महाभारत की शिक्षाप्रद कहानियां अध्याय-२ ख लाक्षागृह की कहानी

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दुर्योधन ने अपने पिता की मानसिकता को पहचान लिया कि पिताजी आज पहले से ढीले हो गए हैं। अब उनके सामने केवल एक ही समस्या है कि युधिष्ठिर को यहां से बाहर भेजने के लिए भीष्म, द्रोण और विदुर जैसे विद्वानों को कैसे सहमत किया जाए ? दुर्योधन ने इस बात को भी ताड़ लिया कि यदि इस समस्या का समाधान मिल जाए तो पिताश्री उसे अपनी योजना को क्रियान्वित करने में सहायक हो सकते हैं। स्वभाव से उतावले दुर्योधन ने अब इस बात की प्रतीक्षा करना उचित नहीं माना की फिर दोबारा कभी पिताजी से अकेले में वार्तालाप हो और उन्हें भीष्म, द्रोण और विदुर की सहमति प्राप्त करने का उपाय बताया जाए। उसने वह उपाय भी तुरंत बताने का निर्णय लिया और कहने लगा कि “पिताश्री ! भीष्म तो सदा ही मध्यस्थ रहे हैं। जबकि द्रोण पुत्र अश्वत्थामा इस समय मेरे साथ है । अतः द्रोणाचार्य भी वही बात कहेंगे जो उनका पुत्र चाहेगा। आप इस बात से निश्चिंत रहें कि द्रोणाचार्य राजसभा में आपके किसी प्रस्ताव का विरोध कर पाएंगे। जिस पक्ष में ये दोनों रहेंगे, वह पक्ष स्वाभाविक रूप से मजबूत माना जाएगा। जहां तक विदुर की बात है तो वह हमारे आर्थिक बंधन में है। उसकी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति आप करते हैं , इसलिए इसका विरोध भी अधिक तीखा नहीं हो सकता।”
दुर्योधन ने आज अपने पिता को अपने दिल की वह बात बता दी थी जिस पर वह देर से काम कर रहा था। उसके इस प्रकार के गुणा- भाग को देखकर पहले से ही अपने स्थान से शिथिल हो गया धृतराष्ट्र थोड़ा और नीचे गिरने पर सहमत हो गया । यद्यपि वह मौन रहा, परंतु उस समय का उसका मौन अपने पुत्र दुर्योधन को उसकी सहमति के समान ही लगा। षड़यंत्र पहले से रचा जा चुका था। अब उसका क्रियान्वयन होना आवश्यक था। जिसके लिए पहले दांव पर धृतराष्ट्र को ही लगाया जाना था। आज उस दांव में पूर्ण सफल न होकर भी दुर्योधन सफलता के अत्यंत निकट पहुंच गया था। सारी योजना के पीछे शकुनि जिस प्रकार कार्य कर रहा था उसे इस वार्त्तालाप की पूर्ण जानकारी थी अर्थात उसकी सहमति से ही आज दुर्योधन अपने पिता से अकेले में मिलने गया था।
विनाश की हर योजना अंधेरे में बनती है और उजाले में उसे लागू किया जाता है। यह अत्यंत गोपनीय होती है पर जब उजाले में आकर प्रकट होती है तो अत्यंत भयानक हो जाती है। उस समय योजनाकार भी नहीं जानते कि जब उनकी यह योजना क्रियान्वित होगी तो कितने निरपराध लोगों के खून में स्नान कर चुकी होगी ? हर डकैती की योजना अंधेरे में बनती है, एकांत में बनती है। पर जब क्रियान्वित होती है तो अक्सर कहीं शीलभंग कराती है तो कहीं धन की लूट कराने का अपराध करवाती है और कहीं हत्या भी करवा देती है।
पिता पुत्र के बीच हुए संवाद में यद्यपि आज किसी प्रकार के अपराध पर या भविष्य के किसी खून खराबे पर तो विचार नहीं किया गया था पर यह निश्चित था कि आज के इस संवाद ने भविष्य के महाभयंकर विनाश की भूमिका तैयार कर दी थी।
बीजारोपण के समय जब बीज को धरती में रखा जाता है तो बहुत कम लोग उसे देखते हैं, पर जब वह उपज कर बड़ा होता है तो उसे अनेक लोग देखते हैं। इसी प्रकार पाप भी जब बोया जाता है तो उसे करने वाले और भोगने वाले के अतिरिक्त कई बार कोई भी नहीं देखता पर जब वह फलीभूत होता है तो उसके छींटे दूर-दूर तक जाकर पड़ते हैं।
भारत के अब तक के ज्ञात इतिहास में यह पहला अवसर था जब पिता पुत्र स्वयं मिलकर ही राष्ट्र के विनाश का बीजारोपण कर रहे थे। पिता पुत्र के इस संवाद ने भारत की राष्ट्रनीति की पवित्र भूमि में विषबीज बो दिए। जिससे राष्ट्रनीति राजनीति में परिवर्तित हो गई और बाद की राजनीति ने अनेक अवसरों पर भारत को नीचा दिखाने का काम किया। जब देश का धृतराष्ट्र (राष्ट्रपति) अंधा हो जाए और पुत्रमोह में गूंगा बहरा भी हो जाए तो उस समय राजनीति पथभ्रष्ट और धर्मभ्रष्ट हो ही जाती है।
भारत की राष्ट्रनीति की पवित्र भूमि में विषबीज बोने के लिए तैयार की गई अपनी भूमिका और योजना के अंतर्गत दोनों पिता पुत्र के बीच आज इस बात पर भी सहमति बन गई कि पांचों पांडु पुत्रों को वारणावत भेजने का प्रस्ताव राजसभा से पारित कराया जाए। अपनी कार्य योजना को मूर्त रूप देने के लिए दुर्योधन ने उच्चाधिकारियों और मंत्रियों को धन आदि देकर खरीदना आरंभ कर दिया । कुछ ऐसे चाटुकार मंत्री भी थे जो धृतराष्ट्र की चाटुकारिता करते थे। जिन्होंने दुर्योधन और अपने महाराज धृतराष्ट्र की इच्छा को समझकर ही यह प्रचार करना आरंभ कर दिया कि वारणावत नगर बहुत सुंदर और रमणीय है। स्वयं धृतराष्ट्र ने भी अपने लोगों को इस बात के प्रचार में लगा दिया कि पांडवों को बहकाने के लिए वे इस प्रकार का दुष्प्रचार करें।
धृतराष्ट्र ने जब देखा कि अब पांडवों पर उसके दुष्प्रचार का सही प्रभाव हो गया है तो एक दिन उसने स्वयं ही उनके पास जाकर उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया कि यदि वे वारणावत में लगने वाले मेले में जाना चाहें तो जा सकते हैं। धृतराष्ट्र अपने बेटे दुर्योधन के लिए कुछ भी करने की स्थिति में आ चुका था। उसकी मति मारी गई थी। राजधर्म के सर्वथा विपरीत आचरण करने वाला धृतराष्ट्र न केवल अपनी भौतिक चक्षुओं को खो चुका था बल्कि उसके आंतरिक जगत का प्रकाश अर्थात उसके अन्तश्चक्षु भी उसका साथ छोड़ गए थे। जब व्यक्ति मोह में अंधा हो जाता है तो उसकी यही स्थिति हो जाती है जो उस समय धृतराष्ट्र की हो चुकी थी। जिसके भीतरी जगत में प्रकाश होता है उसे बाहरी जगत अपने भीतरी जगत के प्रकाश से दीखता रहता है। जिसके भीतर अंधेरा हो गया तो उसे बाह्य चक्षु होते हुए भी बाहरी जगत दीखना बंद हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि ‘हिये की फूट जाती हैं’ उसे कुछ दिखाई नहीं देता।
जिस देश का राजा बाहरी और भीतरी दोनों प्रकार की चक्षुओं को खो चुका होता है उसके रहते राष्ट्र में अशांति, उपद्रव, उत्पात, एक दूसरे के अधिकारों के हनन की आपाधापी जैसी विनाशकारी व्याधियां फैल जाती हैं।
