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भारत सनातन है और सनातन ही भारत है। इन दोनों का अन्योन्याश्रित संबंध है । जिसे समझना प्रत्येक भारतीय के लिए आवश्यक है जो इस पहेली के रहस्य को समझ जाता है वह भारत को समझ जाता है और फिर उसे सनातन को समझने में भी देर नहीं लगती। जिस प्रकार सनातन और भारत का संबंध है उसी प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि विश्व ही भारत है और भारत ही विश्व है। विश्व का लघु स्वरूप भारत है और भारत का विस्तृत स्वरूप विश्व है। भारत विश्व के लिए जीता है। इसलिए भारत ही विश्व है। भारत ने विश्व को ज्ञान विज्ञान दिया। जीवन जीने की शैली दी। शांति और सद्भाव के साथ जीवन यापन करने के लिए सांस्कृतिक मूल्य दिए। विश्व की आत्मा भारत है और संपूर्ण विश्व भारत का शरीर है। भारत का दिल संपूर्ण मानवता के लिए धड़कता है। वैश्विक कल्याण के लिए धड़कता है। विश्वोत्थान के लिए धड़कता है। भारत की उदारता विश्व कल्याण की गारंटी है ।भारत का सद्भावना पूर्ण दृष्टिकोण विश्व शांति की गारंटी है। ऐसे भारत में जन्म होना हम सबके लिए सौभाग्य का विषय है।
अब प्रश्न यह है कि भारत की उदारता और भारत का सद्भावना पूर्ण दृष्टिकोण विश्व के लिए अनुकरणीय क्यों है इसका उत्तर केवल यह है कि भारत वेदों का देश है। भारत वेदों की पवित्र भूमि है। ऐसे वेद जिनमें विश्व कल्याण और मानवता के उत्थान की ऋचाएं हैं जो हमारा मार्गदर्शन करती हैं। जब इन वेदों की ऋचाओं के लिए संकट के बादल मंडरा रहे थे तो इस पावन धरा पर स्वामी दयानंद जी महाराज आए ।जिन्होंने देश और दुनिया का आवाहन करते हुए कहा कि ‘वेदों की ओर लौटो।’ इससे हिंदू जाति को बहुत बल मिला। हिंदू जाति को और भी अधिक सबल और समर्थ करने के लिए आर्य समाज से अलग कुछ अन्य संगठनों ने भी अपने ढंग से और अपने स्तर पर कार्य किया। उनमें से एक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी है।
हिंदू समाज को एकता के सूत्र में पिरोकर सदियों से उसके भीतर आई निष्क्रियता को सक्रियता में परिवर्तित करने के उद्देश्य से प्रेरित होकर 27 सितंबर 1925 को ब्रिटिश भारत के नागपुर शहर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। डॉ. हेडगेवार नागपुर के ही रहने वाले, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की विचारधारा में विश्वास रखने वाले और हिंदू महासभा के क्रांतिकारी राजनेता  बी0एस0 मुंजे के राजनीतिक शिष्य थे । मुंजे के भीतर देशभक्ति और हिंदू समाज के लिए काम करने की लगन कूट-कूट कर भरी थी । वह विशाल व्यक्तित्व के स्वामी थे। उन्होंने अनेक युवाओं का मार्गदर्शन कर उन्हें देश और समाज के प्रति समर्पित किया। उनके संपर्क में आने वाले अनेक युवाओं का हृदय परिवर्तन हुआ। जिन्होंने देश और हिंदू एकता के लिए काम करना आरंभ किया। उस समय देश को आजाद करने के लिए कई क्रांतिकारी संगठन बंगाल और देश के दूसरे प्रान्तों में सक्रिय थे । सभी क्रांतिकारी अत्यंत गोपनीय ढंग से एक दूसरे के साथ संपर्क बनाने में सफल रहते थे।
मुंजे ने अपने राजनीतिक शिष्य डॉ. हेडगेवार के भीतर भविष्य की अनंत संभावनाओं को देख लिया था। यही कारण था कि उन्होंने डॉक्टर हेडगेवार को उस समय मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए और बंगाल में सक्रिय क्रांतिकारी संगठनों से युद्ध विद्या सीखने के लिए कोलकाता भेजा था। उन दिनों क्रांतिकारियों का संगठन ‘अनुशीलन समिति’ बहुत महत्वपूर्ण ढंग से राष्ट्र जागरण का कार्य कर रही थी। उसकी क्रांतिकारी गतिविधियों हमारे युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी थी। डॉ हेडगेवार भी अन्य क्रांतिकारी युवाओं की भांति अनुशीलन समिति की ओर आकर्षित हुए। वे उस समय अनुशीलन समिति के सदस्य बनकर कार्य करने लगे। यह समिति अपनी ब्रिटिश विरोधी विचारधारा के लिए जानी जाती थी। ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों का विरोध करने के लिए ही इस अनुशीलन समिति का गठन हुआ था । अपने इस पवित्र कार्य को करके इस समिति का प्रत्येक सदस्य अपने आप को गौरवान्वित अनुभव करता था।
