पहले जाति के नाम पर आरक्षण देकर देश के नेताओं ने देश में सामाजिक स्वरूप को जहरीला बनाया और अब साम्प्रदायिक आधार पर मुस्लिमों को आरक्षण देकर राष्ट्रीय परिवेश को और भी विषैला बनाने की कोशिश की जा रही है। सभी राजनीतिक दलों की दृष्टि में ‘मुस्लिम हित’ नहीं है अपितु मुस्लिमों के वोट हैं।
भारत में हिन्दू राजनीति का मूलाधार आरक्षण नहीं है, अपितु कमजोर को दिया जाने वाला संरक्षण है, प्रोत्साहन है, उसे आगे लाकर विकास की सही रफ्तार में डाल देना है। जिससे वह और उसकी आने वाली पीढियां विकास के समान अवसरों का समान लाभ उठा सके और किसी भी प्रकार से शोषण, दलन, दमन, और उत्पीड़न का शिकार न बन सकें। ‘आरक्षण’ की धारणा में तुष्टिकरण होता है। किसी खास जाति या सम्प्रदाय को अपने लिए खुश करके उनके वोटों पर चोर राजनीतिज्ञों की नजरें होती हैं। इन चोरो के लिए समाज और राष्ट्र भाड़ में जायेँ, इन्हे पहले अपना उल्लू सीधा करना होता है। अंग्रेजों ने भारत में आरक्षण की व्यवस्था को अपना ‘उल्लू सीधा करने’ के लिए ही लागू किया था।
देश का यह दुर्भाग्य रहा कि अंग्रेजों की इसी नीति को हमारे राजनीतिज्ञों ने स्वतन्त्रता बाद के काल में भी अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए लागू किये रखा। जाति, सम्प्रदाय और लिंग के आधार पर संविधान ने किसी प्रकार के भेद भाव को अलोकतांत्रिक और कानूनी माना है। इसका अभिप्राय है कि जाति, सम्प्रदाय और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव आरक्षण की गलत नीति के माध्यम से नहीं दिया जायेगा। संविधान निर्माताओं का यह दृष्टिकोण स्वागत योग्य था। कोई भी जाति या सम्प्रदाय सम्पूर्ण रूप में पिछड़ा नहीं होता। ‘क्रीमीलेयर’ के अन्तर्गत अगर लाभ को वो लोग लेते हैं जो इस आरक्षण के पात्र हैं ही नहीं। क्रीमीलेयर की सीमा भी इस समय तीन लाख रुपये वार्षिक की आय है। इसका अभिप्राय है कि जो व्यक्ति 25000 प्रति माह का वेतन पा रहा है वो क्रीमीलेयर के अन्तर्गत आता है। अब 15000 से 25000 तक का मासिक वेतन पाने वाला व्यक्ति कम से कम अपने बच्चों को पढ़ा लिखा तो लेगा ही तब ये लोग ही जोकि 25000 तक का मूल वेतन पा रहे हैं, आरक्षण का लाभ ले जायेंगे। इन्ही की जाति बिरादरी के ऐसे लोग जोकि बच्चो को पढ़ाने लिखाने के लायक भी नहीं है, आरक्षण से फिर वचित रह जायेंगे। जबकि आरक्षण पाकर लेकर एक बार आगे बढ़ा व्यक्ति पुनः पुनः आरक्षण का लाभ लेता रहेगा।
देश में करोड़ो लोग ऐसे हैं जो आरक्षण की जाति में आकर भी आरक्षण का लाभ नहीं ले पा रहे। उनके पास अशिक्षा, भुखमरी, और गरीबी ‘आरक्षित’ करके आरक्षण की व्यवस्था ने भेज दी है। ये तीनों ‘चीजे’ एक अभिशाप बनकर उनके घर में जा बसी है, और आरक्षण का मजा वो लोग ले रहे हैं जिन्हें नहीं लेना चाहिए। आरक्षित जातियों के गरीबी के दुश्मन आरक्षित जातियों के साधन सम्पन्न लोग ही बना दिये गए है। ये साधन सम्पन्न लोग ही राजनीतिज्ञों कि ‘वोटों का जुगाड़’ चुनावों में लगाते हैं और अपने सजातीय गरीबों को भेड़ बकरी की भांति हांककर जातीय आधार पर वोट डालने के लिए प्रेरित और मजबूर करते हैं।
