महाभारत की शिक्षाप्रद कहानियां अध्याय – १२ क राजा सेनजित और ब्राह्मण का संवाद

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( मृत्यु शय्या पर पड़े भीष्म से राजधर्म का उपदेश लेते हुए युधिष्ठिर ने अनेक प्रकार के प्रश्न किए। धर्म और नीति में निपुण गंगानंदन भीष्म ने भी अपनी निर्मल बुद्धि से युधिष्ठिर के प्रत्येक प्रश्न का शास्त्रसंगत उत्तर देने का सफल प्रयास किया । युधिष्ठिर प्रश्न पूछते जा रहे थे और भीष्म पितामह अपने दीर्घकालिक अनुभवों और शास्त्र ज्ञान के आधार पर उनकी शंकाओं का समाधान करते जा रहे थे। उस समय उन्होंने कई प्रकार के इतिहासवृत्त सुनाए और अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए कुछ ऐसे संवाद भी सुनाए जिनसे युधिष्ठिर के प्रश्नों का सही-सही उत्तर मिल सकता था। भीष्म पितामह उस समय जैसी स्थिति में इस प्रकार के इतिहासवृत्त सुना रहे थे, उस समय उन्हें असीम वेदना का शिकार होना पड़ रहा था। परंतु इसके उपरांत भी वह इस बात से बहुत अधिक प्रसन्न थे कि युधिष्ठिर के रूप में हस्तिनापुर को ही नहीं बल्कि समस्त भारतवर्ष को एक सुयोग्य, धर्मशील, न्यायकारी और प्रजावत्सल राजा मिल गया था। भीष्म का प्रजावत्सल भाव देखिए कि वह अपनी वेदना को भूलकर उस समय राष्ट्र की वेदना के प्रति कहीं अधिक गंभीर हैं। वह नहीं चाहते कि भविष्य में कोई नया दुर्योधन खड़ा हो? इसके लिए वह धर्म ,नीति और न्याय से भरी उस प्रत्येक बात को युधिष्ठिर को बता देना चाहते हैं जिससे उनके बाद एक शांतिपूर्ण परिवेश स्थापित हो और प्रजाहित को दृष्टिगत रखते हुए राजा न्यायपूर्ण शासन कर सके । उस समय भीष्म जी के जाने की घड़ी है, पर जाने की घड़ी में भी वह भारत की भव्यता को स्थापित करने का अनमोल चिंतन दे रहे हैं। राष्ट्र के प्रति ऐसा समर्पण हमारे लिए आज भी अनुकरणीय है। – लेखक)

