लोकतंत्र की नींव मताधिकार**

Screenshot_20231112_150745_Chrome

**

संविधान की मुख्य अपेक्षाएं हैं- प्रत्येक नागरिक को न्याय मिले, उसे अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में यथायोग्य आगे बढ़ने की स्वतंत्रता हो, उसके प्रति किसी प्रकार का जाति , धर्म, भाषा और लिंग के आधार पर भेदभाव न हो और राष्ट्र में बंधुत्व की भावना का संचार हो। इन्हीं उद्देश्य की पूर्ति के लिए संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत सभी 18 वर्ष और उससे अधिक उम्र के नागरिक को गुप्त रूप से मतदान करने का अधिकार है। भारतीय संविधान में मतदान करना “नागरिक की गरिमा का प्रतीक” माना गया है। अब नागरिकों पर निर्भर है कि वह अपनी गरिमा को कैसे कायम रखें ?संविधान की रक्षा के आलोक में मतदान करना ही नागरिक गरिमा है।
नवंबर 2023 में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना में होने वाले चुनाव की थीम है- ‘वोटिंग बेमिसाल, मैं अवश्य वोट दूंगा देता हूं’। इस थीम को पढ़ने भर से मतदाता अपने आप शपथ ले लेता है कि वह वोट देगा।
प्रजातंत्र में ‘मतदान’ वह योग्यता परख गोपनीय दान है जो जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन चलाने के योग्य उम्मीदवार को दिया जाता है । स्मरण रहे कि योग्य उम्मीदवार को किया गया दान राष्ट्रीय हित में होता है। हमारे द्वारा हमारे मतदान से चुना गया व्यक्ति विधायिका का अंग बनता है और 5 साल के लिए शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलने में हम भूमिका निभाता है। दिखने में मतदान करना सरल लगता है, लेकिन यह मतदान वास्तव में बहुत ही कीमती है। इसलिए संविधान निर्माताओं ने बहुत ही गहन मंथन के बाद मत के दान को गुप्त रखने की भावना व्यक्त की गई है।
2023 की चुनाव प्रक्रिया के संदर्भ में युवा मतदाताओं के संज्ञान में लाया जाता है कि भारत में 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के अनुसार केवल अच्छी सामाजिक, आर्थिक स्थिति वाले नागरिकों को मत देने का अधिकार था। बाद में संशोधन होते चले गए और भारत शासन अधिनियम 1919 के द्वारा पहली बार महिलाओं को मत देने का अधिकार मिला । संविधान आत्मसात करने के बाद प्रत्येक नागरिक को मतदान करने का अधिकार प्राप्त हुआ और 25 अक्टूबर 1951 और 21 फरवरी 1952 में पहली बार लोकसभा के आम चुनाव हुए। उसके बाद तो चुनाव का सिलसिला ऐसा चला कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा है । कभी लोकसभा चुनाव,कभी विधानसभा चुनाव, कभी स्थानीय निकाय चुनाव , कभी उप चुनाव तो कभी मध्यवर्ती चुनाव। चुनाव ही चुनाव !!
प्रजातंत्रात्मक देशों में यह धारणा बलवती होती जा रही है कि जिस देश में जितना अधिक नागरिक अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं, उसे देश के नागरिकों को उतना ही अधिक प्रजातांत्रिक समझा जाता है। मतदान का आधिकाधिक एवं सही उपयोग करने के क्षेत्र में भारत काफी पीछे है।
मतदान प्रक्रिया में बढ़ चढ़कर भाग नहीं लेना भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा दोष है। हमारे देश में भ्रष्टाचार, सुव्यवस्थित मतदाता शिक्षा एवं जनभागीदारी शिक्षा के प्रचार प्रसार की कभी भी कोशिश नहीं की गई ? जबकि निर्वाचन प्रक्रिया को लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया तथा देश की आर्थिक, सामाजिक, नैतिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विकास के लिए आवश्यक माना जाता है।
शिक्षा का अभाव तथा जाति व्यवस्था के चलते हमारे देश में चुनाव कभी भी निष्पक्ष नहीं हुए हैं। प्रत्येक चुनाव में जातिवाद एवं बाहुबल हमेशा से हावी रहा है। देश के कुछ क्षेत्रों में बाहुबलियों का वर्चस्व रहा है और वह हमेशा धनबल और बाहुबल के आधार पर चुनाव को प्रभावित करते रहे हैं।
1951 से लेकर के 2023 तक के चुनाव का निष्पक्ष विश्लेषण करने पर पाते हैं कि चुनाव प्रक्रिया को दूषित करने में सामंतों , राजा- महाराजाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। उनका राज्य सिंहासन तो चला गया। ‘प्रिवी पर्स’ राजा महाराजाओं को उनका खर्च चलाने के सुविधा भी 1971 में खत्म हो गई , लेकिन वे राजनीति में अपना वर्चस्व बनाए रखे हुए हैं और चुनाव में खड़े होकर के मतदाताओं को श्रीमंत की उपाधि से लुभाते रहे हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों के साथ साथ मध्य प्रदेश और राजस्थान भी अभी तक राजा- महाराजाओं के मकड़जाल से बाहर नहीं निकला है।
अब मतदाताओं की सोच पर निर्भर है कि वह संविधान प्रदत्त अधिकार का उपयोग किस तरह करें ? राजनीतिक दल तो येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करना चाहते हैं और यह उनका उद्देश्य भी है। कहते हैं राजनीति में सब जायज़ है। झूठे वादे तो इतने जायज़ है कि उन्हें नकारा नहीं जा सकता। अच्छा से अच्छा चरित्रवान नागरिक भी इन झूठे वादों के जाल में फंस जाता है। अब तक का अनुभव यही बताता है कि मतदाता अभी पूर्ण रूप से संविधान की मंशा के अनुरूप मतदान करने की कला नहीं सीखा है !!
शायद यही कारण है कि मजबुरी में चुनाव आयोग ने मतदाता शिक्षा, मतदान जागरूकता बढ़ाने और मतदाता साक्षरता का समर्थन करने जैसे कार्यक्रम चलने का निर्णय लिया। स्वीप कार्यक्रमों से मतदान का प्रतिशत तो बढ़ेगा लेकिन जातिवाद, बाहुबल और क्षणिक लोभ लालच की मानसिकता के चलते संविधान सभा द्वारा व्यक्त की गई -‘निष्पक्ष मतदान, जागरुक मतदाता की पहचान’ कल्पना कुछ और वर्षों तक दिवास्वप्न ही रहेगी!!
डॉ बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’

Comment:

mariobet giriş
mariobet giriş
betpark giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
hilarionbet giriş
hilarionbet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
hilarionbet giriş
hazbet giriş
hazbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
celtabet giriş
celtabet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş