नेहरू के मंदिर बनाम दयानंद के मंदिर, 1

IMG-20231227-WA0031

पंडित जवाहरलाल नेहरू वेद में आए ‘दक्षिणा’ शब्द का अर्थ नहीं जानते थे। भौतिक जगत में मंदिरों में होने वाली दक्षिणा को वह ‘हिंदू सांप्रदायिकता’ के साथ जोड़कर देखते थे। यही कारण था कि वे मंदिरों को भी संप्रदाय का प्रतीक मानते थे और नए मंदिर बनाने की वकालत नए-नए उद्योग ,हॉस्पिटल, स्कूल आदि बनाकर करने के पक्षधर थे। आध्यात्मिक चेतना के केंद्र धर्म स्थलों , गुरुकुलों को वे पाखंड मानते थे और उनकी इसी प्रकार की नीतियों के कारण देश अपनी मौलिक चेतना से दूर होता चला गया।
इस प्रकार की सोच के साथ देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू बहुत बड़ी चूक कर गए। उन्होंने आध्यात्मिक भारत की आध्यात्मिक चेतना को समझा नहीं और बिना समझे ही वे उसे नई दिशा देने का गलत निर्णय ले बैठे । अपने आप को ‘एक्सीडेंटल हिंदू’ कहने वाले नेहरू हिंदू ( वैदिक ) धर्म की सच्चाई को समझ नहीं पाए। यदि वह जानते कि भारत में मंदिरों की संस्कृति वास्तव में राष्ट्रीय चेतना और धर्म चेतना को जागृत करने के लिए स्थापित की गई थी । जब तक इस मंदिर संस्कृति ने अपने इस दायित्व का निर्वाह किया तब तक भारत संपूर्ण विश्व का नेतृत्व करता रहा । माना जा सकता है कि इस परंपरा में धीरे-धीरे घुन लगा और मंदिरों में अनाचार को भी प्रोत्साहन मिला। पर इसका अभिप्राय यह नहीं कि मंदिरों को आप कोसने लगें या पूरे राष्ट्र का ध्यान ही उस ओर से हटा दें। अच्छा यह होता कि मंदिरों की पवित्रता को स्थापित किया जाता । इन्हें फिर से धर्म चेतना और राष्ट्र चेतना का केंद्र बनाया जाता। वैदिक वांग्मय के प्रति पूर्णतः उदासीन रहे नेहरु में भारत को समझने का माद्दा नहीं था। उनमें भारत को लेकर अध्ययन का अभाव था। वास्तव में नेहरू जी संस्कृत द्रोह के कारण व संस्कृतिद्रोही बन गए। जिसका परिणाम यह निकला कि उन्होंने मंदिर संस्कृति को देश के लिए मूर्खता का प्रतीक माना।
इसके विपरीत स्वामी दयानंद जी महाराज ने वेद आदि आर्ष ग्रंथों का गहन अध्ययन, मंथन और चिंतन किया। वे संस्कृत भक्त थे। इसलिए संस्कृति प्रेमी भी थे । उन्होंने दूध का दूध और पानी का पानी करने की नीर क्षीर विवेक शक्ति को प्राप्त किया। परिणामस्वरूप उन्होंने मंदिर संस्कृति की उस पवित्रता को स्थापित करने पर बल दिया जिससे राष्ट्रीय चेतना, धर्म चेतना और संस्कृति चेतना की त्रिवेणी बहती रहे। उन्होंने आर्य समाजों की स्थापना की तो वहां पर इस त्रिवेणी को बहने की पूरी व्यवस्था भी की।

ऋषि का शिष्य प्रधानमंत्री बनता तो….

यदि स्वतंत्र भारत की सरकार की लगाम किसी गांधी के शिष्य के हाथों में न आकर स्वामी दयानंद जी के किसी शिष्य के हाथों में आती तो निश्चित रूप से मंदिर संस्कृति का सही स्वरूप उभर कर सामने आता । तब राष्ट्र निर्माण के लिए मंदिरों की अनिवार्यता को स्वीकार किया जाता और इस संबंध में उचित कानून भी बनाए जाते। तब ऐसा होना कदापि संभव नहीं था कि मंदिरों पर सरकार कर लगाए और उनसे होने वाली आय को ईसाई चर्च या मुस्लिम समाज की मस्जिदों के ऊपर खर्च करे। तब मंदिरों को धर्म चेतना , राष्ट्र चेतना और संस्कृति चेतना के लिए प्रयोग किया जाता और इस प्रकार की तीनों चेतनाओं को संयुक्त कर राष्ट्र को और भारतीय राष्ट्रीयता को मजबूत करने की दिशा में काम करने के दृष्टिगत मंदिरों को भारत की उन्नति का एक मजबूत केंद्र बनाया जाता। आज धर्म, राष्ट्र और संस्कृति के बिना भारत की उन्नति हृदयहीन सी दिखाई देती है। यह सब कुछ इसलिए हो गया कि भारत के पहले प्रधानमंत्री ने स्वतंत्र भारत की दिशा बदल दी । जिस ओर स्वतंत्र भारत को जाना चाहिए था, देश को उस ओर न ले जाकर देश का पहला प्रधानमंत्री उसे रसातल की ओर लेकर चल दिया।