डॉ हेडगेवार अपने आप को इस बात के लिए प्रभु की कृपा का पात्र समझते थे कि उन्हें इस समिति के अनेक क्रांतिकारी साथियों के साथ काम करने का अवसर उपलब्ध हो रहा था। वे देशभक्त लोगों के साथ काम करते रहे और उनसे कई प्रकार के गुर सीखे। इस सब के उपरांत भी डॉक्टर हेडगेवार इस बात को बड़ी गहराई से अनुभव कर रहे थे कि हिंदू समाज के जागरण के लिए एक ऐसा संगठन होना चाहिए जो उन्हें राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक आदि सभी क्षेत्रों में नव प्रेरणा देकर उनके भीतर जीवंतता का संचार करे।
अपनी इसी प्रकार की मानसिकता के चलते डॉक्टर हेडगेवार ने यह मन बना लिया था कि यदि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करते हैं तो उसे राजनीतिक बयानबाजी से दूर रखना होगा। यही कारण था कि उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत का सीधे विरोध नहीं किया। इसके विपरीत वे मौन रहकर हिंदू समाज को संगठित करने के भारी उद्योग में लग गए, जो लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यह कहकर आलोचना करते हैं कि इसने आजादी के आंदोलन में भाग नहीं लिया था, उन्हें डॉ. हेडगेवार जी के मूल चिंतन, उनकी विचारधारा , उनकी कार्य प्रणाली और उनके उद्देश्य को समझना चाहिए। इसके साथ ही साथ ऐसा आरोप लगाने वाले लोगों को यह भी देखना चाहिए कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बड़े से बड़ा पदाधिकारी आज भी राजनीति के पचड़े से अपने आप को दूर रखता है। इसका अभिप्राय है कि हिंदू सांगठनिक शक्ति पर ध्यान देने के अतिरिक्त देश की राजनीति में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न करना या राजनीतिक बयानबाजी न करना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मूल चरित्र है।
ऐसा भी नहीं है कि डॉक्टर हेडगेवार जी ने अंग्रेजों के विरुद्ध किसी प्रकार के राजनीतिक आंदोलन में भाग नहीं लिया था या वह ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों में सम्मिलित नहीं रहे थे? उन्होंने क्रांति दल के माध्यम से ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों में भाग लिया था । इसके अतिरिक्त 1918 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के होम रूल अभियान में भाग लेकर अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की थी। हमें आरएसएस और डॉक्टर हेडगेवार जी को समझने के लिए इतिहास को खंगालना पड़ेगा। उस समय की परिस्थितियों को समझना पड़ेगा। अंग्रेज और मुसलमान दोनों मिलकर जिस प्रकार हिंदू शोषण की गतिविधियों में लगे हुए थे ,उसका सामना करना भी उस समय आवश्यक था। इसके लिए क्रांतिकारी संगठनों से अलग एक ऐसे सामाजिक क्रांतिकारी संगठन की आवश्यकता डॉ हेडगेवार ने अनुभव की जो हिंदुओं के भीतर हीनता के भावों को दूर कर उनको गौरव बोध कराए। 1925 में रत्नागिरी जेल में वीर सावरकर जी से मिलने के बाद डॉक्टर हेडगेवार उनसे अत्यधिक प्रभावित हुए थे । उससे पहले वे वीरसावरकर के हिंदुत्व संबंधी विचारों को पढ़ चुके थे। जो नेता सावरकर जी जैसे क्रांतिकारी और ‘हिंदी – हिंदू – हिंदुस्तान’ के लिए समर्पित दूरदर्शी राजनेता के संपर्क में रहकर किसी संगठन को स्थापित करने के लिए प्रेरित हुआ हो उसे संगठन की देशभक्ति सर्वथा असंदिग्ध ही मानी जाएगी।
