सरकारी योजनाएं और भारत का देहात

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संगीता चौहान
उदयपुर, राजस्थान

राजस्थान का एतिहासिक उदयपुर शहर झीलों की नगरी के नाम से भी प्रसिद्ध है. जहां सालों भर देश और दुनिया के पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहता है. यहां कि सुंदरता की मिसाल इसी से लगाई जा सकती है कि दुनिया के बड़े बड़े उद्योगपति और फ़िल्मी सितारे वेडिंग स्थल के रूप में इसी शहर का चुनाव करते हैं. इसलिए इस शहर की भव्यता और सुंदरता देखते ही बनती है. लेकिन इसी शहर से मात्र चार किमी की दूरी पर बसा है मनोहर पुरा गांव. अनुसूचित जाति बहुल इस गांव की आबादी लगभग एक हज़ार है और साक्षरता की दर करीब पचास प्रतिशत है. शहर से करीब होने के बावजूद इस गांव की अधिकतर आबादी विभिन्न सरकारी योजनाओं से वंचित है.

वर्तमान में राजस्थान सरकार द्वारा राज्य को मॉडल्स्टेट बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं. जिसके अंतर्गत सरकार द्वारा कई जनकल्याणकारी योजनाएं शुरू की गई हैं. इसके अतिरिक्त केंद्र द्वारा संचालित योजनाओं को भी धरातल पर शत प्रतिशत लागू करना है. इन सब का अंतिम लक्ष्य राजस्थान की जनता को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है. ऐसे में सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना, प्रधानमंत्री बीमा सुरक्षा योजना, लकड़ी और धुएं वाले चूल्हे से महिलाओं को मुक्ति दिलाने के लिए उज्ज्वला योजना तथा शिक्षा, कृषि और चिकित्सा जैसे सुरक्षा की कई योजनाओं को धरातल पर लागू करने के लिए प्रयासरत है. परंतु इसके बावजूद इनमें से कई ऐसी योजनाएं हैं जिसका लाभ मनोहर पुरा गांव की जनता को नहीं मिल पा रहा है.

इस संबंध में गाँव की एक बुजुर्ग महिला नंदू बाई बताती हैं कि वह पिछले 40 वर्षों से इसी गाँव में रहती आई हैं. पिछले वर्ष उनके पति का स्वर्गवास हो गया. वह एक वर्ष से विधवा पेंशन के लिए दौड़ धूप कर रही हैं. परंतु जागरूकता के अभाव में वह विभाग से अपनी पेंशन शुरू करवाने में असफल रही हैं. नंदू बाई बताती हैं कि इस सिलसिले में वह कई बार ई-मित्र से भी मिल चुकी हैं, लेकिन वह भी उनके आवेदन को गंभीरता से नहीं लेता है और उसे अप्लाई करने में रुचि नहीं दिखाता है. हालांकि नंदू बाई बताती हैं कि यह काम प्रशासन का है कि वह उन जैसे बुजुर्गों के पेंशन की व्यवस्था करे, लेकिन उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है. इतना ही नहीं, मनरेगा गारंटी योजना से भी ग्रामीण जागरूक नहीं हैं. कई ऐसे ग्रामीण हैं जिनके पास जॉब कार्ड तो बना हुआ है, लेकिन आज तक उन्हें मनरेगा से कभी काम नहीं मिला है.

