कड़वा सच – चारों ‘प’ पथभ्रष्ट –

–कृष्ण चन्द्र मधुर

सच कड़वा होता है और किसी को पसन्द नहीं आता। बचपन से ही सिखाया जाता है कि कोई ऐसी बात न कहो, जिस से कोई शख्स नाराज हो, कोई भी ऐसी बात न बोलो जो सुनने वालों को अच्छी न लगे, कुछ ऐसा न लिखो जो पढने वालों का अप्रिय लगे। भला यह भी कोई बात हुई कि सच को सच न कहों और वही कहों, बोलो या लिखो जो एक तरह का फरमाइशी प्रोग्राम नजर आये। इन पंक्तियों का लेखक इस मिथक को तोड़ कर सच, कहने, सच बोलने और सच लिखने का साहस रहा है। परवरदिगार! मदद करें, आमीन।
‘प’ हिन्दी वर्णमाला के व्यंजन वर्ण का इक्कीसवां अक्षर है जिसका उच्चारण होठ से होता है और जो स्वर्ण वर्ण कहलाता है। यह एक ऐसा अक्षर है जिससे हजारों शब्द बनते हैं। किन्तु इस आलेख में ‘प’ अक्षर से बने चार शब्दों की महिमा का वर्णन किया जा रहा है।
पहला ‘प’ है प्रशासन। क्या कोई ऐसा प्रशासनिक कार्यालय है जिस के अधिकारी धर्मराज, युधिष्ठर या सत्यवादी हरिश चन्द्र हों? जवाब होगा कोई नहीं। यदि किसी दफ्तर में कोई ऐसा अधिकारी है भी तो वह गिनती में नहीं आता क्योंकि उसके अधीनस्थ कर्मचारी उसके लिखे को बिगाड़ देते हैं, अच्छी भली न्याय की तराजू में दांडी मार देते हैं। आयकर, व्यापारकर, सबरजिस्ट्रार, प्राधिकरण, नगर निगम, क्लेक्ट्रेट आदि जितने भी सरकारी कार्यालय हैं वहाँ पर भ्रष्टाचार के मच्छर रोके से भी नहीं रुकते। एक प्रसंग है कि निंद्रा से कुम्भकरण अचानक जाग उठता है। रावण पूछता है भईया तुम तो साल में छ महीने नींद लेते हो अभी तो तीन महीने ही हुए हैं। कुम्भकरण जवाब देता है – अरे भाई साहब , मच्छर इतने हैं कि सोने नहीं देते। इनके काटने से जाग गया था। जब कुम्भकरण जैसा शाही व्यक्ति मच्छरों को नहीं रोक सका तो हमारे आज के मंत्री अपने – अपने विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार के मच्छरों को कैसे रोक पाएंगे?
दूसरा ‘प’ पुलिस है, जो कम बदनाम नहीं है। दरअसल पुलिस भी प्रशासन का अंग है। सभी जानते हैं कि पुलिस में नौकरी पाने के लिए किया कुछ नहीं करना पड़ता। लोग भारी रकम खर्च करके पुलिस में भर्ती होते हैं। इसी मकसद से कि अच्छा थाना मिलने पर सभी कसर पूरी कर लेंगे। जब थानों की बोली लगाई जाती है और भारी बोली लगाने वाले को कमाऊ थाना दिया जाता है, तो वहाँ का थानाध्यक्ष धर्मराज युधिष्ठर कैसे बन पाएगा?
तीसरा ‘प’ पब्लिक है जिसमें नेता, व्यापारी, दुकानदार आदि सभी प्रकार के लोग शामिल हैं। यह वर्ग भी पहले व दूसरे ‘प’ की भांति समान रूप से दोषी हैं। यह वर्ग देता है, वह वर्ग लेता है। यदि यह वर्ग सुविधाशुल्क देना बन्द कर दे तो वह वर्ग (प्रशासन – पुलिस) भ्रष्टाचार मुक्त हो जाएगा। लेकिन पब्लिक अपनी सुविधा के लिए सुविधाशुल्क देकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है।
अब रहा चौथा ‘प’ यानि प्रैस। आप सोच रहे होंगे कि इन पंक्तियों का लेखक इस ‘प’ पर चोट नहीं करेगा क्योंकि वह स्वयं एक पत्रकार है। लेकिन सत्य सत्य ही होता है। यह ‘प’ भी पहले, दूसरे व तीसरे ‘प’ की तरह पथभ्रष्ट है। यह ‘प’ समान व देश का सजग पहरी है । इसके हाथ में कोडा है और इसका धर्म है कि पहले , दूसरे व तीसरे ‘प’ का सही मार्ग प्रशस्त करे , पथभ्रष्ट होने से बचाए। किन्तु दिशा देने वाला पत्रकार आज दिशा लेने लगा है। वह भी बिकने लगा है और राजनीतिज्ञों की तरह नकाब ओढ़ने लगा है। कुछ अच्छे ईमानदार किस्म के इनें – गिनें पत्रकार जरूर हैं। जिनकी उजली चादर पर कोई दाग नहीं है। लेकिन उन्हें न तो सरकार पूछती है न ही नेता लोग।
इन पंक्तियों के लेखक ने अपनी 78वर्ष की आयु में वह जमाना देखा है जब हाकिम हुक्मरान, पब्लिक / पत्रकार सभी अपने-अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित थे। लेकिन आज यह सब कुछ एक भूली बिसरी दास्तान बनकर रह गया है। व्यवस्था कब ठीक होगी? दावे के साथ कहना मुश्किल है। किन्तु हर रात्रि के बाद सवेरा जरूर होता है।

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