16 संस्कार और भारत की वैश्विक संस्कृति, भाग 4

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7 — अन्नप्राशन संस्कार

जब बालक 6 माह का हो जाए तो उसे पहली बार अन्न ग्रहण कराया जाना चाहिए । शास्त्रों की व्यवस्था है कि इस अवसर पर भी यज्ञ करना चाहिए । जिससे पहली बार अन्न ग्रहण करने वाले बालक के हृदय और मस्तिष्क में यज्ञ की परोपकारी भावना विकसित हो। उसका एक संस्कार उसके भीतर अंकित हो।
पारस्कर गृह्यसूत्र के अनुसार छठे माह में अन्नप्राशन संस्कार होना चाहिए। जिस बालक का पाचन दुर्बल हो उसका अन्नप्राशन संस्कार सातवें माह में जन्म दिवस पर कराएं। इस अवसर पर माता – पिता बच्चे में शक्तिकरण की भावना स्थापित करने के भाव के साथ यज्ञ पर बैठें । ऐसी भावना रखनी चाहिए कि बच्चे का श्वसन तंत्र और पांचों इंद्रियां परिशुद्ध हों और वह सदैव स्वस्थ रहे।
यदि माता अपना दूध छुड़ाना चाहती है तो उसे शिशु को धीरे – धीरे अपने दूध के स्थान पर गाय का दूध पिलाने का क्रम आरंभ करना चाहिए । प्रारंभ में गाय के 150 ग्राम दूध में 50 या 60 ग्राम उबला हुआ पानी और एक चम्मच मीठा डालकर बच्चे को पिलाना चाहिए । दूध की मात्रा को धीरे – धीरे बढ़ा सकते हैं और फिर जब भी बच्चे को भूख लगे तो उसे मां अपने दूध के स्थान पर गाय का दूध दे सकती है। चौथे सप्ताह से बच्चे को फलों का रस व सब्जी का रसा भी दिया जा सकता है। उसके पश्चात दही शहद सब्जी के माध्यम से धीरे-धीरे बच्चे को भोजन पर लाया जा सकता है । इस प्रक्रिया को अपनाने से बच्चे को कभी भी किसी प्रकार का कोई शिशु रोग नहीं सताता।
वास्तव में बच्चे को धीरे – धीरे भोजन पर लाने की इस प्रक्रिया से संयम और धैर्य का संस्कार बच्चे के भीतर विकसित होता है । माता जितना संयम और धैर्य बरतते हुए अपने शिशु को ठोस आहार पर ला सकती है , उतने ही अनुपात में उस बच्चे के अंदर भी यह संस्कार प्रबल होता है कि उसे जीवन में हितभुक , ऋतभुक और मितभुक बने रहकर अपने स्वास्थ्य की रक्षा करनी है ।
वास्तव में यह संस्कार बहुत महत्वपूर्ण है , क्योंकि आजकल लोगों में अधिक बीमारियां पाए जाने का एकमात्र कारण यही है कि लोग हितभुक , मितभुक और ऋतभुक नहीं रह पाए हैं। जबकि हमारे ऋषि लोग प्राचीन काल से ही इस प्रकार के संस्कार को कराकर समाज में निरोगिता का संदेश दिया करते थे । निरोगिता को आज 80 वर्ष का वृद्ध भी उतना नहीं अपना पाता , जितना हमारे यहां पर बच्चे को 8 माह की अवस्था में बता व समझा दिया जाता था । इस प्रकार बच्चे की शिक्षा हमारे यहां पर 5 वर्ष के पश्चात नहीं ,अपितु उसके जन्म की प्रक्रिया अर्थात गर्भाधान संस्कार से ही प्रारंभ हो जाती थी , जिसे आज भी समझने की आवश्यकता है।

8 — चूड़ाकर्म संस्कार

जब सृष्टि की रचना हुई तो वैज्ञानिकों का कहना है कि उस समय बहुत देर तक वर्षा होती रही । बहुत लंबे काल के पश्चात वर्षा के शांत होने पर वनस्पति पेड़ पौधे आदि उगे । धीरे – धीरे ऋतुएं बनीं और प्राणी जगत की रचना का क्रम आरंभ हुआ । कहने का अभिप्राय है कि नयी रचना सृजना से पहले या उसके होते समय कुछ विशेष कष्ट उठाना ही पड़ता है । मां को भी नये सृजन के समय अर्थात बच्चे के प्रसव के समय कष्ट भोगना पड़ता है । इसी प्रकार जब शिशु के दांत निकलते हैं तो उसकी इस नई सृजना के लिए भी उसे कुछ कष्ट होता है । उस समय इस कष्ट के कारण बच्चा चिड़चिड़ा भी हो जाता है । यह प्रक्रिया एक वर्ष से आरंभ होकर 3 वर्ष की अवस्था तक पूर्ण हो जाती है।
इस अवस्था में बच्चे का सिर भारी हो जाता है । सिर में गर्मी बढ़ जाती है । मसूड़े फूल जाते हैं । आंखें आ जाती हैं । जिससे उसके मुंह में लार अधिक बनती है । यही कारण रहा कि इस अवस्था में हमारे ऋषि पूर्वजों ने मुंडन संस्कार कराने का प्रावधान किया । जिससे सिर में कुछ ठंडक अनुभव हो और बच्चे की चिड़चिड़ाहट में कमी आए।
आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक इन त्रिताप से रहित करके बच्चे को समृद्धमय जीवन जीने के लिए प्रेरित करना या उसे ऐसी कला सिखाना इस संस्कार का विशेष उद्देश्य है। सत , रज , तम इन तीनों से यह संसार चक्र चल रहा है । जिसे समझना बहुत आवश्यक है । त्रिदोष , त्रिगुण आदि कई त्रिक हमारे सांस्कृतिक मूल्यों में ऐसा स्थान पाए हुए हैं जिन्हें समझने की बहुत आवश्यकता है। इसी को समझने के लिए हमारे सिर का ठंडा रहना बहुत आवश्यक है। यदि सिर गर्म है तो पढ़ाई लिखाई का कोई भी कार्य नहीं हो सकता । जब पढ़ाई लिखाई नहीं होगी तो किसी भी प्रकार का अनुसंधान या आविष्कार भी नहीं हो सकेगा। ऐसी स्थिति में तीन गुणों को समझना भी संभव नहीं है। इसलिए संस्कार रूप में बच्चे को मुंडन संस्कार के माध्यम से यह संकेत दिया जाता है अथवा उसके भीतर यह संस्कार प्रबल किया जाता है कि तुझे बड़ा होकर ज्ञान की गहराई को नापना है ।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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