त्रता की बेला में गाँधी जी के रूप में नरमवादी विचारधारा जीवित रही। जबकि नेताजी सुभाष के रूप में क्रान्तिकारी आन्दोलन की विचारधारा को अंग्रेजों ने एक प्रपंच के अन्तर्गत दफ न कर दिया। जिसमें गाँधी और नेहरू की चुप्पी इतिहास का सबसे घृणास्पद मौन है। स्वतन्त्रता के इतिहास में उचित पारितोषिक मिलने से अछूता रहा सुभाष का वन्दनीय स्वरूप इतिहास के जहाज में बहुत बड़ा छेद है। स्वतन्त्रता की बेला में गरम विचारधारा के प्रतिनिधि पुरूष थे सरदार पटेल। जिन्हें एक षडय़न्त्र के तहत देश का पहला प्रधानमन्त्री बनने से रोक दिया गया। इस प्रकार स्वतन्त्रता जब मिली तो एक भयानक षडय़न्त्र के अन्तर्गत हमें हमारी शानदार विरासत से काट दिया गया। क्रान्तिकारी और गरम विचारधारा का इतिहास हमारी दृष्टि से विलुप्त करने का प्रयास किया गया। रातों रात मान्यताऐं बदल गयीं, आस्थाएं बदल गयीं। परम्पराऐं बदल गयीं। स्वतन्त्रता की चण्डी देवी के स्थान पर राष्ट्रदेव के मन्दिर में रातों रात ‘धर्म निरपेक्षता की देवी ‘ स्थापित कर दी गयी। उसके पुजारी बदल गये। पूजा का ढंग बदल गया और सारी पूजा पद्घति एवम प्रक्रिया बदल गयी। तब से लेकर आज तक यह राष्ट्र इसी कीर्तन में लगा हुआ है। पहले पुजारी पंडित नेहरू से यह पूजा प्रारम्भ हुई थी जिसका अखण्ड पाठ आज तक हो रहा है। जिसके परिणामस्वरूप भारत की संस्कृति को पहले से भी अधिक और भयानक संकट उत्पन्न हो गया है। राम मन्दिर के रूप में हम राष्ट्र मन्दिर का निर्माण करने में असफ ल सिद्घ हुए हैं। भौतिक उन्नति यद्यपि राष्ट्र की उन्नति का एक सकारात्मक पक्ष है, परन्तु फिर भी सांस्कृतिक समृद्घि राष्ट्र की भौतिक उन्नति का आधार नहीं बन पायी। यह हमारी बहुत बड़ी हार है। इस हार को स्वीकार करने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए। क्योंकि भविष्य की किसी भी आपत्ति का कारण हमारी यह हार ही बनेगी। इस हार के परिप्रेक्ष्य में हम यह देखें कि इतिहास झूठ का पुलिन्दा होता है। यह सदा शासकों के चाटुकारों से लिखाया जाता है। कांग्रेस ने भी जो इतिहास हमें दिया है, वह ऐसा ही इतिहास है। यह इतिहास स्वतन्त्रता आन्दोलन का समग्र इतिहास नहीं है। यह कांग्रेसी दृष्टिकोण से लिखा गया इतिहास है जबकि याद रखना होगा कि कोई भी संगठन किसी राष्ट्र की आत्मा का ना तो प्रतिबिम्ब होता है और न ही प्रतिनिधि। उसे इस जीवन्त राष्ट्र की समृद्घ सांस्कृतिक विरासत का ज्ञान कभी नहीं रहा है। फिर उससे एक निष्पक्ष इतिहास लेखन की आशा करना बेमानी बात है। हम यह देखें कि हमने अपने स्वतन्त्रता संघर्ष के अमर बलिदानियों के प्रति कितना न्याय किया है? उनके प्रति न्याय यदि हम चाहते हैं तो अपनी स्वतन्त्रता का इतिहास पुन: लिखना होगा, तभी भौतिकवाद की बाढ़ में बहती युवा पीढ़ी को राष्ट्रमन्दिर की साधना में लगाया जा सकता है। अन्यथा जब तक पश्चिम की लेडी माउन्टबेटन की रोमांटिक मूर्ति नेहरू के नजरिये से इस देश के युवा को भारत माता के मन्दिर में दीखती रहेगी तब तक वह अपने साधना पथ से भटकता रहेगा। भारत के इतिहास की गंगा को प्रदूषण रहित करने के लिए पुन: एक ‘भागीरथ ‘ की आवश्यकता है। ऐसा करने पर ही स्वतन्त्रता पूर्ण होगी।

आज यही संकल्प लेने की आवश्यकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
mariobet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betper giriş
rekorbet giriş
betticket giriş
betper giriş
savoybetting giriş
grandpashabet giriş
jojobet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
milanobet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
restbet giriş
safirbet giriş
restbet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
pumabet giriş
betpas giriş
betpas giriş
betwild giriş
dedebet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
milanobet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
maxwin giriş
süperbahis giriş
betwild giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betpark giriş
milanobet giriş
betpas giriş
betpark giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
cratosroyalbet giriş
cratosroyalbet giriş
betpas
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
cratosroyalbet giriş
cratosroyalbet giriş
betnano giriş
betnano giriş