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वित्तीय स्थिरता प्रतिवेदन के अनुसार भारत की वित्तीय प्रणाली बहुत मजबूत है

जून 2024 के अंतिम सप्ताह में, 27 जून 2024 को, भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्तीय स्थिरता प्रतिवेदन जारी किया है। यह प्रतिवेदन वर्ष में दो बार, 6 माह के अंतराल पर, जारी किया जाता है। इस प्रतिवेदन में यह बताया गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था और भारत की वित्तीय प्रणाली लगातार मजबूत बनी हुई है और बेहतर तुलन पत्र के आधार पर, भारत के बैंक एवं वित्तीय संस्थान लगातार ऋण विस्तार के माध्यम से देश की आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने में अपनी प्रभावी भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं।

31 मार्च 2024 को समाप्त वित्तीय वर्ष में भारत के अनुसूचित वाणिज्यिक बैकों का पूंजी पर्याप्तता अनुपात 16.8 प्रतिशत का रहा है तथा सकल अनर्जक आस्ति अनुपात पिछले कई वर्षों के सबसे निचले स्तर अर्थात 2.8 प्रतिशत पर एवं निवल अनर्जक आस्ति अनुपात केवल 0.6 प्रतिशत पर आ गया है जो अपने आप में एक रिकार्ड है। न केवल अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक मजबूत बने हुए हैं अपितु गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) भी स्वस्थ बनी हुई हैं, जिनका पूंजी पर्याप्तता अनुपात 26.6 प्रतिशत, सकल अनर्जक आस्ति अनुपात 4.0 प्रतिशत और आस्तियों पर प्रतिलाभ 3.3 प्रतिशत रहा है। पूंजी पर्याप्तता अनुपात का मजबूत स्थिति में रहने का आश्य यह है कि इन बैकों के पास पर्याप्त मात्रा में पूंजी उपलब्ध है और इन बैकों में किसी प्रकार की आर्थिक परेशानी आने पर यह बैंक सफलतापूर्वक उस आर्थिक परेशानी का सामना कर सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, अनर्जक आस्ति अनुपात का सबसे कम स्तर पर आने का आश्य यह है कि बैकों द्वारा प्रदान किए जा रहे ऋणों की अदायगी समय पर हो रही है एवं इन ऋणों पर पर कोई दबाव दिखाई नहीं दे रहा है।

उक्त प्रतिवेदन में भारतीय रिजर्व बैंक ने भारतीय अर्थव्यवस्था में पनप रहे कुछ जोखिमों की ओर भी इशारा किया है। हालांकि वैश्विक स्तर पर कई विकसित देशों द्वारा अभी भी सख्त मौद्रिक नीति का अनुपालन किया जा रहा है एवं इन देशों द्वारा ब्याज दरों को अभी भी उच्च स्तर पर बनाए रखा गया है क्योंकि मुद्रा स्फीति की दर इन देशों में स्वीकार्य स्तर तक नीचे नहीं आ पाई है। भारत के लिए जरूर इस प्रकार के जोखिम कमजोर पड़े हैं क्योंकि भारत में मुद्रा स्फीति की दर को नीचे लाने में सफलता मिली है। परंतु, भारत में एक तो विशेष रूप से कोविड महामारी के बाद से नागरिकों पर ऋण का अतिरिक्त बोझ बड़ा है और दूसरे भारतीय नागरिकों की वित्तीय बचत की दर में कमी आई है। उक्त प्रतिवेदन में विशेष रूप से इन दो जोखिमों की ओर ध्यान दिलाया गया है।

भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार वित्तीय वर्ष 2022-23 में नागरिकों की बचत दर घटकर सकल घरेलू उत्पाद के 18.4 प्रतिशत तक नीचे आ गई है जो वर्ष 2013 से 2022 के बीच में औसतन 20 प्रतिशत की रही है। इसी प्रकार, एक अन्य मानक के अनुसार, वर्ष 2013 से 2022 के बीच भारतीय नागरिक अपनी कमाई का औसतन 39.8 प्रतिशत भाग बचत करते थे परंतु वित्तीय वर्ष 2022-23 में यह भाग घटकर 28.5 प्रतिशत तक नीचे आ गया है। बचत, दरअसल, दो प्रकार की होती है, एक वित्तीय बचत और दूसरे, सम्पत्ति निर्मित करने हेतु बचत। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, भारतीय नागरिकों की वित्तीय बचत जरूर कम हुई है परंतु सम्पत्ति निर्मित करने हेतु की गई बचत में वृद्धि दृष्टिगोचर है। जैसे, मकान बनाने हेतु एवं कार खरीदने हेतु की गई बचत को सम्पत्ति निर्मित करने हेतु की गई बचत की श्रेणी में रखा जाता है। भारत में हाल ही के वर्षों में सम्पत्ति निर्मित करने हेतु बचत का रुझान बहुत तेज गति से आगे बढ़ा है। आवास एवं कार आदि जैसी सम्पत्तियां खरीदने हेतु भारत में मध्यवर्गीय परिवार अपनी बचत के साथ ही बैकों से ऋण लेकर भी इन सम्पत्तियों का निर्माण कर रहे हैं। इससे अर्थव्यवस्था के चक्र में भी तेजी दिखाई देने लगी है क्योंकि मकान बनाने के लिए स्टील, सिमेंट, आदि पदार्थों की खपत भी बढ़ रही है एवं इन उत्पादों का उत्पादन भी विनिर्माण इकाईयों द्वारा अधिक मात्रा में किया जा रहा है, इससे देश में रोजगार के अवसर भी निर्मित हो रहे हैं। कुल मिलाकर, इससे देश के अर्थ चक्र में तेजी दिखाई देने लगी है। साथ ही, वित्तीय बचत कम इसलिए भी हो रही है क्योंकि अब देश का पढ़ा लिखा नागरिक वित्तीय रूप से अधिक साक्षर हो गया है एवं अब यह स्थिति समझने लगा है कि बैंकों एवं पोस्ट ऑफिस में बचत करने पर मिल रहे ब्याज की तुलना में शेयर (पूंजी) बाजार में निवेश करने तथा सोने एवं चांदी जैसे पदार्थों में निवेश करने से अधिक आय का अर्जन सम्भव होता दिखाई दे रहा है। साथ ही, भूमि का टुकड़ा खरीदकर उस पर भवन का निर्माण कर तुलनात्मक रूप से अधिक आय का अर्जन किया जा सकता है। अतः बैकों एवं पोस्ट ऑफ़िस के स्थान पर अब देश के नागरिक देश के पूंजी बाजार में अपनी बचत का निवेश करने लगे हैं।

दूसरे, मध्यवर्गीय परिवार अब अपने बच्चों की शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं पर अधिक ध्यान देने लगे हैं। इससे, इनकी कुल आय का अधिक प्रतिशत अब इन मदों पर खर्च होता दिखाई दे रहा है, इससे अंततः इन परिवारों की बचत में भी कमी दृष्टिगोचर हो रही है। इसी कारण के चलते नागरिकों की शुद्ध वित्तीय बचत में 11.3 प्रतिशत की भारी भरकम गिरावट दर्ज हुई है जो वर्ष 2022-23 में 28.5 प्रतिशत की रही है और पिछले 10 वर्षों के दौरान औसतन 39.8 प्रतिशत की रही थी।

कोरोना महामारी के दौरान चूंकि पूरे देश में लाक्डाउन लगाया गया था अतः इस दौरान भारत में घरेलू बचत दर बढ़कर 51.7 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। परंतु कोरोना महामारी के बाद जैसे ही लाक्डाउन को हटाया गया, नागरिकों ने अपने खर्चों में वृद्धि करना शुरू कर दिया एवं आस्तियों में निवेश भी करना शुरू किर दिया था, इससे घरेलू बचत की दर में भारी भरकम गिरावट दर्ज हुई है। अब तो देश के नागरिक आस्तियों में निवेश करने के उद्देश्य से बैकों से ऋण प्राप्त करने में भी किसी प्रकार की कठिनाई का अनुभव नहीं कर रहे हैं। इस सम्बंध में भारतीय बैकों ने भी अपने नियमों को शिथिल किया है। इससे भारत में ऋण में वृद्धि दर लगातार 15 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है वहीं जमाराशि में वृद्धि दर लगातार कम होती जा रही है जिसका प्रभाव वृद्धात्मक ऋण:जमा अनुपात पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है जो अब 100 प्रतिशत के आसपास पहुंच गया है।

एक और दिलचस्प पहलू यह भी उभरकर सामने आया है कि अब पर्यावरण में हो रहे परिवर्तन को भी वित्तीय जोखिम की तरह ही माना जा रहा है। अर्थात, अब जलवायु जोखिम एवं साइबर जोखिम को भी गम्भीर खतरे के रूप में देखा जा रहा है। आगे आने वाले समय में इन दोनों जोखिमों की वजह से भारतीय वित्तीय प्रणाली पर भारी दबाव पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन के चलते तो भारत की मौद्रिक नीति पर भी प्रभाव पड़ सकता है जिससे अंततः वित्तीय तंत्र के लिए भी जोखिम बढ़ सकता है।

प्रहलाद सबनानी

सेवा निवृत्त उप महाप्रबंधक,

भारतीय स्टेट बैंक

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