भारतीय संस्कृति में यज्ञ की है बड़ी महिमा : आचार्य विद्या देव

gurukul-murshadpur

ग्रेटर नोएडा । ( विशेष संवाददाता ) यहां पर चल रहे चतुर्वेद पारायण महायज्ञ के अवसर पर बोलते हुए आचार्य विद्यादेव जी ने कहा कि यज्ञों की महिमा का कोई अंत नहीं। ‘यज्ञ’ भारतीय संस्कृति के अनुसार ऋषि-मुनियों द्वारा जगत को दी गई ऐसी महत्वपूर्ण देन है जिसे सर्वाधिक फलदायी एवं समस्त पर्यावरण केन्द्र ‘इको सिस्टम’ के ठीक बने रहने का आधार माना जा सकता है। ऋषियों ने ‘अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः’ (अथर्ववेद 9.15.14) कहकर यज्ञ को संसार की सृष्टि का आधार बिंदु कहा है।

आचार्य श्री ने अपने प्रवचन को जारी रखते हुए कहा कि गीताकार श्रीकृष्ण ने कहा है :

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाच प्रजापतिः।

अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोडस्त्विष्ट कामधुक्‌॥

अर्थात् प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर, उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ कर्म के द्वारा वृद्घि को प्राप्त होओ और यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो।

आर्य जगत के प्रसिद्ध विद्वान आचार्य विद्यादेव ने आगे कहा कि संस्कृत के यज धातु से बना यज्ञ शब्द देव पूजन, दान एवं दुनिया को समर्थ-सशक्त बनाने वाली सत्ताओं के संगतिकरण के अर्थ में परिभाषित होता है। इस प्रकार यज्ञ दिव्य प्रयोजनों के लिए संगठित रूप से अनुदान प्रस्तुत करता है। यही है वह पुण्य प्रवृत्ति, जिसके कारण नर पशु को नर-नारायण बनने का अवसर मिलता है।

उन्होंने उपस्थित जनों का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि अग्नि में पकाए जाने पर जिस तरह सोने की कलुषता मिटती और आभा निखरती है, उसी प्रकार यज्ञ दर्शन को अपना कर मनुष्य उत्कृष्टता के शिखर पर चढ़ता और देवत्व की ओर अग्रसर होता है।

दुनिया की प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है। अतः प्रकृति के सभी पदार्थ परस्पर संसर्ग से जहां बनते रहते हैं, वहां वियोग से बिगड़ते भी रहते हैं। मिट्टी के परमाणु जलादिका संसर्ग पाकर घट, मठ आदि रूपों में बन भी जाते हैं और वही मिट्टी के परमाणु अन्य किसी कारण से वियोग को प्राप्त कर घटादि के नाश का भी कारण बन जाते हैं।

इसीलिए संयोग अर्थात् पदार्थों का परस्पर संगतिकरण ही संसार की स्थिति का कारण है और वियोग विनाश का हेतु। यदि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का संयोग न हो तो जल नहीं बन सकता। अतः मनुष्य का कर्तव्य है कि संसार की स्थिति को बनाए रखने के लिए पदार्थों के संगतिकरण रूपी पुरुषार्थ में सदा प्रयत्नशील रहे और संगतिकरण का नाम ही ‘यज्ञ’ है।

आचार्य श्री ने अपने और वचनों में कहा कि महर्षि दयानंद ने यज्ञ की महत्ता का वर्णन करते हुए एक बहुत अच्छा उदाहरण दिया है। उन्होंने लिखा है- घर में किलो भर जीरा पड़ा हुआ है। किन्तु उसकी सुगंध किसी को भी नहीं आ रही है, परन्तु घर की गृहिणी उसमें से दो ग्राम जीरा लेकर अग्नि में खूब तपे थोड़े घृत में डालकर जब दाल में बघार (छौंक) लगा देती है तो न केवल वही एक घर प्रत्युत आसपास के सभी घर उसकी सुगंध से सुगंधिमय हो जाते हैं।

हमारे शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ करके चार पुत्र पाए थे। इन्द्र ने स्वयं भी यज्ञों के द्वारा ही सब पाया था। पापों के प्रायश्चित स्वरूप अनिष्टों और प्रारब्धजन्य दुर्भाग्यों की शांति के निमित्त, किसी अभाव की पूर्ति, वायुमण्डल में से अस्वास्थ्यकर तत्वों का उन्मूलन करने के निमित्त हवन यज्ञ किए जाते थे और उनका परिणाम भी वैसा ही होता था।

इस युग में जिस प्रकार विभिन्न प्रकार की शक्तियां कोयला, जल, पेट्रोल, एटम द्वारा उत्पन्न की जा रही है, उसी प्रकार प्राचीन काल में यज्ञ कुंडों और वेदियों में अनेक रहस्यमय यंत्रों एवं विधानों द्वारा उत्पन्न की जाती थी। इस समय विविध मशीन अनेक कार्य करती है, उस समय मंत्रों और यज्ञों के संयोग से ऐसी शक्तियों का आविर्भाव होता है। आधुनिक विज्ञान मानव और पर्यावरण के बीच बिगड़ते संबंध का हल ढूंढ़ने में उलझता जा रहा है।

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