हालांकि सरकार की ओर से ऐसी व्यवस्था की गई है कि इसके तहत कोई भी ग्रामीण पंचायत से फॉर्म 6 भरकर काम मांग सकता है. लेकिन इन ग्रामीणों को ऐसी किसी प्रकार की जानकारी तक नहीं है. इसका सबसे अधिक नुकसान महिलाओं को हो रहा है. मनरेगा से काम नहीं मिलने के कारण पुरुष काम की तलाश में शहर या अन्य राज्यों की तरफ पलायन कर जाते हैं, लेकिन महिलाओं को घर की देखभाल के कारण गाँव में ही रुकना पड़ता है. ऐसे में गाँव की अनेक महिलाएं घर की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए शहर के बड़े घरों में झाड़ू पोंछा लगाने का काम करने को मजबूर हैं. इस संबंध में गाँव की एक 32 वर्षीय महिला जानकी देवी कहती हैं कि उनके पति और उन्होंने कई वर्ष पहले मनरेगा के तहत जॉब कार्ड बनवाया था, लेकिन आज तक उन्हें कोई काम नहीं मिला है. इस संबंध में वह कई बार पंचायत कार्यालय भी गई लेकिन सिवाय आश्वासन के कुछ भी नहीं मिला. वह कहती हैं कि गाँव में अनुसूचित जाति की संख्या अधिक है और वह स्वयं इसी जाति से हैं. इनकी जाति के कई लोगों को मनरेगा के तहत काम मिल चुका है, लेकिन उन्हें या उनके पति को आज तक काम नहीं मिला.

उन्हीं की जाति की एक अन्य महिला शांति बाई नाराजगी के साथ कहती हैं कि मनोहर पुरा गाँव में कई बुनियादी आवश्यकताओं की कमी है. सबसे अधिक लोगों को रोजगार की जरूरत है. इसके लिए पुरुष और युवा गांव से पलायन कर रहे हैं. चुनाव के समय सभी दलों के नेता आकर सब कमी को दूर करने का आश्वासन देते हैं. लेकिन चुनाव के बाद कोई नेता पलट कर इस गाँव में नहीं आता है. शांति बाई कहती हैं कि जिन लोगों की पहुँच राजनीतिक दलों या विभाग से होती है वह सभी योजनाओं का लाभ उठा लेते हैं, लेकिन हमारे जैसे लोग नहीं जानते हैं कि प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ प्राप्त करने के लिए कहां और कैसे आवेदन करनी है? कोई हमारा मार्गदर्शन करने को तैयार नहीं होता है. कई ऐसे लोग हैं जिनके पास आज तक उनका आधार कार्ड नहीं बना है, जिसके कारण वह किसी प्रकार को योजनाओं का लाभ प्राप्त करने से वंचित हैं. उन्होंने बताया कि गाँव में एक 65 वर्षीय बुजुर्ग महिला प्यारी देवी अकेले रहती हैं. इस बुढ़ापे में उनका कोई नहीं है. वह कहीं काम करने में भी अक्षम हैं. ऐसे में उनके लिए वृद्धा पेंशन कारगर सिद्ध हो सकता है. लेकिन आधार कार्ड नहीं बने होने के कारण वह इसका लाभ उठाने से आज तक वंचित हैं.

सिर्फ मनोहर पुरा गाँव के स्थाई निवासी ही नहीं बल्कि काम की तलाश में 10 वर्ष पूर्व बिहार से आकर यहां बसा कई परिवार ऐसा है जो किसी भी प्रकार का दस्तावेज़ नहीं होने के कारण सुविधाओं का लाभ उठाने से वंचित है. उनके बच्चों का आधार कार्ड नहीं होने के कारण आज तक वह बच्चे स्कूल नहीं जा सके हैं और न ही उन परिवारों को राशन या अन्य कोई सुविधाएं मिल पा रही है. मनोहर पुरा ही नहीं, बल्कि उसके जैसे देश के कई ऐसे गांव हैं जहां शिक्षा के अभाव में लोगों अपने अधिकारों के प्रति भी जागरूक नहीं हो पाते हैं. इन सब समस्याओं को देखते हुए ऐसा लगता है कि जागरूकता के अभाव में लोग सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाने से वंचित हैं. वहीं दूसरी ओर विभाग की उदासीनता के कारण भी सरकार की योजनाएं धरातल पर लागू होने की जगह फ़ाइलों में दब कर रह जाती हैं।

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