काल चिरैया चुग रही, छिन छिन तेरो खेत

मृत्यु का क्षण, कितना दार्शनिक होता है? आदर्श और यथार्थ का यह कितना कठोर संगम है? मृत्यु का शाश्वत सत्य सभी को एक न एक दिन भीगी आंखों से स्वीकार करना पड़ता है। रूप श्रंृगार और सृजन अपनी कहानी चिता के किनारे छोडक़र चले जाते हैं। लगता है, संसार के सारे संबंधों की गति यहीं तक है। सोने जैसा शरीर जलकर राख की ढेरी मात्र रह जाता है। कितनी भयावह होती है चिता की लाल पीली लपटें? जब वे किसी के प्रियजन को अपनी आगोश में लेती हैं, तो अग्नि-अग्नि को पीती है, जल-जल में डूब रहा होता है, वायु-वायु में विलीन होती है, मिट्टïी मिट्टïी में समा जाती है, शून्य शून्य में तादात्म्य होता है। ऐसे में एक सवाल मानस में रह रहकर उठता है कि पंच महाभूतों से निर्मित शरीर में रहने वाली आत्मा कहां गयी? अब उसकी क्या गति होगी?

उपरोक्त प्रश्न के संदर्भ में छान्दोग्य उपनिषद में राजा जाबालि प्रवाहण ने इसी शंका का समाधान करते हुए महर्षि गौतम से कहा-हे गौतम, उत्पत्ति के इस क्रम को जो लोग जानते हैं, और जो निष्काम कर्मी वन में जाकर श्रद्घा और तप से उपासना में लीन रहते हैं, वे मृत्यु के बाद ज्योतिर्मय रूप की क्रमिक श्रंखला से गुजरते हैं। पहले पहल उनका रूप अर्चिकरण के समान प्रकाशमान होता है, किरण से बढता हुआ दिन के समान (जिसमें असंख्य किरणें होती हैं) इनका ज्योतिर्मय रूप हो जाता है, उससे बढकर पूर्णमासी के पखवाडे में इन पंद्रह दिनों में जितना प्रकाश है उतने प्रकाश से वे ज्योतिर्मय हो जाते हैं, उससे बढकर उत्तरायण के छह मासों में।

छह मासों से-उत्तरायण से बढकर संवत्सर और संवत्सर से बढकर आदित्य की महान ज्योति के समान वे तेज से भरपूर हो जाते हैं। आदित्य ज्योति से वे चंद्र ज्योति और चंद्र ज्योति से विद्युत ज्योति को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार उत्तरोत्तर, प्रकाश से प्रकाश में विकसित होते हुए पुरूष का मानव से यह अमानव रूप प्रकट होता है, फिर वही अमानव अन्य ब्रहमभक्तों को ब्रहम मार्ग का प्रदर्शन करता है, यही देवयान मार्ग कहलाता है।

इसके विपरीत सकाम कर्मी ग्राम में रहकर कुएं बाबड़ी बनवाकर शुभ कार्यों में दान देकर भगवान की उपासना करते हैं, वे मृत्यु के बाद मंद ज्योति की क्रमिक श्रंृखला में से गुजरते हैं। पहले पहल उनका रूप धूम के समान होता है, धूम सेबढता हुआ रात्रि के समान इनकी मंद ज्योति है, उससे बढकर अमावस्या की रात्रि के समान वे ज्योतिर्विहीन हो जाते हैं, उससे बढकर छह मासों में अर्थात छह मास तक की ज्योतिर्विहीनता में-दक्षिणायन में पहुंचते हैं-परंतु येे समान भावना से काम करने वाले संवत्सर को अर्थात उससे भी बढे हुए साल भर के अंधकारमय लोक को नहीं जाते।

अब प्रश्न पैदा होता है-तो, ये सकाम कर्मी कहां जाते हैं? दक्षिणायन से वे पितृलोक को पहुंचते हैं, पितृलोक से आकाश को आकाश से चंद्रमा को अर्थात चंद्रलोक में जा पहुंचते हैं। यहां यह ध्यान देने योग्य बात है कि यह वह चंद्र नहीं है, जो पृथ्वी का उपग्रह है। ज्योति शास्त्र में सूर्य के आगे ऐसे तारे माने गये हैं, जिनका प्रकाश चंद्रमा की तरह घटता-बढ़ता है। सूर्यलोक के बाद वहीं चंद्रलोक मिलता है। उसके बाद विद्युत लोक है। विद्युत लोक के बाद ब्रहमलोक है। उत्तरायण में सूर्य पृथ्वी उत्तर की तरफ ही ब्रहमलोक है। अत: उत्तरायण में पृथ्वी से ब्रहमलोक तक एकदम सीधा प्रकाश का मार्ग है। निष्काम कर्मी उपासक मरने के बाद इस देवयान मार्ग से एकदम सीधा ब्रहमलोक में पहुंच जाता है।

