मेरे मानस के राम : अध्याय 19 , रावण ने दिया सीता जी को दो माह का समय

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जब सीता जी ने रावण को लताड़ते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि चाह जो हो जाए, पर वह कभी उसकी भार्या नहीं बन सकतीं तो रावण अत्यधिक क्रोध में आ गया। तब उसने सीता जी से कहा कि तुम्हारे पास दो महीने का समय है। यदि इस काल में राम तुम्हें लेने नहीं आए तो तुम्हें मैं प्रातराश में खाकर समाप्त कर दूंगा :-

सीता के सुनकर वचन, भरा रावण को क्रोध।
नीच वचन लगा बोलने, करने लगा विरोध।।

प्रिय वचन मेरा बोलना , शायद नहीं था ठीक।
आसक्ति तेरी राम में , लगती नहीं है ठीक।।

दो महीने और हैं , अभी भी तेरे पास।
बाद उसके तू बने , मेरा प्रातराश ।।

सीता जी कहने लगीं, तू कब का है वीर।
नीच अधर्मी है निरा, तनिक नहीं गंभीर।।

सीता जी के इस प्रकार के शब्दों को सुनकर उनकी सुरक्षा में लगी महिलाओं ने उन्हें नोंचना आरंभ कर दिया। वे महिलाएं सीता जी को कई प्रकार के डर दिखाकर भयभीत करने लगीं:-

महिलाएं लगीं नोंचने , सीता जी की खाल।
करने लगीं भयभीत सब, क्रोध से हो गईं लाल।।

भंग धर्म अपना करो, छोड़ो राम की हेत।
नहीं मिलेंगे राम अब, लंकेश में लाओ चेत।।

मिली वेदना से हुईं , सीता जी बेढाल।
कौन पाप मैंने किया , हुआ मेरा यह हाल।।

राम मिलन की ना रही, सीता को उम्मीद।
कष्ट दु:खों के जाल में , भाग गई थी नींद।।

सीता ने निर्णय लिया, त्यागूंगी अब प्राण।
राम मेरे मिलने नहीं, असंभव है कल्याण।।

त्रिजटा आई वहां , फिर करने लगी बखान।
आया जो सपना मुझे, हो गया बड़ा कमाल।।

तभी वहां पर त्रिजटा नामक महिला आती है। वह सीता जी का ढांढस बंधाते हुए कहती है कि रात उसने एक अजीब सा सपना देखा है। मेरे सपने में राम और रावण का युद्ध हो रहा था । जिसमें रामचंद्र जी की जीत हुई है। मैं अपने इस सपने के आधार पर निश्चित रूप से कह सकती हूं कि आने वाले समय में जब कभी भी युद्ध होगा तो रामचंद्र जी की जीत निश्चित है।

रावण के संग युद्ध में, जीत गए हैं राम।
मेरा निश्चय है यही , असुरों का हो नाश।।

रावण जी के कंठ में, पड़ी है माला लाल।
दक्षिण को वह जा रहा, बन गधा असवार।।

सीता जी मुखरित हुईं , सुनकर ऐसे बोल।
नई चेतना से भरीं , खिल गए लाल कपोल।।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है। )

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