युधिष्ठिर ने अपने पितामह से पूछा कि “धन के नष्ट हो जाने पर अथवा स्त्री, पुत्र या पिता के मर जाने पर जिस बुद्धि के द्वारा मनुष्य अपने सुख का निवारण कर सकता है या सुख का निवारण करने में सफल हो सकता है, कृपया मुझे उस बुद्धि के बारे में बताने का कष्ट करें।”
धर्मराज युधिष्ठिर के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए भीष्म जी बोले कि “राजन ! जब धन नष्ट हो जाता है अथवा स्त्री पुत्र या पिता की मृत्यु हो जाती है, तब संसार के दु:खमय होने पर मनुष्य को विचार करना चाहिए। सोचना चाहिए कि यह संसार दु:खों से भरा है। इसमें जो कुछ भी दिखाई दे रहा है वह सब कुछ क्षणभंगुर है। कब कौन किसका हाथ और साथ छोड़ जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। जिन संबंधों में आदमी सुख खोजता है वह सब भी कुछ देर के ही होते हैं। यहां स्थाई कुछ भी नहीं है। स्थिर भी नहीं है। सब कुछ परिवर्तनशील है। उस समय उस व्यक्ति को शम ,दम आदि साधनों का अनुष्ठान भी करना चाहिए।”
अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उस समय भीष्म जी ने युधिष्ठिर को एक संवाद सुनाना आरंभ किया । उन्होंने कहा कि किसी ब्राह्मण ने राजा सेनजित के पास आकर उन्हें उस समय जिस प्रकार का उपदेश किया था, इस प्राचीन इतिहास को विद्वान लोग एक दृष्टांत के रूप में बताया करते हैं। मैं भी चाहता हूं कि उसे इस समय आपको भी बताया जाए।
“युधिष्ठिर ! बहुत पुराने समय की बात है ,जब राजा सेनजित का पुत्र मृत्यु को प्राप्त हो गया था। राजा अपने पुत्र के असमय मृत्यु को प्राप्त हो जाने की शोकाग्नि में जल रहे थे। दिन-रात वह अपने पुत्र को याद करते और शोक में डूबे रहते। उनका दु:ख असीम था और वह उस दु:ख सागर से जितना ही बाहर निकलने का प्रयास करते थे , निकल नहीं पाते थे। राजकार्य से भी उनका मन ऊब चुका था और सारी दुनियादारी भी उन्हें अच्छी नहीं लग रही थी। चौबीसों घंटे उनके मन मस्तिष्क में अपने पुत्र की स्मृतियां चढ़ी रहती थीं।
एक ब्राह्मण ने जब उनकी इस प्रकार की मनोदशा को देखा तो वह समझ गया कि राजा पर इस समय पुत्र की मृत्यु का शोक प्रभावी हो चुका है। ब्राह्मण ने अनुमान लगाया कि यदी राजा को इस समय शोकसागर से उबारा नहीं गया तो इससे राष्ट्र का भारी अहित होगा। राजा का अनुकरण करते हुए जनता भी इसी प्रकार शोक मनाएगी तो सारा राष्ट्र ही शोक में डूब जाएगा।
तब उस ब्राह्मण ने राजा से कहा कि “राजन ! तुम एक मूढ़ मनुष्य की भांति जिस प्रकार शोक में डूबे हुए हो, यह तुम्हारे लिए शोभा नहीं देता। तुम्हें इस समय यह ध्यान रखना चाहिए कि तुम एक व्यक्ति ही नहीं हो बल्कि देश के राजा भी हो। यदि राजा इस प्रकार शोक में डूबेगा तो जनता का क्या हाल होगा ? तुम्हें इस समय यह सोचना चाहिए कि मैं स्वयं भी शोक के योग्य ही हूं । आज जिस गति को मेरा पुत्र प्राप्त हुआ है, कल यही गति मेरी होगी। जिस समय मैं संसार से चला जाऊंगा, उस समय मेरे परिजन और प्रियजन मेरे लिए भी ऐसा ही शोक करेंगे। अनादि काल से शोक मनाने की यह परंपरा इसी प्रकार चली आ रही है। आज जो कुछ आपके साथ हुआ है, वह कोई नई घटना नहीं है। इससे पूर्व ऐसी घटनाएं कितने ही पिताओं के साथ घटित हो चुकी हैं और भविष्य में भी होती रहेगी।”
ब्राह्मण ने कहा कि “राजन ! आपको समझना चाहिए कि संसार में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो आकर के गया नहीं हो या जिसे आने के बाद जाना ना पड़े । आपको यह समझना चाहिए कि इस असार – संसार में आवागमन का चक्र लगा हुआ है । हमें समझना चाहिए कि संसार में आना जाने के लिए ही है और जाना आने के लिए बना है । फिर इस खेल को समझ कर भी तुम मूढ़ लोगों की भांति शोक में डूबते जा रहे हो ? सचमुच आपके लिए इस प्रकार से शोक में डूबना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता। आपको इस समय ज्ञानियों का सा व्यवहार करना चाहिए। मृत्यु को एक अतिथि के रूप में देखना चाहिए। वह अतिथि के रूप में आई और अपना सामान लेकर चली गई।”

डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह कहानी मेरी अभी हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तक “महाभारत की शिक्षाप्रद कहानियां” से ली गई है . मेरी यह पुस्तक ‘जाह्नवी प्रकाशन’ ए 71 विवेक विहार फेस टू दिल्ली 110095 से प्रकाशित हुई है. जिसका मूल्य ₹400 है।)

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