07_05_2023-rajasthan_assembly_election_page (1)

राहुल गांधी ने राजस्थान के पिछले विधानसभा चुनाव के समय लोगों को झूठे सपने दिखाकर राजस्थान की सत्ता तो हथिया ली थी पर जिस प्रकार पिछले 5 वर्ष इस राज्य में कांग्रेस अंतर्कलह का शिकार बनी रही और जिस प्रकार किए गए वायदों पर पानी फेर दिया गया उसके चलते इस बार कांग्रेस के लिए सत्ता में लौटना बहुत कठिन है। यही कारण है कि ऊपर से अपने आपको सामान्य दिखाते हुए भी कांग्रेस के राहुल गांधी सहित सभी नेता परेशान हैं। अशोक गहलोत को भी पता चल रहा है कि वह 5 वर्ष चाहे सरकार चलाने में सफल हो गए हैं पर अगले 5 वर्ष के लिए जनादेश प्राप्त करने में वह सफल होने वाले नहीं हैं । इसी प्रकार सचिन पायलट को भी पता चल गया है कि उन्होंने चाहे जितना ऊधम मचाया पर जैसे वह अपने उस ऊधम में सफल नहीं हो पाए थे, वैसे ही अब पार्टी को दोबारा सत्ता में लाने में भी वह सफल होने वाले नहीं हैं। राहुल गांधी ने लोगों को झूठ बहकाया, झूठे वायदे किए , झूठे नारे लगवाए। अब उनके इन झूठों का हिसाब होने वाला है। अशोक गहलोत परेशान हैं कि वह कुर्सी बचाने के प्रति जितने गंभीर रहे, उतने काम के प्रति गंभीर नहीं रह पाए ।जबकि सचिन पायलट जिन मतदाताओं के भरोसे अपने आपको मुख्यमंत्री का दावेदार बताकर इस पद को लेने के लिए संघर्ष करते रहे , उसमें यदि वह सफल नहीं हो पाए तो समझ जाना चाहिए कि उनके भीतर नेतृत्व के गुण नहीं हैं।
राजस्थान के मतदाता अभी तक हर पांचवें साल में सत्ता दूसरी पार्टी को देते रहे हैं। इसका लाभ लेने में राजस्थान में महारानी के नाम से मशहूर भाजपा की वसुंधरा राजे सिंधिया पूर्व में सफल हो चुकी हैं। पिछली बार ही लोग वसुंधरा से नाराज थे। इसलिए वहां के मतदाताओं ने भाजपा से सत्ता छीनकर कांग्रेस को दी। भाजपा 5 वर्ष में अपनी इस नेत्री से अपना पिंड नहीं छुड़ा पाई । भाजपा की यह महत्वाकांक्षी नेत्री इस बार फिर भाजपा के लिए रोड़ा अटकाने का प्रयास कर रही है, परंतु बीजेपी ने इस बार एक नया चेहरा बाबा बालकनाथ योगी के रूप में देकर समीकरण को कुछ सही बनाने का प्रयास किया है। यदि भाजपा इस बार सत्ता में आ रही है तो इसके लिए पीएम मोदी का काम, बाबा बालक नाथ योगी का चेहरा और हर पांचवें साल में सत्ता को बदल देने की राजस्थान के मतदाताओं की प्रवृत्ति ही जिम्मेदार होगी। चुनाव के बाद सत्ता महारानी को ना मिले, इस ओर भाजपा को ध्यान देना होगा। राजस्थान के मतदाता विजय राजे सिंधिया को महारानी प्रेम से नहीं बल्कि व्यंग्य में कहते हैं । क्योंकि वसुंधरा के भीतर सामंती सोच गहराई तक बैठी है।
राजस्थान की 200 सीटों के लिए चुनाव पूर्व कराए गए दो सर्वेक्षणों ने कांग्रेस को दिन में तारे दिखा दिए हैं। कांग्रेस के लिए यह तथ्य बहुत ही चिंताजनक है कि उसे इन विधानसभा चुनावों में 50 से 72 सीटें ही मिल पा रही हैं। इसके विपरीत भाजपा को 120 से 130 सीटें मिलती दिखाई दे रही हैं। कहने का अभिप्राय है कि कांग्रेस के ‘हाथ’ से सत्ता बहुत ही अपमानजनक स्थिति के साथ निकलती जा रही है। भाजपा के लिए 2024 जीतना भी बहुत आवश्यक है। वह इस बार इस प्रांत को खोना नहीं चाहेगी। इसलिए बहुत सधी हुई रणनीति के साथ वह आगे बढ़ रही है। वह देश के अन्य प्रदेशों के मतदाताओं को यह दिखाना चाहती है कि राजस्थान जैसा बड़ा प्रांत भी उसके साथ है । निश्चित रूप से इस राज्य में यदि भाजपा को उसकी अपेक्षाओं के अनुसार सीट मिलती हैं और शानदार जीत के साथ उसकी ताजपोशी होती है तो इसका प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा। कांग्रेस टिकट बांटने में जितनी जल्दी दिखा रही थी, उतनी ही अधिक उलझती भी दिखाई दी है। जबकि भाजपा ने अपने सभी कामों को बड़ी सहजता से संपन्न कर लिया है।