धर्मराज जानते थे कि उनके लिए महाराज धृतराष्ट्र ऐसा आदेश क्यों दे रहे हैं ? पर धर्मराज युधिष्ठिर ने मर्यादा निभाने की दृष्टि से संकोच करते हुए धृतराष्ट्र के उपरोक्त आदेश पर “ठीक है, बहुत अच्छा” कह कर अपनी सहमति दे दी। इसके पश्चात धर्मराज युधिष्ठिर ने वहां जाने से पहले भीष्म, कृपाचार्य महाबुद्धिमान विदुर, द्रोणाचार्य, तपस्वी ब्राह्मणों , पुरोहितों, यशस्विनी गांधारी देवी आदि से मिलकर आशीर्वाद लेने की प्रक्रिया आरंभ की । जिसमें उनके अन्य भाई भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव भी साथ रहे। जिस समय वह इन लोगों से आशीर्वाद लेने के लिए निकले, उस समय संशय उनकी स्वयं की बुद्धि में भी था और संशय इन सब विद्वानों की बुद्धि में भी कहीं ना कहीं अपना काम कर रहा था । जब पापपूर्ण और षड़यंत्रकारी परिवेश सृजित हो जाता है तो बुद्धिमान लोगों को कुछ अनहोनी दिखाई देने लगती है । इन सब ज्ञानवृद्ध और वयोवृद्ध लोगों को धृतराष्ट्र के द्वारा पांडुपुत्रों को इस प्रकार आदेश दिए जाने में कोई अनहोनी दिखाई देने लगी थी । यहां तक कि स्वयं धर्मराज भी सशंकित थे। इसीलिए वह बुद्धिमान ,वयोवृद्ध और ज्ञानवृद्ध लोगों के पास उनसे किसी भी प्रकार की अनहोनी होने की स्थिति में अपनी सुरक्षा करने के उपाय पूछने के दृष्टिकोण से आशीर्वाद लेने जा रहे थे।
युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ जिस व्यक्ति से भी आशीर्वाद लेने के लिए गए उसने ही उनके अनुकूल वचन बोलकर उन्हें अपना शुभाशीर्वाद प्रदान किया और परमपिता से प्रार्थना की कि हर स्थिति में आप उनकी रक्षा करें। अंत में धर्मराज अपने भाइयों को साथ लेकर हस्तिनापुर नरेश महाराज धृतराष्ट्र से भी वारणावत जाने की आज्ञा लेने के लिए पहुंचे। धृतराष्ट्र तो पहले से ही पांडवों को हस्तिनापुर से वारणावत भेजने की योजना में संलिप्त था। अतः उसे जैसे ही धर्मराज युधिष्ठिर के आने का प्रयोजन मालूम हुआ तो उसने उन्हें तुरंत वारणावत जाने की आज्ञा दे दी।
इसके पश्चात दुर्योधन ने अगली चाल चली। उसने मंत्री पुरोचन को बुलाकर उसके कान में फूंक मारी कि वह शीघ्रता करते हुए वारणावत जाकर वहां पर एक ऐसा सुंदर भवन तैयार कराए जिसमें विपुल धनराशि खर्च की गई हो और जिसमें चारों ओर कमरे बने हों। इसके साथ ही दुर्योधन ने पुरोचन को यह भी बता दिया कि वह इस भवन में सन तथा राल आदि ऐसे प्रत्येक द्रव्य का प्रयोग करे जो आग पकड़ने में बहुत शीघ्रता करते हैं। इन सबको इस भवन की दीवारों में लगवाया जाए। घी, तेल, चर्बी तथा बहुत सी लाख मिट्टी में मिलवाकर उसी से दीवारों को लिपवाया जाए। इस घर के चारों ओर सन, तेल, घी, लाख और लकड़ी आदि सब वस्तुएं रख दी जाएं। इस बात का पूरा ध्यान रखा जाए कि पांडवों को इस भवन के बनने पर किसी प्रकार की शंका न हो। उन्हें तनिक भी यह आभास नहीं होना चाहिए कि यह भवन आग भड़काने वाले पदार्थ से बना है।
दुर्योधन ने कहा कि इस भवन को इस प्रकार बनवाना कि इसमें दिव्य आसन, सवारी और शय्या आदि की सुंदर व्यवस्था हो और जब मेरे पिताजी को इन सब बातों की जानकारी हो तो उन्हें प्रसन्नता की अनुभूति हो। जब तुम्हें यह भली-भांति ज्ञात हो जाए कि पांडव लोग यहां आश्वस्त होकर रहने लगे हैं, इनके मन में कहीं से भी कोई किसी प्रकार का डर नहीं तो उन सबके सो जाने पर इस भवन में घर के द्वार की ओर से आग लगा देना।
