भारत की सेना का इतिहास अत्यंत गौरवपूर्ण है। इसके गौरव का, गरिमा का और गर्व का, इतिहास युगों पुराना है। लाखों वर्ष पूर्व मान्धाता जैसे महान चक्रवर्ती सम्राट के काल में भी सेना का अस्तित्व था। भगवान राम और भगवान कृष्ण के काल में भी सेना का अस्तित्व था। इस सेना का प्रमुख कार्य कूटनीति में विफल हुई राजनीति से उपजे युद्घ को अपनी शानदार युद्घनीति से लडना और जनता के लिए पुन: शांति भी बहाली कराना होता था। भारतीय सेना का यह संस्कार बन गया कि उसे शांति की बहाली के लिए ही बाहर आना है। राष्टï्र को उपद्रवियों से मुक्त कराना और खुशहाली के रास्ते पर डाल देना ही सेना के चरित्र में सम्मिलित रहा। इसलिए भारतीय सेना ने कभी भी सत्ता लिप्ता की सोच को नहीं पाला।
हमने लिखा है कि कूटनीति की विफलता से युद्घ का जन्म होता है। हमारा मानना है कूटनीति तभी विफल होती है जब अनुभव शून्य लोगों को सत्ता के सौदागर सत्ता सौंप देते हैं ऐसे लोगों को सत्ता दे दी जाती है जिनका राजनीति और कूटनीति से कभी कोई संबंध नहीं रहा। कूटनीति की विफलता से मर्यादा की चादर में छेद होने लगते हैं और हम देखते हैं कि कूटनीति की इस ओजोन परत में छेद होने से राजनीति के मूल्यों पर शत्रु की पराबैंगनी किरणें घातक प्रभाव डालने लगती हैं। जिससे देश और राष्टï्र में अराजकता की स्थिति उत्पन्न होती है। जो चीजें पर्दे में रहनी चाहिए थीं वो परदे से बाहर खुली हवा में तैरने लगती हैं और राजनीति अवाक खड़ी तमाशा देखती रहती है। जिस राजनीति में कूटनीति ना हो उसे ऐसे समझो जैसे शरीर बिना आत्मा के अर्थी बन जाता है। आत्मा शरीर रूपी रथ का रथी है, वह जब निकल गया तो शरीर अ-रथी हो गया। इसी प्रकार कूटनीति के बिना राजनीति अर्थी बन जाती हैं। अनुभवहीन राजनीतिज्ञों को देश की जनता जिंदा लाश बनाकर अपने कंधों पर ढोती है। यह राष्टï्र का दुर्भाग्य होता है कि जिनके कंधों पर देश का भार पडना चाहिए वो खुद ही जनता के कंधों पर सवार हो लें। अर्थी को जनता कहां ले जाए……?
भारत के ज्ञात इतिहास में शायद पहली बार सेना और राजनीति में कहीं हल्की सी दरार दिखायी दी है। सेना मर्यादा में रही यह बात प्रशंसनीय है, पर राजनीति का चेहरा बेनकाब हो गया। सेना जैसे अति महत्वपूर्ण संस्थान में भी कमीशन का रोग देखकर मालूम हुआ कि राजनीति का चेहरा कितना दागदार हो चुका है। हमें मेजर जनरल इयान मारडोजों को इन पंक्तियों पर ध्यान देना चाहिए कि आजादी के बाद हमने जो लडाईयां लडीं उनमें बुद्घिमत्ता और तैयारी की कमी के कारण हमारी कमजोरी सामने आयी। सिवाय सन 1971 के भारत पाक युद्घ में। जिसका हमने पूरी तैयारी के साथ सामना किया और सिर्फ 13 दिनों की लडाई में ही एक राष्टï्र को मुक्त करते हुए तथा 93 हजार पाकिस्तानी युद्घ बंदियों को अपने कब्जे में लेकर शानदार जीत हासिल की। अन्य सभी लडाईयों में हमें व्यापक क्षति उठानी पडी और अपने अधिकारियों के नेतृत्व में भारतीय जवानों को कुर्बानियां देनी पडीं। अत्याधुनिक तकनीक से हथियारों की उत्कृष्टïता और उसकी मारक क्षमता में हो रही लगातार वृद्घि के कारण वर्तमान और भविष्य की लडाईयों का स्वरूप अत्यधिक जटिल हो गया है। भारत को आधुनिक युद्घ की तकनीक में हो रहे विकास कार्य को ध्यान में रखकर अपनी नीति तय करने और नई नई तकनीकें अपनाने की आवश्यकता है, ताकि वह हर स्थिति के लिए स्वयं को तैयार कर सकें।