हिंदू समाज को एकता के सूत्र में पिरोकर उसकी सामाजिक संरचना को मजबूत करने के लिए प्रेरित होकर काम करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के काल से लेकर आज तक राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत करने की दिशा में अनेक कीर्तिमान स्थापित किये हैं। राम मंदिर आंदोलन में भी इस संगठन ने बढ़-चढ़कर अपना योगदान दिया। इसकी भूमिका के चलते राम मंदिर आंदोलन जन-जन तक पहुंचा। एक-एक कार्यकर्ता ने राम मंदिर के बारे में जन जागरण का ऐसा अभियान चलाया कि केवल अयोध्या तक सीमित होकर रह गया राम जन्मभूमि का मुद्दा राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। ‘जय श्री राम’ और ‘राम लला हम आएंगे – मंदिर वहीं बनाएंगे’ के उद्घोष जन-जन तक पहुंचे और लोगों ने उन उद्घोषों के साथ अपना तारतम्य स्थापित कर मौन रहकर आरएसएस के साथ कंधे से कंधा मिला दिया। लोगों ने बढ़ चढ़कर जलसा जुलूसों में भाग लिया और ‘राम लला हम आएंगे- मंदिर वहीं बनाएंगे’ को हृदय की गहराइयों से अपनी स्वीकृति प्रदान कर सरकार के साथ-साथ पूरी व्यवस्था को यह संदेश दे दिया कि राम जन्मभूमि का मुद्दा अब जन-जन की समझ में आ चुका है । व्यवस्था में बैठे लोगों ने यह समझ लिया कि अब इतिहास के साथ की जा रही क्रूरता अधिक देर तक नहीं चल सकती। इतिहास करवट ले रहा है और वह समय दूर नहीं है जब इतिहास अपनी परिक्रमा को पूर्ण कर लेगा।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने अयोध्या में राम मंदिर बनाने संबंधी आदेश दिया तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने लोगों से अपील की कि अब हम मिलजुल कर राम मंदिर बनाएंगे। समाज का हर वर्ग राम मंदिर निर्माण में अपना कर्तव्य धर्म निभाने के लिए सामने आए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों और इसके इतिहास की महत्वपूर्ण जानकारी रखने वाले लेखक श्रीधर दामले की मान्यता रही है कि संघ ने गोकशी पर रोक और स्वदेशी के मामले पर जनसाधारण की अच्छी प्रतिक्रिया नहीं मिलने के उपरान्त भी राम मंदिर के मुद्दे को आगे बढ़ाना अपना लक्ष्य बनाया। हमारा मानना है कि संघ जिस समय गोकशी और स्वदेशी के मामलों को लेकर कार्य कर रहा था उस समय एक तो उसका सांगठनिक विस्तार अधिक नहीं था, दूसरे लोगों में जागृति का अभाव भी था। इसके उपरांत भी संघ और संघ के नेताओं ने निरंतर आगे बढ़ते रहने के अपने संकल्प को ढीला नहीं होने दिया। संघ की इस प्रकार की चारित्रिक भावना ने उसे वर्तमान सम्मानजनक स्थिति तक पहुंचाया है। रुकना बड़ा सरल है, पर निरंतर आगे बढ़ते रहना बड़ा कठिन होता है ।
जो संगठन निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं वही मंजिल तक पहुंचते हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी अपने भीतर उद्देश्य के प्रति समर्पण के भाव को जागृत रखना कोई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सीख सकता है। उसने शून्य से अपनी यात्रा की शुरुआत की और विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों को पार करते हुए निरंतर अपने यात्रा पथ पर अग्रसर है। जैसे तूफान से लड़ने की जिद एक दीपक को हो जाती है और वह अपने सत्ता अस्तित्व के लिए निरंतर संघर्ष करता रहता है, वैसे ही जिद्दी व्यक्तित्व और संगठन तूफानों के सामने झुकते नहीं हैं । वे बलिदान दे सकते हैं पर रुक नहीं सकते हैं।
