स्वामी श्रद्धानंद जी की पुस्तकें

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1 कल्याण मार्ग का पथिक
स्वामी जी की आत्मकथा।
2- धर्मोपदेश मंजरी
3- हिन्दू संगठन।
तीनो पुस्तक ₹300 (डाक खर्च सहित)

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पुस्तक नाम- धर्मोपदेश मंजरी
विषय-“स्वामी श्रद्धानन्द जी के लिखित उपदेशों का उत्तम कोटि का एक नया वृहद प्रकाशन धर्मोपदेश मंजरी”
संकलनकर्ता- श्री लब्भूराम नैय्यड़
संपादक- डॉ. विनोदचन्द्र विद्यालंकार जी

पुस्तक के पृष्ठ 5 से 15 तक सम्पादक महोदय द्वारा लिखा गया ‘उपोद्घात’ है जिसमें पुस्तक में प्रकाशित सामग्री का विस्तृत परिचय दिया गया है। उपोद्घात के प्रथम अनेक पृष्ठों में स्वामी श्रद्धानन्द जी के जीवन के प्रमुख पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। इसमें ‘मुक्ति का एक पथ’ नाम से एक नया अध्याय जोड़ा गया था जिसमें ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के चयनित 14 मंत्रों पर स्वामी श्रद्धानन्द जी के 13 प्रवचन दिये गये हैं।

पुस्तक में विषय क्रम इस प्रकार वर्णित हैं। उपोद्घात पृष्ठ 5 से 15 तक, प्रथम खण्ड : यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म पृष्ठ 18 से 86 तक, द्वितीय खण्ड : मानव-धर्म का आधार ब्रह्मचर्य पृष्ठ 87 से 150 तक, तृतीय खण्ड : दार्शनिक विचारधारा के परिप्रेक्ष्य में अध्यात्म-विद्या पृष्ठ 151 से 264 तक और चतुर्थ खण्ड : मुक्ति का एक पथ 265 से 300 पृष्ठ तक है। इसके बाद श्लोक/मन्त्र-अनुक्रमणिका (खण्ड क्रम से) 4 पृष्ठों में दी गई है।

कल्याण मार्ग का पथिक

महात्मा मुंशीराम जी ने सन् 1917 में मायापुर, हरिद्वार में संन्यास लिया था और नया नाम स्वामी श्रद्धानन्द धारण किया था। स्वामी जी ने शिक्षा जगत सहित देश की आजादी, दलितोद्धार, शुद्धि, सामाजिक आन्दोलनों व समाज सुधार के महनीय कार्यों को किया। इनका संक्षिप्त परिचय हम इस लेख में दे रहे हैं। सन् 1901 में स्वामी जी ने अपनी पुत्री अमृत कला का जाति-बंधन तोड़कर डा. सुखदेव जी से विवाह कराया था। सन् 1907 में देश में जन-जन की भाषा हिन्दी के महत्व के कारण अपने उर्दू पत्र ‘सद्धर्म प्रचारक’ को हिन्दी में प्रकाशित करना आरम्भ कर दिया था। स्वामी श्रद्धानन्द जी सन् 1909 में आर्यसमाज की शिरोमणी सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली के प्रथम प्रधान बने थे। सन् 1909 में स्वामी जी ने गुरुकुल कुरुक्षेत्र की स्थापना की थी। आज भी यह गुरुकुल फल फूल रहा है। स्वामी जी को सन् 1913 में भागलपुर (बिहार) में ‘अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ का अध्यक्ष बनाया गया था। आजादी के इतिहास में दिल्ली में एक अद्भुत घटना घटी थी। सन् 1919 में 30 मार्च को चांदनी चैक में अंग्रेजों की गोरी सेना की संगीनों के सामने स्वामी श्रद्धानन्द ने अपना सीना तानकर सिंह-गर्जना की थी। वह बोले अंग्रेज सैनिको को बोले थे ‘हिम्मत है तो चलाओ गोली’। इस सिंह-गर्जना को सुनकर गोरे सैनिकों की संगीने नीचे झुक गयी थी। आजादी के इतिहास की यह एक दुर्लभ अद्वितीय घटना है। इस घटना से दिल्ली में सभी भारतवासी प्रसन्न, आह्लादित व रोमांचित हुए थे। इसके वीरता के लिए स्वामी जी को सम्मानित करने के लिये 4 अप्रैल, 1919 को दिल्ली की जामा मस्जिद में आमंत्रित कर उसके मिम्बर से स्वामी जी का सम्बोधन कराया गया था। यहां स्वामी जी ने वेदमंत्र बोल कर हिन्दू व मुसलमानों को देशभक्ति व परस्पर प्रेम का सन्देश दिया था। इसके बाद किसी हिन्दू विद्वान व नेता को यह जामा मस्जिद के मिम्बर से लोगों को सम्बोधन करने का सौभाग्य नहीं मिला।

