देश का विभाजन और सावरकर, अध्याय -19 क बहनों की छातियों पर लिखा – “पाकिस्तान जिंदाबाद”

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भारत विभाजन के समय लालकुर्ती दल का बड़ा आतंक था। ये लोग हिंदुओं को मारने काटने में बड़ी शीघ्रता दिखाते थे। सरगोधा की ओर से जो गाड़ियां फुल्लरवान की ओर आती थीं उनमें सादा वस्त्रों में सवार होकर लालकुर्ती दल के हत्यारे मुसलमान चढ़ जाते थे । आउटर सिग्नल आने पर ये लोग अपनी वास्तविक वर्दी को पहन लेते थे और उसके बाद जो भी हिंदू उस गाड़ी में दिखाई देता था, उसे काट डालते थे। इस प्रकार की घटनाओं का हिंदू मानस पर बड़ा विपरीत प्रभाव पड़ता था।
‘विभाजनकालीन भारत के साक्षी’ खंड – 3 में पुस्तक के लेखक कृष्णानंद सागर जी पृष्ठ संख्या 36 पर विभाजन कालीन भारत के साक्षी बलदेव राज चावला के माध्यम से ‘बहन के लिए भाई की अजब कहानी’ के उपशीर्षक से हमें जानकारी देते हैं कि अंबाला शरणार्थी शिविर में कुछ दिनों बाद एक दिन अचानक भेडांवाला के तिलकराज और लीलो मुझे मिल गए। मेरे पूछने पर तिलक राज ने अपनी कथा बताई —
फुलरवान टब्बा से आप लोगों के चले जाने के बाद मैं वहां मुसलमान बनकर रहने लगा। मुस्लिम वेश और मुसलमानों वाली टोपी पहनने लगा। हमारे ऊपर हमला करने वाले मुसलमान किस गांव के थे ? यह तो मुझे पता था, लेकिन यह लीला उस गांव के किस घर में है ? – यह पता लगाना था। अतः मैंने उसी गांव में जाकर सब्जी बेचने शुरू कर दी। सब्जी की छाबड़ी सिर पर रखकर मैं उस गांव की गलियों में फेरी लगाता हुआ आवाज लगाता था और ले लो की जगह ‘लीलो’ बोलता था। जैसे सब्जी ‘लीलो’ आलू मटर लीलो आदि । इसमें ‘लीलो’ मैं जरा जोर से और उसी तरह बोलता था जैसे मैं पहले बहन लीला को बुलाता था। एक दिन लीलो ने मेरी आवाज सुन ली और पहचान भी ली। वह घर के बाहर आ गई। मैंने भी देख लिया कि वह इस घर में है।
मैंने फुल्लरवान जाकर यह बात हिंदू मिलिट्री के अधिकारी को बताई। उन्होंने एक दिन एक सैनिक टुकड़ी मेरे साथ भेज दी। सैनिकों ने उस घर की तलाशी ली किंतु लीला वहां नहीं मिली। टुकड़ी वापस चली गई । मैंने फिर सब्जी की फेरी लगानी शुरू कर दी और एक दिन लीला सब्जी लेने के बहाने मेरे पास आ गई और बताया कि उस दिन सेना के आने पर घर वालों ने मुझे एक बड़े ट्रंक में बंद कर दिया था।
मैंने यह बात जाकर सेनाधिकारी को बताई । उन्होंने फिर से मेरे साथ कुछ सैनिक भेज दिए । मुसलमानों ने फिर से उसे छिपाने की कोशिश की लेकिन इस बार उनकी दाल नहीं गली। लीलो को घर से बरामद कर लिया गया और इसे हम उस घर से निकाल लाए।”
हमें इसी प्रकार का एक संस्मरण श्रीमती राजकुमारी कपूर द्वारा भेजा गया है। जिसे हम यथावत प्रस्तुत कर रहे हैं। – संपादक

