मोक्ष के अभिलाषी को प्रकृति के मायावाद से मोह तोड़ना ही पड़ेगा: स्वामी विवेकानंद परिव्राजक जी

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ग्रेटर नोएडा। यहां पर स्वामी दयानंद जी महाराज की 200 वीं और महाशय राजेंद्र सिंह आर्य जी की 112 वीं और माता सत्यवती आर्या की 99 वीं जयंती के अवसर पर आयोजित किए गए ऋग्वेद पारायण यज्ञ में बोलते हुए आर्य जगत के सुप्रसिद्ध विद्वान स्वामी विवेकानंद परिव्राजक जी ने उपस्थित लोगों का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि ईश्वर में क्रिया और गुण दोनों होते हैं। उन्होंने कहा कि ईश्वर में चुंबकीय गुण होते हैं जो आत्मा को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इन गुणों के परिणाम स्वरूप आत्मा का परिष्कार होने लगता है। जिससे मन अपने आप सही रास्ते पर आने लगता है। उन्होंने कहा कि मन से पहले आत्मा का परिष्कार करना आवश्यक है। परमपिता परमेश्वर के पास अपना कोई हाथ नहीं, परंतु वह बिना हाथ के भी क्रिया करता है। सूर्य तारे आदि सभी को वही बनाता है। यह उसकी क्रिया है पर इसमें किसी ऐसे उपकरण हाथ आदि का सारा वह नहीं लेता जो हमें दिखाई देता हो।

स्वामी जी महाराज ने कहा कि कार्य शक्ति से होता है। शरीर से नहीं होता शरीर शक्ति को धारण करता है। इसलिए शरीर को उर्जावान, क्रियाशील और शक्ति संपन्न बनाए रखने के लिए हमें शारीरिक साधना की ही आवश्यकता होती है। परमपिता परमेश्वर में अनन्त शक्ति है। जिसके कारण वह बड़े बड़े कामों को करता है। स्वामी जी महाराज ने कहा कि जीवात्मा की शक्ति परमपिता परमेश्वर की शक्ति के सामने बहुत सीमित है । जैसे आत्मा एक वस्तु है, वैसे ही ईश्वर भी एक वस्तु है । आत्मा ईश्वर नाम की वस्तु के सामने स्थूल है,  परंतु वह भी दिखाई नहीं देती। उन्होंने कहा कि जो लोग ऐसा मानते हैं की आत्मा ईश्वर का अंश है, वह समाज में भ्रान्ति फैलाते हैं ।  हमे ध्यान रखना चाहिए कि जीवात्मा मोक्ष की प्राप्ति करने के उपरांत भी अपना अस्तित्व अलग बनाए रखने में सफल होती है। यह कभी परमात्मा में विलीन नहीं होता।

उन्होंने ने कहा कि तरबूज का अंश तरबूज ही होता है, केला नहीं होता । इसी प्रकार आत्मा आत्मा का अंश हो सकता है, परमात्मा का नहीं। तरबूज को काट भी लिया जाए तो भी वह तरबूज ही रहेगा। आत्मा के गुण अलग हैं और ईश्वर के अलग हैं। इसलिए दोनों को हम एक जैसा नहीं मान सकते। स्वामी जी महाराज ने कहा कि मुक्ति से हम लोग ईश्वर के साथ जुड़ते हैं। उससे हमारा कलेक्शन बनता है। इसका अर्थ यह नहीं कि इस कलेक्शन को हम विलीन होना मान लें । उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और प्रोटोन को सत, रज और तम के समान मानना भी मूर्खता है। स्वामी जी महाराज ने कहा कि इससे नीचे जाकर भी आज के वैज्ञानिक ने 36 प्रकार के क्वार्क्स की खोज की है, जो इससे भी सूक्ष्म हैं । उन्होंने कहा कि सतोगुण से सुख में वृद्धि होती है , जबकि रजोगुण हमें दुख देता है। इसके विपरीत तमोगुण नींद, नशा , आलस्य उत्पन्न करता है । तमोगुण में नशेड़ी आगे पीछे का कुछ भी नहीं सोचता और वह किसी भी प्रकार का कोई अपराध कर सकता है। यदि मोक्ष की प्राप्ति करना चाहते हो तो इस प्रकृति जगत से संबंध तोड़ना ही पड़ेगा। जब तक प्रकृति के मायावाद में मन भटका रहेगा तब तक हम मोक्ष के अभिलाषी नहीं बन सकते।
इस अवसर पर आर्य जगत के सुप्रसिद्ध विद्वानऔर इस यज्ञ के ब्रह्मा डॉ व्यासनंदन शास्त्री ने ऋग्वेद के स्वराज्य संबंधी चिंतन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज की राजनीतिक, सामाजिक ,धार्मिक सभी प्रकार की स्थितियों को सुधारने के लिए वेद का मार्ग ही सर्वोत्तम है। यदि देश की राजनीति का संचालन कर रहे लोग प्रजावत्सलता के भाव को अपनाकर अपनी प्रजा अर्थात देशवासियों के साथ न्याय करने की नीति का अनुकरण करने लगें तो देश में ही नहीं संपूर्ण विश्व में शांति स्थापित हो जाएगी। विदित हो कि यह कार्यक्रम भारत को समझो अभियान समिति की ओर से आयोजित किया गया है। इस अवसर पर श्री देवेंद्र सिंह आर्य , डॉ राकेश कुमार आर्य, स्वामी ओमानंद जी महाराज, महात्मा आनंद स्वामी, महात्मा नारायण स्वामी, सुनीति आर्या , सुमन आर्या ,श्रीमती ऋचा आर्या ,श्रीमती मृदुला आर्या ,आर्य सागर खारी आदि अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे।

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