पापी अपने पाप को छुपाने का हर संभव प्रयास करता है। वह दुनिया के लोगों की आंखों में धूल झोंकने का भी प्रयास करता है। दुर्योधन भी अपनी पापपूर्ण प्रवृत्ति को छुपाने के उद्देश्य से प्रेरित होकर कुछ ऐसा ही प्रयास कर रहा था। जब भी कोई पापी किसी प्रकार का पाप करने के लिए चलता है तो उसकी अंतरात्मा उसको ऐसा करने से रोकती – टोकती है। तब वह पापी आत्मा की आवाज को दबाने के लिए भी नए-नए उपाय खोजता है। दुर्योधन भी प्रकृति के इस शाश्वत सिद्धांत का अपवाद नहीं था।
मंत्री पुरोचन ने अपने नेता दुर्योधन की बात को पूर्ण करने के लिए हस्तिनापुर से शीघ्र प्रस्थान किया। उसने गंतव्य स्थल पर जाकर दुर्योधन के कहे अनुसार महल बनाने में देरी नहीं की।
उधर जब युधिष्ठिर हस्तिनापुर से निकल रहे थे तो उस समय उन्हें विदुर ने किसी भी प्रकार की मुसीबत से बचने की शिक्षा देते हुए कहा कि अत्यंत मंदबुद्धि कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र पांडवों को सदा विषम बुद्धि से देखते हैं । उनकी दृष्टि धर्म की ओर नहीं है।
उस समय विदुर जी ने धर्मराज युधिष्ठिर की ओर मुखातिब होते हुए कहा कि “वत्स ! एक ऐसा तीखा अस्त्र है जो लोहे का बना तो नहीं होता परंतु वह शरीर को नष्ट अवश्य कर देता है। जो उसे जान लेता है ऐसे उस शस्त्र के आघात से बचने का उपाय जानने वाले पुरुष को शत्रु नहीं मार सकते।
घास फूस तथा सूखे वृक्षों वाले जंगल को जलाने और सर्दी को नष्ट कर देने वाली आग विशाल वन में फैल जाने पर भी बिल में रहने वाले चूहे आदि जीव जंतुओं को नहीं जला सकती। जो ऐसा समझकर अपनी रक्षा का उपाय करता है, वही जीवित रहता है । जिसकी आंख नहीं है, वह मार्ग नहीं देख पाता। अंधे को दिशाओं का ज्ञान नहीं होता और जो धैर्य खो देता है, उसे सद्बुद्धि प्राप्त नहीं होती। इस प्रकार मेरे समझाने पर तुम मेरी बात को भली-भांति समझ लो ।
मनुष्य घूम फिर कर मार्ग का पता लगा लेता है। नक्षत्र से दिशाओं का ज्ञान प्राप्त कर लेता है और जो अपनी पांचों इंद्रियों को वश में रखता है वह शत्रुओं से पीड़ित नहीं होता।”
धर्मराज युधिष्ठिर अपने चाचा विदुर के द्वारा दिए गए इन संकेतों को पूर्णतया समझ गए थे। क्योंकि वह उस भाषा में पारंगत थे जो सांकेतिक दृष्टिकोण से बातों को समझने के लिए प्रयुक्त की जाती है। उन्होंने विदा लेते समय महाबुद्धिमान विदुर जी से कह दिया कि मैंने आपकी सभी बातों को अच्छी प्रकार समझ लिया है।
जब धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ वारणावत पहुंच गए तो दसवें दिन पुरोचन ने उन्हें उस भवन के बारे में बताया जिसका नाम उसने ‘शिवभवन’ रखा था। यही वह स्थान था जिसमें एक दिन पांडवों के सो जाने के बाद उस दुष्ट के द्वारा आग लगा दी जानी थी। उस भवन के भीतर जाने पर युधिष्ठिर ने विदुर जी के शब्दों को याद कर भीमसेन को स्पष्ट रूप से समझा दिया कि यह घर मुझे आग भड़काने वाली वस्तुओं से बना हुआ दिखाई देता है । जिसमें घी और लाख मिली हुई चर्बी की गंध आ रही है । स्पष्ट है कि यह घर अग्निदीपक पदार्थों से बना हुआ है। भीमसेन ने भी कह दिया कि “भैया ! आप सही कह रहे हैं। मुझे भी लगता है कि यह घर ज्वलनशील वस्तुओं से बना हुआ है। हमारे लिए यही उचित है कि हम यहां से निकलकर अपने उसी भवन में चलें, जिसमें अब तक रह रहे थे।”
