मल्लिकार्जुन खड़गे का मौन और कांग्रेस छोड़ने की नेताओं की भगदड़

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(लिमटी खरे)

सर्दी, गर्मी, बरसात के अलावा एक मौसम और आता है साल में, वह है पतझड़ का। बसंत ऋतु के आगमन के कुछ दिनों बाद से ही पतझड़ का मौसम आरंभ होने लगता है। पतझड़ में हरे भरे वृक्षों से पत्ते झड़ते जाते हैं और कुछ दिनों तक हरा भरा पेड़ इस तरह प्रतीत होता है मानो ठूंठ खड़ा हो। फिलहाल पतझड़ का मौसम चल रहा है। यही आलम देश की सबसे पुरानी और आधी सदी से ज्यादा देश पर राज करने वाली कांग्रेस का हो रहा है। कांग्रेस के आला नेता एक के बाद एक करके कांग्रेस पार्टी को अलविदा कहते जा रहे हैं। इसके बाद भी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का मौन नहीं टूट पा रहा है।

हाल ही में मध्य प्रदेश के कद्दावर नेता और प्रदेश सरकार में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री रहे दीपक सक्सेना ने कांग्रेस से अपना नाता तोड़ लिया है। दीपक सक्सेना की पकड़ सहकारिता के क्षेत्र में गजब की है। इसके अलावा वे 1993, 1998, 2008 एवं 2018 में छिंदवाड़ा जिले के जिला मुख्यालय छिंदवाड़ा वाली सीट से विधायक भी रहे हैं। उन्होंने 2018 में जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी थी तब प्रोटेम स्पीकर का काम भी बखूबी निभाया और 2019 में उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री कमल नाथ के लिए अपनी विधान सभा सीट से त्यागपत्र दे दिया था जहां से तत्कालीन मुख्यमंत्री कमल नाथ ने उप चुनाव लड़ा और जीता। दीपक सक्सेना के पुत्र अजय सक्सेना के भी भाजपा में जाने की खबरें हैं।

भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि अब तक 15 हजार के लगभग लोग प्रदेश में ही भाजपा की रीति नीति से प्रभावित होकर भाजपा का दामन थाम चुके हैं। मध्य प्रदेश में 29 लोकसभा सीट हैं, जिनमें से 2019 के लोकसभा चुनावों में छिंदवाड़ा को छोड़कर बाकी सीटों पर भाजपा का परचम लहराया था। प्रदेश में सिर्फ छिंदवाड़ा सीट ही ऐसी थी जिसमें कमल नाथ के बाद उनके पुत्र नकुल नाथ ने विजय हासिल की थी। अब भाजपा की नजरें छिंदवाड़ा लोकसभा सीट पर है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी छिंदवाड़ा पर ध्यान केंद्रित किए हुए दिख रहे हैं।

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता अशोक चव्हाण, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह, उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा, आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी, अरूणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पेमा खाण्डू के अलावा जम्मू काश्मीर के पूर्व मंख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद, नारायण राणे, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी आदि न जाने कितने नेता हैं जिनका कांग्रेस से मोहभंग हो चुका है। ये सभी कांग्रेस की सदस्यता को त्याग चुके हैं।

हाल ही में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र लिखकर जातिगत जनगणना के वायदे या गारंटी का विरोध किया है। उन्होंने बहुत ही विनम्रता के साथ इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की विरासत का अनादर न करने की बात कही है। कांग्रेस के सांसद नसीर हुसैन का इस मामले में कहना था कि जात पर न पात पर, मुहर लगेगी हाथ पर के नारे का तब क्या होगा

एक तरह से देखा जाए तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एक के बाद एक कांग्रेस को छोड़कर जाते जा रहे हैं। कांग्रेस के अंदरखाने से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो कांग्रेस में सत्ता की धुरी अब पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के इर्द गिर्द घूमती दिखाई देने लगी है। खबरें इस तरह की भी हैं कि राहुल गांधी को कुछ नेताओं की शैतान चौकड़ी ने घेर रखा है, जिसके चलते सालों साल कांग्रेस का परचम बुलंद करने वाले वरिष्ठ नेताओं को अब अपमानित महसूस होने पर मजबूर किया जा रहा है।

कांग्रेस के न जाने कितने वरिष्ठ नेता एक एक करके कांग्रेस का साथ छोड़ते गए और कांग्रेस के नीति निर्धारक, कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य, कांग्रेस के सभी महासचिव यहां तक कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने भी अपना मौन नहीं तोड़ा। कांग्रेस की नीतियों के संबंध में आज भी पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ही बयान देते नजर आते हैं और उन बयानों पर कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे अपना मौन समर्थन देते नजर आते हैं। कांग्रेस के अंदर इस तरह की चर्चाएं भी चल रही हैं कि इससे कमोबेश यही साबित होता दिख रहा है कि राहुल गांधी ही कांग्रेस और कांग्रेस ही राहुल गांधी रह गई है।

यक्ष प्रश्न आज यही खड़ा दिखाई दे रहा है कि आखिर कांग्रेस पार्टी को राहुल गांधी किस दिशा में ले जाना चाह रहे हैं! आखिर किन रणनीतिकार अथवा चण्डाल चौकड़ी ने उन्हें घेर रखा है कि उन्हें पार्टी के जहाज को नेताओं से विहीन होने की खबर तक नहीं है। अगर खबर है और वे इस मामले में एक तरह का अड़ियल रवैया अख्तियार किए हुए हैं, वे नेताओं का कांग्रेस से मोहभंग होने की स्थिति में भी उन नेताओं को कांग्रेस में रोकने का कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं तो यह 28 दिसंबर 1885 को जिस कांग्रेस की स्थापना की गई थी उस कांग्रेस के 139 साल के इतिहास में सबसे शर्मनाक माना जा सकता है। ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में कांग्रेस के लिए कार्यकर्ताओं का भी टोटा अगर नजर आए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि नेताओं के साथ उनके कार्यकर्ताओं की निष्ठा भी होती है और नेता ही कांग्रेस का जहाज छोड़कर जा रहे हैं तो कार्यकर्ता कब तक वहां टिके रहेंगे!

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