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आर्थिक असमानता को लेकर वैश्विक संस्था ऑक्सफैम की रिपोर्ट

– ललित गर्ग –

वैश्विक संस्था ऑक्सफैम ने अपनी आर्थिक असमानता रिपोर्ट में समृद्धि के नाम पर पनप रहे नये नजरिया, विसंगतिपूर्ण आर्थिक संरचना एवं अमीरी गरीबी के बीच बढ़ते फासले की तथ्यपरक प्रभावी प्रस्तुति समय-समय पर देते हुए इसे संतुलित एवं समानतामय संसार-संरचना के लिये घातक बताया है। संभवतः यह एक बड़ी क्रांति एवं विद्रोह का कारण भी बन सकता है। ऑक्सफैम के अनुसार आर्थिक असमानता के लिहाज से पिछले कुछ साल काफी खराब साबित हुए हैं। आज देश एवं दुनिया की समृद्धि कुछ लोगों तक केन्द्रित हो गयी है, भारत में भी ऐसी तस्वीर दुनिया की तुलना में अधिक तीव्रता से देखने को मिल रही है। भारत में भी भले ही गरीबी कम हो रही हो, लेकिन अमीरी कुछ लोगों तक केन्द्रित हो गयी है। बीते चार सालों की घटनाएं, इनमें चाहे कोरोना हो या युद्ध या इससे उपजी महंगाई, बेरोजगारी, अभाव इन सभी कारणों के चलते साल 2020 के बाद दुनियाभर में करीब 5 अरब लोग गरीब हुए हैं। दूसरी ओर इसी रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के पांच शीर्ष धनाढ्यों की दौलत पिछले चार साल में 869 अरब डॉलर बढ़ी है। क्या यह आश्चर्य का विषय नहीं कि विकसित दुनिया की दौड़ में कुछेक लोग सबसे आगे दौड़ रहे हैं और बड़ी संख्या में गरीब दहलीज पर खड़े हैं? वो लोग जो अमीरी के शीर्ष पर हैं, वे वर्चुअल दुनिया और एक ग्लोबल बाजार के मालिक हैं। ऐसे लोगों के सामने आम आदमी की गरीबी दूर करने का नहीं, बल्कि अपनी समृद्धि बढ़ाने का लक्ष्य है। यह ऐसी दौड है जो असंतुलन को न्यौतती हैं, दुःख, अभाव एवं असंतोष बढ़ाती है।
भारत में अंबानी एवं अडाणी छोटे व्यापारियों के निवाले छीन रहे हैं तो दुनिया के सबसे अमीर शख्सों में शुमार एलन मस्क की कंपनी न्यूरालिंक ने इंसान के दिमाग में कृत्रिम चिप का प्रत्यारोपण बाजारवादी नीतियों का हिस्सा एवं ईश्वर की रची मानव-संरचना में बेहूदा हस्तक्षेप है। संवेदनशील मस्तिष्क में चिप लगाने के क्रम में इंसान के रोबट बन जाने की आशंकाएं भी निर्मूल नहीं हैं। ध्यान रहे कि इस प्रत्यारोपण का लक्ष्य मानव-कल्याण कदापि नहीं है। जाहिर है मस्तिष्क में चिप लगाने का प्रयोग उनके बाजार के गणित का ही हिस्सा है। वही मस्क जिन्होंने ट्विटर खरीदने और उसे एक्स में तब्दील करने के क्रम में कर्मचारियों की निर्ममता से छंटनी की थी। वही मस्क जो विश्व के अरबपतियों को अंतरिक्ष में सैर-सपाटा कराने के अलावा दुनिया के तमाम बड़े मुनाफे के कारोबार में लगे हुए हैं। यह सवाल मानवीय बिरादरी के लिये हमेशा मंथन का विषय रहेगा कि विज्ञान की खोज एवं कुछेक लोगों तक केन्द्रित होती समृद्धि मानवता की संहारक नहीं बन रही है? जनता में आक्रोश एवं विद्रोह का बड़ा कारण नहीं बन रही है?

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