इस प्रकार पांडवों को यह भली प्रकार आभास हो गया कि राज्यलोभी दुर्योधन ने हम सबको मारने के लिए ही इस भवन का निर्माण कराया है। उन्होंने यह भी समझ लिया कि यदि हम यहां से सुरक्षित निकलकर हस्तिनापुर लौट गए तो भी दुर्योधन हमको अपने गुप्तचरों से मरवा सकता है। तब उन्होंने यह निर्णय लिया कि हम सब पुरोचन तथा पापी दुर्योधन को धोखे में रखते हुए यहां से निकलकर किसी गुप्त स्थान में चले जाएं। उन्होंने यह भी निर्णय लिया कि हम सब शिकार खेलने के बहाने यहां की भूमि पर चारों ओर विचरण करें, जिससे आपत्ति काल में भाग निकलने के सभी मार्गों की जानकारी हमको हो जाए।
विदुर जी ने पांडवों की रक्षा करते हुए एक व्यक्ति को इस काम में लगा दिया था कि वह दूर से सुरंग खोदता हुआ लाए और उसे इस भवन के बीचों-बीच लाकर खोल दे। जिससे किसी भी आपत्ति काल में पांडव लोग उस सुरंग के माध्यम से बाहर निकलने में वैसे ही सफल हो जाएं जैसे एक चूहा अपने बिल के दूसरे छोर से भागने में सफल हो जाता है। उस सुरंग खोदने वाले मनुष्य ने पांडवों से मिलकर उन्हें यह बता दिया कि विदुर जी ने उसे किस काम के लिए भेजा है ? धर्मराज युधिष्ठिर ने उस सुरंग खोदने वाले व्यक्ति का पूर्ण स्वागत सत्कार किया। साथ ही उससे यह आग्रह भी किया कि वह यथाशीघ्र सुरंग खोदने के कार्य को पूर्ण करे। जिससे हम यहां से सुरक्षित बच निकलने में सफल हो जाएं।
जब सारा कार्य पूर्ण हो गया और सुरंग खोदकर उस महल के बीचों बीच लाकर खोल दी गई तब पांडवों ने उस भवन से बाहर निकलने की योजना बनाई। संयोग से उस समय तेज आंधी चल निकली। भीमसेन ने इस अवसर का लाभ उठाया और उसने उस भवन में उस स्थान पर आग लगा दी जहां पुरोचन सोया हुआ था।
इसके पश्चात पांडवों ने उस भवन के चारों ओर आग लगा दी। जब वह सारा घर आग की चपेट में आ गया तब शत्रुओं का दमन करने वाले पांडव अपनी माता के साथ सुरंग में घुस गए। उधर वहां आग की भीषण ज्वालाएं उठने लगी, महान ताप फैल गया। घर को जलाने वाली उस अग्नि का महान चट-चट शब्द सुनाई देने लगा। इससे उस नगर का जनसमूह जाग उठा। उस घर को जलता देखकर सभी नगरवासियों के चेहरे पर दु:ख की लकीरें साफ झलकने लगीं। वे दुर्योधन और पुरोचन को बुरा भला कह रहे थे। उन्हें यह विश्वास हो रहा था कि जैसे पुरोचन ने आग लगाकर पांडवों को इस भवन में जला दिया है। यद्यपि पुरोचन स्वयं ही इस आग में जलकर खत्म हो गया था। जबकि पांडव अपनी माता के साथ सुरंग के माध्यम से सुरक्षित निकलकर दूर चले गए।
सच ही तो है कि जो दूसरों के लिए गड्ढे खोदता है, वह स्वयं ही उनमें गिरकर अपने हाथ पैर तुड़वा लेता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह कहानी मेरी अभी हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तक “महाभारत की शिक्षाप्रद कहानियां” से ली गई है . मेरी यह पुस्तक ‘जाह्नवी प्रकाशन’ ए 71 विवेक विहार फेस टू दिल्ली 110095 से प्रकाशित हुई है. जिसका मूल्य ₹400 है।)

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