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भारतीय संस्कृति

उत्तम संतान की प्राप्ति के लिए माता-पिता का संतुलित मर्यादित आचरण बहुत आवश्यक है

[पुरुष व स्त्री दोनों के ब्रह्मचर्य से युक्त होने से ही उत्तम संतान होती है]

(१) एक ग्वालियर के मारवाड़ी ने स्वामी दयानंद जी के जीवन की एक कथा सुनाई। उसने बतलाया कि स्वामीजी के उपदेशों की चर्चा सुनकर एक प्रतिष्ठित मुसलमान भी उनके पास गया, परन्तु उसका मुख सर्वदा उदास रहता था। स्वामीजी ने कारण पूछा, उसने उत्तर दिया कि, ‘मेरे कई बच्चे हुए हैं परन्तु जीता कोई नहीं है इसलिये मन सर्वदा उदास रहता है’। स्वामी जी ने कहा कि ‘उपाय तो हम बतला देते हैं परन्तु है कुछ कठिन, यदि तुम करो तो हम विश्वास दिलाते हैं तुम्हारे घर पुत्र उत्पन्न होगा और जीता रहेगा’। उसने स्वामीजी के चरण पकड़ लिये और कहा कि, ‘महाराज! जो कुछ आप कहेंगे मैं करूंगा। स्वामीजी ने कहा कि सब से बड़ी शर्त एक वर्ष तक ब्रह्मचर्य रखने की है, यदि यह स्वीकार हो तो अपनी स्त्री से पूछ कर आओ कि वह भी स्वीकार करती है या नहीं’। वह घर गया और दूसरे दिन आकर कहा कि महाराज हम दोनों स्वीकार करते हैं। स्वामीजीने उनको गर्म वस्तुएं मांस, मदिरा आदि छोड़ने के लिए कहा। एक वर्ष उन्होंने ब्रह्मचर्य करके पुत्र उत्पन्न किया और वह इस समय उनके घर में जीवित है। ब्रह्मचर्य से वीर्य के सब दोष दूर हो जाते हैं।
ब्रह्मचर्य जैसा पुरुष के लिए है वैसा स्त्री के लिए भी आवश्यक है।
आपने ईंटें बनती कई बार देखी होंगी। यदि मिट्टी नर्म हो तो भी खराब हो जाती है। यदि सांचा ढीला हो तब भी ईंट टेढ़ी हो जाती है। यदि सांचा और मिट्टी दोनों ही खराब हो तो क्या कहना है। यही दशा मनुष्य के बच्चे की है। जब तक स्त्री और पुरुष दोनों ही दोषरहित न हों बालक बलवान् उत्पन्न नहीं हो सकता। जंतुओं को परमात्मा ने एक-एक गुण दिया है। कोकिला का कण्ठ सुरीला, तोते का नाक अच्छा, मृग के नयन सुंदर, परन्तु मनुष्य के बच्चे में ईश्वर ने संपूर्ण गुण इकठ्ठे कर दिए हैं। अब यदि हम अपने दुष्कर्मों से उन्हें खराब उत्पन्न करें तो इसमें परमात्मा का क्या अपराध? प्राचीन काल में मनुष्य ऐसे उत्पन्न नहीं हुआ करते थे जैसे कि आजकल उत्पन्न होते हैं।
प्राचीन काल के आदर्श भीम, अर्जुन, राम और हनुमान जैसे मनुष्य थे और यह केवल स्त्री पुरुष दोनों के ब्रह्मचर्य का प्रताप था।
(स्रोत:-पुस्तक-आनंद संग्रह, लेखक- स्वामी सर्वदानंद जी)

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