अब प्रश्न पैदा होता है कि निष्काम कर्मी की आत्मा तथा सकाम कर्मी की आत्मा क्रमश: ब्रहमलोक और चंद्रलोक में कैसे पहुंचती है? निष्काम कर्मियों का लिंग शरीर प्रकाशमय होता है, अत: वह प्रकाश के सहारे चलता है, सकाम कर्मियों का लिंग शरीर अंधकारमय होता है, अत: वह रात्रि कृष्णपक्ष आदि के सहारे चलता हुआ चंद्रलोक में पहुंच कर कर्मों का आनंद फल भोगता है। ये दो गतियां उपासकों की हैं, दोनों उत्तम हैं। एक देवगति दूसरी पितर गति है, तीसरी सीधी आवागमन की है-मनुष्य गति है। इस संदर्भ में यदि कोई और भी विस्तार से अध्ययन करना चाहे तो भगवान कृष्ण ने गीता के आठवें अध्याय में 23वें, 24वें और 25वें श्लोक में बडे सुंदर ढंग से समझाया है।

भारतीय संस्कृति के आदि व्यवस्थापक महर्षि मनु जी महाराज ने मनुस्मृति के द्वादश अध्याय में आत्मा के तीन गुणों के आधार पर तीन गतियां तीन गतियों के तीन तीन भेद और तदनुसार जन्मावस्थाओं के फल इत्यादि की विशद व्याख्या की है। अत: पाठक अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए विस्तृत रूप से मनुस्मृति के इस अध्याय का अवश्य अध्ययन करें। मेरा लेख कहीं बडा न हो जाए इसलिए कुछ श्लोक बानगी मात्र प्रस्तुत कर रहा हूं ताकि पाठक की जिज्ञासा शांत हो।

देवत्वं सात्विका यान्ति मनुष्यत्वञ्च राजसा:।

तिर्यक्त्वं तामसा नित्यमित्येषा त्रिविधा गति:।। 1 ।।

स्थावरा: कृमिकीटाश्च मत्स्या: कच्छपा:।

परावश्च मृगाश्चैव जघन्या तामसी गति।। 2।।

सिंहा व्याधा वराहश्च मध्यमा तामसी गति ।। 3।।

भावार्थ : जो मनुष्य सात्विक हें वे देव अर्थात विद्वान जो रजोगुणी होते हैं, वे मध्यम मनुष्य और जो तमोगुणी होते हैं वे नीच गति को प्राप्त होते हैं।। 1।।

जो अत्यंत तमोगुणी हैं वे स्थावर वृक्षादि, क्रमि कीट मत्स्य, सर्प, कच्छप, पशु और मृग के जन्म की प्राप्त होते हैं।। 2।।

जो मध्यम तमोगुणी हैं वे हाथी, घोड़ा, शूद्र, म्लेच्छ निन्दित कर्म करने वाले, सिंह व्याघ्र, वराह अर्थात सुअर के जन्म को प्राप्त होते हैं।

तापसा यतयोग विप्रा ये च वैमानिका गुणा:।

नक्षवग्राणि च दैत्याश्च प्रथमा सात्विकी गति: ।। 1।।

अर्थात जो तपस्वी यति, सन्यासी वेदयाठी, विमान के चलाने वाले, ज्योतिषी और दैत्य अर्थात देहपोषक मनुष्य होते हैं उनको प्रथम सत्वगुण के कर्म का फल जानो।। 1।।

गन्धर्वा गुहका यक्षा विवधानुचुराश्च ये।

तर्थवाप्सरस: सर्वा राजसीपूत्तमा गति:।।

अर्थात जो उत्तम रजोगुणी हैं वे गंधर्व (गाने वाले) गुहक (वाद्य बजाने वाले) यक्ष धनाढय विद्वानों के सेवक और अप्सरा अर्थात जो उत्तम रूप वाली स्त्री का जन्म पाते हैं।। 2।।

इसी प्रकार सत्व, रज और तमोगुण युक्त बैग से जिस जिस प्रकार का कर्म जीव करता है उस उसको उसी उसी प्रकार का फल होता है। इसलिए जो मुक्त होना चाहते हैं वे गुणातीत अर्थात सब गुणों के स्वभावों में न फंसकर महायोगी होकर मुक्ति का साधन करें।

सारांश यह है कि राजा जाबालि प्रवाहण के अनुसार आत्मा की तीन गतियां हैं। एक निष्काम कर्मी की , इसे मोक्ष कहते हैं, दूसरी सकाम कर्मी, इसे स्वर्ग कहते हैं, तीसरी मरने जीने वालों की इसे आवागमन कहते हैं-इसमें मनुष्य पशु पक्षी और कीट पतंगों इत्यादि के शरीर प्राप्त होते हैं। यही पुर्नजन्म है। इसी प्रकार गीता में और मनुस्मृति में भी आत्मा की तीन गतियां बताई गयी हैं।

आश्चर्य तो इस बात का है कि हमारे धर्म शास्त्रों में आत्मा की गतियों के बारे में इतना स्पष्टï उल्लेख होने के बावजूद भी मनुष्य इससे बेखबर है और पापाचार की दलदल में जानबूझ कर फंसता जा रहा है। जो जन चाहते हैं कि हमारी आत्मा आवागमन के क्रम से छूटे और मोक्ष अथवा स्वर्ग प्राप्त करने वाली गति हो, वे समय रहते हुए चेत जाएं। इस संदर्भ में कवि ने कितना सुंदर कहा है-

बहुत गयी थोडी रही, नारायण अब चेत।

काल चिरैया चुग रही, छिन छिन तेरो खेत।।

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