अब मुस्लिमों को आरक्षण देने की तैयारी हो रही है। जातीय आधार पर दिये गये आरक्षण के कटु फलों को देखकर संविधान की आत्मा पहले ही तड़प रही थी अब मजहबी आधार पर आरक्षण देकर संविधान की आत्मा की हत्या करने की तैयारी की जा रही है। परिणाम इस व्यवस्था का भी विपरीत ही आयेगा। साधन सम्पन्न लोग आरक्षण को लपक लेंगे और गरीब फिर गरीब ही रह जायेंगे।
देश का संविधान समान नागरिक संहिता की बात करता है। इसलिए देश में समान नागरिक संहिता की स्थापना होनी चाहिए। व्यवस्था की दूषित नजरों में व्यक्ति होना चाहिए ताकि जाति या सम्प्रदाय। व्यक्ति व्यक्ति के मध्य भेदभाव प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। आरक्षण की नीति व्यक्ति को व्यक्ति से दूर करती है, उनमे विभेद उत्पन्न करती है। जबकि संरक्षण की नीति विभेदों को पाटती है। राजनीति समाज को तोड़ने का नहीं अपितु जोड़ने का काम करती है। यही इसका धर्म हैं। व्यक्ति और व्यक्ति के मध्य विभेद उत्पन्न कर स्वार्थ सिद्धि के लिए कार्य करना राजनीति का धर्म विहीन स्वरूप है। देश का दुर्भाग्य है कि आज ऐसी ही धर्म विहीन राजनीति अपनी मूर्खतापूर्ण नीतियों से देश को हांक रही है। इस राजनीति की समीक्षा का समय आ गया है। देश को विध्वंस और विनाश की ओर ले जाने की अनुमति इसे और देना गलती होगी। देश की राजनीति का हिन्दुकरण करने का समय आ गया है। हिन्दुकरण का अभिप्राय साम्प्रदायिकीकरण कदापि नहीं, अपितु राजनीति को पन्थ निरपेक्ष और मानवीय बना देना है। क्योंकि हिन्दू (हि+न+दू) का अर्थ ही ये हैं—————–
‘हि’ का अर्थ हिन्दू हितैषी सबका और हितकारी है।
‘न’ का अर्थ वह न्यायप्रिय और न्यायकारी है॥
‘दू’ का अर्थ वह दूरदर्शी और दूरगामी है।
दूजों का दुख दूर करने को जो सदा कल्याणी है॥
जिनके हदय हिलोरें लेता दया धर्म का सिन्धु है।
सच कहता हूँ वे हिन्दू हैं, वे हिन्दू हैं, वे हिन्दू हैं॥
हमें ऐसी ही राजनीति चाहिए – जो दूसरे के प्रति संवेदनशील हो, दयालु हो। वोटों की राजनीति के लिए स्वार्थी ना हो, भेड़िया ना हो। समाज को बांटने वाली ना हो। गरीब की गरीबी पर रहम करने वाली हो, गरीब को मिटाने वाली ना हो। बड़े भाई ‘हिन्दू’ को मिटाने ले लिए छोटे भाई (मुस्लिम लीडर अपने भाषणो में ऐसे ही शब्दों का प्रयोग किया करते है) का तुष्टिकरण उचित नहीं है। प्रयास आर्थिक आधार पर लोगों को प्रोत्साहित कर उन्हें संरक्षण देने का होना चाहिए – शासन ऐसी नीतियाँ बनाये और उन्हें ईमानदारी से लागू करे – इसके लिए मुस्लिम समाज के लोग आंदोलन करें या मांग करें तो कोई बात बने। राष्ट्र की तरक्की के लिए ऐसी सोच ही उचित होगी।

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