मेरे परिवार की एक वयोवृद्ध महिला ने मुझको यह आप बीती सुनाई थी। मैं इसे ज्यों की त्यों लिख रही हूं।
‘मेरा जन्म चन्योट कस्बे में हुआ। यह 1932 की बात है। उन दिनों देश में बालिकाओं को शिक्षा दिलाना घोर पाप माना जाता था। मेरे पिता बसंत लाल जी पक्के आर्य समाजी थे। प्रत्येक आर्य समाजी के बारे में यह बात उस समय पक्की मानी जाती थी कि वह पौराणिक लोगों की प्रचलित मान्यताओं के कट्टर विरोधी हैं। यही कारण था कि आर्य समाज ने जहां बाल विवाह का विरोध किया , वहीं विधवा विवाह पर भी बल दिया। पर्दा प्रथा को भी आर्य समाज ने वेद विरुद्ध माना और नारी को शिक्षा देने की पौराणिक मान्यता का भी डटकर विरोध किया।
पिताजी के भीतर आर्य समाज के संस्कार कूट-कूट कर भरे थे। यही कारण था कि उन्होंने उस समय की प्रचलित मान्यताओं का विरोध करते हुए मुझे वहां की प्राइमरी पाठशाला में प्रवेश दिलवाया। प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने पर मुझे लायलपुर में उच्च विद्यालय में भेजा गया। चन्योट में आगे की पढ़ाई का प्रबंध नहीं था।
अब मैं स्वयं , मेरी माता जी व मेरा अनुज सतपाल लायलपुर में रहने लगे। वहां मेरे नाना जी का घर था। मैं आगे की पढ़ाई करने लगी। सन 1947 में मैंने मैट्रिक परीक्षा में भाग लिया। यह वही समय था जब देश विभाजन को लेकर चारों ओर सांप्रदायिक दंगों की आग लगी हुई थी। मुस्लिम सांप्रदायिकता अपना नंगा नाच दिखा रही थी। मुस्लिमों को उस समय हिंदुओं की संपत्ति लूटने के साथ-साथ बहू बेटियों को भी लूटने का अपना परंपरागत चस्का लगा हुआ था। अगस्त 1947 में हमारे क्षेत्र में भी दंगे भड़क गए। हमें ऐसी घटनाओं का लेश मात्र भी आभास न था। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि इस प्रकार की अवस्था में हमको फंसना पड़ेगा और हमारे ही आसपास रहने वाले लोग हमारे ही खून के प्यासे हो जाएंगे। हम किंकर्तव्यविमूढ़ की अवस्था में थे। जिन लोगों को हम अपना समझ रहे थे, वही हमारे लिए खून के प्यासे हो गए थे। यह देख कर आश्चर्य भी होता था और दुख भी होता था। इसके साथ ही साथ निरन्तर असुरक्षा का गहराता जा रहा घेरा हमारी चिंता भी बढ़ाता था।
एक दिन हमें चन्योट से समाचार मिला कि वहां हिंदुओं की हत्या हो रही है, मेरी दादी जी व मेरे पिताजी वहीं थे। मेरे पिताजी की एक युवा भान्जी हमारे घर चन्योट आई हुई थी। पर हमें उनमें से किसी के विषय में कोई सूचना प्राप्त नहीं थी। एक दिन लायलपुर के जिलाधीश का आदेश आया कि सभी हिंदू लोग तत्काल यहां के उच्च माध्यमिक विद्यालय में पहुंच जाएं। जिलाधीश के आदेश का पालन करते हुए हम सब अपना आवश्यक सामान लेकर इंगित किए गए स्थान पर पहुंच गए। सभी हिंदुओं को वहां तंबू में रखा गया था । उस समय यह नहीं देखा जा रहा था कि जिस स्थान पर हम सब लोग एकत्र हो रहे थे, वहां सुविधाएं क्या हैं ? केवल सबका साथ मिलना उस समय अपनी सुरक्षा का एहसास दिला रहा था। बस, इसी एहसास के साथ हम सब वहां पहुंच गए। इसके उपरांत भी किसी को यह पता नहीं था कि किसके जीवन का अंत कब हो जाएगा ?
मौत गहराती जा रही थी। उसका डर निरंतर सता रहा था । कब मौत रूपी गिद्ध किस पर झपट्टा मार ले,इस बारे में उस समय कुछ नहीं कहा जा सकता था।
हम सबके मन में पक्की धारणा थी कि दो-चार दिन की ही बात है, फिर तो हम सब अपने घरों को लौट ही जाएंगे, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। हम लंबी अवधि तक वहां नारकीय जीवन भोगते रहे। इसका कारण केवल एक था कि मुस्लिम सांप्रदायिकता निरंतर डायन होती जा रही थी। जिसके चलते न तो प्रशासनिक अधिकारी हमें अपने घरों को भेजकर किसी प्रकार का खतरा मोल लेने की स्थिति में थे और ना ही लोग वहां से हटने को तैयार थे। मौत जब सिर पर मंडरा रही हो तो साधारण लोगों का आत्मविश्वास तक लड़खड़ा जाता है। उस समय अधिकांश लोगों की मन:स्थिति बड़ी ही भयग्रस्त हो चुकी थी। यद्यपि कुछ लोग ऐसे भी थे जो सब लोगों का मनोबल बनाए रखने का काम कर रहे थे। जो लोग अन्य लोगों के गिरते मनोबल को उठाने का काम कर रहे थे उनका यह प्रयास सचमुच वंदनीय था।
एक रात गहरे अंधकार में मुसलमानों के कुछ झुंड के झुंड हिंदुओं के तंबुओं में आ घुसे। वे हिंदुओं को गाजर मूली की भांति काटने लगे। जिस प्रकार बेरहमी के साथ वे अत्याचार कर रहे थे उस प्रकार के भयावह अत्याचारों की हम बच्चों ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। हम हिंदुओं के घरों में चींटी को मारना भी पाप माना जाता है। पर हम अपनी आंखों से देख रहे थे कि वह किस प्रकार मनुष्यों की हत्या करते जा रहे थे और जितनी चीत्कार मचती थी, उतना ही उन्हें उसमें आनंद आता था। बाद में जब कभी तुर्कों या मुगलों के उन अत्याचारों के बारे में इतिहास में पढ़ा तो पता चला कि इन मुसलमानों का तो यह परंपरागत धंधा रहा है। इतिहास में जब-जब भी मुगलों के अत्याचारों को पढ़ा तो अपने साथ बीते हुए वे पल अनायास ही याद आते रहे। “तुर्कों और मुगलों के अत्याचारों को इतिहास में दिखाया नहीं गया” – जब कभी इस प्रकार के सच को कहीं से जानने का अवसर मिला तो भी यह बात अनायास ही दिमाग में कौंधती रही कि हमारे साथ हुए अत्याचारों को भी इसी सोच के साथ कभी लोगों को दिखाया या बताया नहीं जाएगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह लेख मेरी नवीन पुस्तक “देश का विभाजन और सावरकर” से लिया गया है। मेरी यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स दिल्ली से प्रकाशित हुई है जिसका मूल्य ₹200 और पृष्ठ संख्या 152 है।)

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