श्रीधर दामले की मान्यता रही है कि 40 और 50 के दशक के शुरुआत में संघ के नेताओं को राम मंदिर में कोई अधिक रुचि नहीं थी। उनकी मान्यता थी कि राम मंदिर का प्रकरण स्थानीय मसला है। उस समय संघ के नेताओं की मान्यता थी कि यह प्रकरण पूरे प्रदेश को भी हिलाने की क्षमता नहीं रखता। पर जब इस प्रकरण को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने काम करना आरंभ किया तो इसके चौंकाने वाले परिणाम आने आरंभ हुए। लोगों ने इस प्रकरण के साथ जुड़कर आरएसएस को बहुत अधिक ताकत प्रदान की। दामले के अनुसार 40 और 50 के दशक में जब संघ गोकशी पर प्रतिबंध के लिए काम कर रहा था तो उस समय इसके कार्यकर्ताओं ने घूम-घूम कर सारे देश में हस्ताक्षर अभियान चलाया था। जिसमें 1.75 करोड लोगों के हस्ताक्षर जुटाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता सफल हुए थे। उस समय जनसाधारण के अतिरिक्त देश के कई राजघरानों के साथ-साथ हिंदू धार्मिक नेताओं ने भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का साथ दिया था। बाद में बालासाहेब देवरस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक बने। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए यह स्पष्ट कर दिया था कि यदि राम जन्म भूमि के प्रकरण को संघ हाथ में लेता है तो इसके लिए तीन दशक की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार रहना होगा। राम मंदिर के निर्माण को लेकर यदि संघ के कार्यकर्ता किसी प्रकार का प्रदर्शन करना चाहते हैं तो पहले उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि वह तीन दशक तक इस के लिए अपने सभी काम छोड़ने को तैयार है। उन्होंने कहा कि ‘यह आपके धैर्य की परीक्षा की लड़ाई है जो अंत तक लड़ेगा, जीत उसी की होगी।’
जब 22 जनवरी 2024 को राम मंदिर का उद्घाटन भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया तो उस समय संघ प्रमुख मोहन भागवत भी प्रधानमंत्री के साथ यज्ञ पर यज्ञमान के रूप में उपस्थित रहे। तब उन्होंने बालासाहेब देवरस की पंक्तियों का स्मरण कर इन ऐतिहासिक पलों पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए बी0बी0सी0 के संवाददाता से कहा था “आनंद का क्षण है, बहुत प्रकार से आनंद है। एक संकल्प लिया था और मुझे स्मरण है कि तब के हमारे सरसंघचालक बाला साहेब देवरस जी ने ये बात क़दम आगे बढ़ाने से पहले याद दिलाई थी कि बहुत लगकर बीस-तीस साल काम करना पड़ेगा, तब कभी ये काम होगा और बीस तीस साल हमने किया। अब तीसवें साल के प्रारंभ में हमें संकल्प पूर्ति का आनंद मिल रहा है।”
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने कार्यकर्ताओं को राम मंदिर निर्माण के लिए लोगों को अधिक से अधिक सहयोग राशि देने के लिए प्रेरित किया ।आरएसएस के अनेक कार्यकर्ता इस कार्य को संपन्न करने के लिए एक अभियान के रूप में जुट गए। 23 जनवरी 2024 को ‘जनसत्ता’ में छपी खबर के अनुसार
अनुमान है कि राम मंदिर पूर्ण रुप से दिसंबर 2025 तक बनकर तैयार होगा… अयोध्या का ये राम मंदिर करीब 70 एकड़ में फैला हुआ है….जिसमें 18 करोड़ डॉलर यानी करीब ’15 अरब रुपये’ खर्च होने का अनुमान है… राम मंदिर को बनाने के लिए जनता से ’30 अरब रुपये’ यानी 4.2 अरब डॉलर का चंदा मिला है… एस0बी0आई0 के एक अनुमान के मुताबिक राम मंदिर से उत्तर प्रदेश सरकार को 25 हजार करोड़ यानी करीब 3 अरब डॉलर की कमाई हो सकती है… हिंदुओं के लिए अयोध्‍या का वही महत्‍व है जो मुस्लिमों के लिए मक्‍का का माना जाता है।’
कुल मिलाकर यह बात निस्संकोच कहीं जा सकती है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राम मंदिर निर्माण में अपनी विशेष और महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया , जिसने देश के जनसाधारण को राष्ट्रीय दृष्टिकोण देकर राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सोचने के लिए विवश किया। राष्ट्र को उसकी अस्मिता से परिचित कराया और राम मंदिर निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वाह कर राम और राष्ट्र के आदर्श को स्थापित किया।

डॉ राकेश कुमार आर्य
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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