सन् 1919 में बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक शान्तिपूर्ण सभा में उपस्थित सभी देशभक्त लोगों पर अंग्रेजों ने गोलियां चलाकर मार डालने का प्रयत्न किया। बड़ी संख्या में स्त्री, पुरुष व बच्चे इसमें मारे गये थे। इसके विरोध में 26 दिसम्बर, 1919 को अमृतसर में कांग्रेस का ऐतिहासिक अधिवेशन हुआ था। इस अधिवेशन का स्वागताध्यक्ष स्वामी श्रद्धानन्द जी को बनाया गया था। इसकी विशेषता यह रही कि स्वामी श्रद्धानन्द जी ने कांगे्रस के मंच से प्रथमवार हिन्दी में अपना स्वागत भाषण पढ़ा। इसमें उन्होंने दलितोद्धार की भी चर्चा की थी। इसका विस्तृत विवरण स्वामी श्रद्धानन्द जी विषयक ग्रन्थों में पढ़ने को मिलता है जिसे सभी बन्धुओं को पढ़ना चाहिये। स्वामी जी ने 1920 में बर्मा की यात्रा की थी। उन्होंने नागपुर कांग्रेस में दलितोद्धार की योजना वा कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया था। दलितोद्धार के कार्यो से प्रभावित दलितों के सबसे बड़े नेता डा. भीमराव अम्बेडकर जी ने लिखा है कि स्वामी श्रद्धानन्द दलितों के सबसे बड़े हितैषी थे। दलितों के प्रति उनकी की गई सेवा का मूल्यांकन कौन कर सकता है?

स्वामी जी समाजहित के सभी कार्यों अग्रणीय भूमिका निभाते थे। सिखों के सन् 1922 के आन्दोलन ‘गुरु का बाग मोर्चा’ के अवसर पर स्वामी श्रद्धानन्द जी ‘अकाल तख्त, अमृतसर’ में भाषण देकर जेल गए थे। उनको पशुओं को रखे जाने वाले पिंजड़े में रखकर यातनायें दी गई थी। स्वामी जी ने सन् 1923 में आगरा में ‘शुद्धि सभा’ का स्थापना की थी। इसके अन्तर्गत बड़े पैमाने पर धर्मान्तरित हिन्दु बन्धुओं की शुद्धि की गई थी। स्वामी जी दलितोद्धार के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग हुए थे। राजनीति में हिन्दू हितों की पूर्णतया उपेक्षा की जाती थी। इस कारण स्वामी श्रद्धानन्द जी ने सन् 1923 में हिन्दू महासभा में प्रवेश किया था। उन्होंने हिन्दू संगठन नाम से एक लघु ग्रन्थ भी लिखा है जो सभी हिन्दुओं के पढ़ने योग्य है। आश्चर्य है कि आज भी हिन्दू नेता, संगठन तथा विशाल हिन्दू समाज अपने हितों की स्वयं ही उपेक्षा कर रहे हैं तथा अपने भविष्य की चिन्ता नहीं करते। यदि वह स्वामी श्रद्धानन्द जी की हिन्दू-संगठन पुस्तक को पढ़ लें तो आज भी हम हिन्दू समाज की रक्षा कर सकते हैं और इसको नष्ट करने के जो षडयन्त्र हो रहे हैं, उस पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए हिन्दुओं को जागने व जगाने की आवश्यकता है।

स्वामी श्रद्धानन्द जी ने सन् 1924 में गांधी जी के निमन्त्रण पर बेलगाम-कांग्रेस में दर्शक-रूप में भाग लिया था। स्वामी जी ने सन् 1924 में वायकम (केरल) में जाति-पाँति तथा ऊंच-नीच की सामाजिक प्रथाओं के विरुद्ध सत्याग्रह का नेतृत्व भी किया था। स्वामी जी ने कर्नाटक, आंध्र तथा चेन्नई प्रान्तों व नगरों की भी ऐतिहासिक यात्रायें की थीं। सन् 1925 में मथुरा में ऋषि दयानन्द जी की जन्म शताब्दी के अवसर पर एक विशाल समारोह का आयोजन किया गया था। इसका नेतृत्व भी स्वामी जी ने ही किया। सन् 1925 में स्वामी जी दक्षिण भारत में वेद प्रचारार्थ गये थे। स्वामी जी के एक शिष्य व उच्चे कोटि के वैदिक विद्वान पं. धर्मदेव विद्यामार्तण्ड जी ने जीवन भर दक्षिण भारत में रहकर वेद प्रचार का कार्य किया।

स्वामी जी के दलितोद्धार व शुद्धि के कार्यों से विधर्मी उनके शत्रु बन गये थे। 23 दिसम्बर, 1926 को एक षडयन्त्र करके एक क्रूर हत्यारे अब्दुल रशीद द्वारा रुग्णावस्था में छल से स्वामी जी पर गोलियों का प्रहार किया गया जिससे वह वीरगति को प्राप्त हुए।

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