दिशाहीन लोग और आर्य समाज

 जो लोग आर्य समाज के झंडे तले बैठकर मंदिरों को कोसते हैं या मंदिर संस्कृति का अपमान करते हैं वह स्वामी दयानंद जी की भावनाओं को समझते नहीं हैं । वह यह भी नहीं समझते कि इस प्रकार की उनकी हरकतों से देश के हिंदू समाज में टूटन फूटन की प्रवृत्ति बढ़ती है। उन्हें यह पता होना चाहिए कि ऋषि दयानंद जी का दृष्टिकोण कभी भी खण्डनात्मक नहीं रहा । उन्होंने मंडनात्मक दृष्टिकोण से चीजों को देखा और इसी दिशा में उन्होंने लोगों के समक्ष भाषण दिए। व्याख्यान दिए। उपदेश दिए । शास्त्रार्थ किये और इसी दृष्टिकोण के दृष्टिगत उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की। स्वामी दयानंद जी महाराज सुधारात्मक दृष्टिकोण के व्यक्ति थे। यह स्वाभाविक है कि सुधारात्मक दृष्टिकोण में कई बार जिसका सुधार किया जा रहा होता है, उसे कष्ट होता है । 
  यह कुछ उसी प्रकार है जैसे किसी रोगी व्यक्ति का उपचार करते समय कभी-कभी उसकी शल्य चिकित्सा की आवश्यकता पड़ जाती है तो उसके शरीर से कुछ खून भी निकलता है। उस समय कई रोगी भावावेश में आकर चिकित्सक या वैद्य को गाली देने लगते हैं । तब वह चिकित्सक  शांतमना उन गालियों को स्वीकार कर लेता है। क्योंकि वह जानता है कि इस समय इस रोगी के आवेश को ध्यान में न रखकर इसके हित को ही ध्यान में रखना उचित है। स्वस्थ होने पर वही रोगी अपने चिकित्सक के प्रति अपराध बोध से भर जाता है। उसे पता चल जाता है कि उसके साथ चिकित्सक ने जो कुछ किया, वह उसके भले के लिए किया था। यदि कोई पागल कुत्ता आपकी टांग में काट ले तो इसका अर्थ यह नहीं कि आप भी उसकी टांग में काटेंगे। दिशाहीन लोगों को आप खड़े होकर सही दिशा बताएं , यह आपका राष्ट्रीय कर्तव्य बनता है। ऐसा कदापि नहीं होना चाहिए कि दिशाहीन लोगों की सोच और मानसिकता का आप उपहास करने लगें।

नेहरू की ‘हिंदुस्तानी’

नेहरू गुरुकुलों को दकियानूसी की पिछड़ी विचारधारा या मानसिकता का प्रतीक मानते थे। पंडित जवाहरलाल नेहरु के द्वारा जहां ‘हिंदुस्तानी’ को प्रोत्साहित करने और साथ – साथ हिंदी का भी ध्यान रखते हुए संस्कृत को महत्व देने की बात कही गई, वहीं उनकी नीतियों के चलते व्यवहार में इसका उल्टा परिणाम देखने को मिला। हुआ यह कि ‘हिंदुस्तानी’ सर्वत्र छाती चली गई, हिंदी उपेक्षित हो गई और संस्कृत को लगभग मरणासन्न अवस्था में पहुंचा दिया गया। बड़ी सावधानी से किए गए इस ऑपरेशन में संस्कृत और हिंदी की वर्तमान दुर्दशा के लिए केवल और केवल नेहरू जिम्मेदार हैं।
नेहरू मोहम्मद शाह रंगीला की नीतियों के समर्थक थे। जिसने भारत में ‘हिंदुस्तानी’ नाम की एक ऐसी भाषा को प्रचलित करने का प्रयास किया था जिसमें सभी भाषाओं के शब्द हों, जिसकी कोई व्याकरण ना हो, कोई वैज्ञानिक आधार ना हो। उसने ऐसी ही भाषा में अश्लील गजलें लिखवाईं। जिनको सुन-सुनकर वह स्वयं औरतों के कपड़े पहनकर अपने दरबार में अश्लील गीतकार कवियों के साथ नाचा करता था। मोहम्मद शाह रंगीला के पदचिह्नों पर चलने वाले लेडी माउंटबेटन और उस जैसी अन्य अनेक महिलाओं के रसिया रंगीले मिजाज के नेहरू भी भारत की वैदिक संस्कृति और वैदिक अथवा हिंदू धर्म से दूरी बनाना उचित मानते थे। जाने अनजाने में उनका एक ही संकल्प था कि वह ‘हिंदुस्तानी’ के माध्यम से हिंदी और संस्कृत का बेड़ा गर्क करेंगे। अन्यथा ऐसे क्या कारण रहे कि हिंदी और संस्कृत के प्रति संविधान सभा के संकल्प प्रस्ताव के रहते हुए भी आज ‘हिंदुस्तानी’ हम पर हावी है और हिंदी व संस्कृत की उपेक्षा हो रही है।
भारत को अपनी जड़ों से काटने का अपराध नेहरू ने किया। इसके उपरांत भी उन्हें राष्ट्र निर्माता के रूप में स्थापित किया गया। यदि इस स्थिति पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि नेहरू को भारत की मौलिकता के साथ जुड़ना या तो आता नहीं था या फिर वह जानबूझकर भारत की मौलिकता की उपेक्षा कर रहे थे। ऐसे व्यक्ति को राष्ट्र निर्माता कभी नहीं कहा जा सकता जो अपने ही देश की मौलिकता के साथ जुड़ने में लज्जा का अनुभव करे।

डॉ राकेश कुमार आर्य
यह लेख मेरी पुस्तक एक क्रांतिकारी संगठन आर्य समाज से लिया गया है।

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
kolaybet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
holiganbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
perabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet güncel giriş
onwin güncel giriş
betpark
sahabet güncel giriş
sahabet güncel giriş
betpark
sahabet güncel giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
kolaybet giriş