कांग्रेस के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण और रेवड़ी बांटने की राजनीति इस समय गले की फांस बन चुकी है। गले काटने वाले लोगों के प्रति कांग्रेस जिस प्रकार नरमी दिखाते हुए उनके साथ पेश आती रही है, उसे इस समय राजस्थान का मतदाता बड़ी गहराई से समझ चुका है। यह बात सही है कि गरीब मजदूर के लिए रोजी-रोटी बहुत बड़ी समस्या होती है और वह इन चीजों को देखकर ही किसी राजनीतिक दल का साथ देता है, पर यह बात हमेशा सच नहीं होती है कई बार ऐसे मौके भी आते हैं जब लोग छोटी बातों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाते हुए निर्णय लेते हैं। इस बार यदि कांग्रेस को उसकी नीतियों के आधार पर राजस्थान का मतदाता नकारकर भाजपा के बाबा बालक नाथ को सत्ता की ओर बढ़ने की अनुमति दे रहा है ( ? ) तो इसके बड़े गहरे अर्थ हैं।
देश को आजाद हुए 75 वर्ष हो गए। पर कांग्रेस ने तुष्टिकरण की राजनीति के दुष्परिणामों की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। वह निरंतर हिंदू विरोध से राष्ट्र विरोध की राजनीति करने पर आमादा रही है। हमारा मानना है कि सत्ता में बैठे लोगों को किसी भी संप्रदाय विशेष का पक्ष पोषण नहीं करना चाहिए। उसे राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाते हुए सही निष्कर्ष और निर्णय पर पहुंचना चाहिए। इसी को पंथनिरपेक्षता कहते हैं। पर जब सरकारें अपने आप को पूर्वाग्रह ग्रस्त हुआ दिखाती है और प्रत्येक परिस्थिति में स्वयं को किसी विशेष वर्ग की ओर झुका हुआ दिखा देती हैं तो उस दूसरे पक्ष का आहत होना स्वाभाविक है। दुर्भाग्य से कांग्रेस ऐसा ही आचरण करती रही है।
राहुल गांधी राजस्थान के चुनाव परिणाम से परिचित हो चुके हैं। इसलिए वह चुनाव में गहरी रुचि नहीं दिखा रहे हैं। राजस्थान के प्रति उनका ऐसा व्यवहार इस समय कांग्रेसियों के लिए भी चिंता का विषय बन चुका है। उनके भीतर उत्साह नहीं है। पराजित मानसिकता का भाव उन पर हावी हो चुका है। कहा जाता है की ‘छोटी सोच और पैर की मोच’ व्यक्ति को आगे नहीं बढ़ने देती है। इस समय राहुल गांधी की कांग्रेस राजस्थान में ‘पैर की मोच’ से परेशान है। जहां तक ‘छोटी सोच’ की बात है तो इससे कांग्रेस प्रारंभ से ही ग्रसित रही है। यहां ‘छोटी सोच’ से हमारा अभिप्राय कांग्रेस की तुष्टिकरण और छद्म धर्मनिरपेक्षता की हिंदू विरोधी और राष्ट्र विरोधी राजनीति से है। इसे ‘छोटी सोच’ के साथ-साथ ‘राष्ट्रघातक सोच’ भी कह सकते हैं।
‘सीएनएक्स और इंडिया टीवी’ द्वारा कराए गए सर्वेक्षणों से पता चलता है कि जयपुर धौलपुर की कुल 48 विधानसभा सीटों में से 28 पर बीजेपी जीत का परचम लहराती हुई दिखाई दे रही है। जबकि कांग्रेस खींचतान कर 17 सीटों पर आगे बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। टोंक- कोटा अर्थात सचिन पायलट के गढ़ में भी भाजपा कुल 24 सीटों में से 15 पर बढ़त बना रही है। ‘प्राइम टाइम’ के अनुसार बीजेपी 125 सीटों के साथ सत्ता में आ रही है। कांग्रेस के मंत्रियों का भ्रष्टाचार में लिप्त होना भी बीजेपी की इस शानदार जीत का एक कारण है। इसके अतिरिक्त गुर्जरों का कांग्रेस से दूर होना भी उसके लिए बड़ी सिरदर्दी बन चुका है। फिर भी हमें अभी चुनाव परिणामों की प्रतीक्षा करनी ही चाहिए। पर हमें अपेक्षा करनी चाहिए कि कांग्रेस के नेता अपने आचरण, व्यवहार और नीतियों में सुधार करेंगे।

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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