हमें यह याद रखना चाहिए कि सेना अपना गौरवपूर्ण प्रदर्शन तभी कर सकती है जब उसके पास अत्याधुनिक हथियार हों। हमारे सैनिकों के जीवन का भी उतना ही मूल्य है जितना हर किसी व्यक्ति के जीवन का होता है। अत: सैनिकों के जीवन को केवल सर्वोत्कृष्टï बलिदान देने के लिए ही नहीं पालना चाहिए, अपितु उनके हाथ में सर्वोत्कृष्टï हथियार देकर शत्रु के निकृष्टï इरादों का कत्ल करने के लिए पालना चाहिए। गाजर मूली की तरह सेना को कटवाना और फिर आंख में भर लो पानी, के गीत पर आंसू बहाना राजनीति, कूटनीति और राष्टï्रनीति मानो तीनों की खुदकुशी पर अपनी बेबसी का इजहार करना होता है। हमें इन तीनों की बेबसी पर आंसू बहाने वाले नेतृत्व की जरूरत नहीं है। हमें 1971 के नेतृत्व की आवश्यकता है, जिसे शत्रु आज तक नहीं भूला है।
गठबंधन की राजनीति के इस दौर में अटल जी ने 24 फू लों की माला पहनी और सरकार चलाई, लेकिन अपनी खुशबू तब भी बरकरार रही। वह अपनी माला में अलग दिखते रहे। पर उसके बाद गठबंधन गठियाबंधन से घटिया बंधन के वर्तमान दौर तक आ गया है। अब सारी माला गंध हीन पुष्पों से गुंथी हुई है। कई लोगों का तो मानना है कि गंधहीन पुष्पों से कहना भी गलत है, उचित होगा कि दुर्गधिंत पुष्पों से गुंथी माला कहा जाए। जिस सरकार ने आंतरिक शत्रुओं से लडने में विफलता प्राप्त की बाहरी शत्रुओं से कई बार कूटनीतिक पराजय प्राप्त की, जो भ्रष्टïाचार में डूबी हो, जो आर्थिक सामाजिक सैनिक और हर राष्टï्रीय मुद्दे पर अपनी फुटबाल की शर्मनाक स्थिति से गुजर रही हो, जिसमें एक लात पश्चिम बंगाल की ममता मारती हों तो दूसरी मुलायम सिंह यादव, तीसरी शरद पवार, चौथी मायावती, पांचवीं जयललिता, छठी अन्ना हजारे, सातवीं……। कितनी लातें कितनी संख्या—सब कुछ अंतहीन। दंतहीन भारतीय नेतृत्व विषहीन बन गया है। जब लातों पर भी कुछ ना बोला जाए तो उस स्थिति को आप राजनीति या कूटनीति की विफलता कहकर भी महिमा मंडित नहीं कर सकते। क्योंकि ऐसा कहना भी राजनीति और कूटनीति के द्वारा किये गये सारे प्रयासों का कई बार वंदन करना ही होता है। लेकिन जहां सदप्रयास नाम की चीज ही ना हो वहां तो ऐसी स्थिति को राजनीति की नौटंकी ही कहा जाना चाहिए। सचमुच आज हम राजनीति के सुव्यवस्थित और रोमांचकारी इतिहास के साक्षी नहीं बन रहे हैं बल्कि हम राजनीति में पहुंचे कुछ नर्तकों की नौटंकी को देख रहे हैं और शोक की बात है कि अपने आप पर अपने आप ही हंस रहे हैं। यह अपने आप पर अपने आप हंसना हमारी आपराधिक तटस्थता का परिणाम है।

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