संविधान और राष्ट्र विरोधी है जाति आधारित जनगणना

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने राजनीतिक जीवन के अवसान पर हैं। पर जाते-जाते वह एक ऐसा बीज बो गए हैं जिस पर विनाश के फल लगेंगे। उन्होंने प्रदेश में जिस प्रकार जातिगत जनगणना कराई है, उससे राष्ट्रीय समाज कमजोर होगा। अब थोड़ा हम बिहार में संपन्न हुई जाति आधारित जनगणना के आंकड़ों पर विचार कर लेते हैं। जिनके अनुसार पता चलता है कि बिहार की कुल आबादी इस समय 13 करोड़ 7 लाख 25 हजार है। इस जनसंख्या में वे लोग भी सम्मिलित हैं जो बिहार से बाहर रहते हैं। इनकी जनसंख्या 53 लाख 72 हजार के लगभग बताई गई है।
आंकड़े बता रहे हैं कि बिहार की इस समय की कुल जनसंख्या में पिछड़े वर्ग (OBC) की संख्या 3 करोड़ 54 लाख 63 हजार है। बिहार की जनसंख्या का कुल 27.12 प्रतिशत होता है। इसी प्रकार अत्यंत पिछड़े वर्ग (EBC) की आबादी 4 करोड़ 70 लाख 80 हजार है। यह बिहार की कुल जनसंख्या का 36 प्रतिशत हुआ। अनुसूचित जाति अर्थात दलित समुदाय की आबादी 2 करोड़ 56 लाख 89 हजार अर्थात 19.65 प्रतिशत है।अनुसूचित जनजाति अर्थात आदिवासी आबादी 21 लाख 99 हजार अर्थात 1.68 प्रतिशत है। अनारक्षितों की एक श्रेणी है, जो तथाकथित अगड़ी जाति माने जाते हैं। उनकी आबादी है- 2 करोड़ 2 लाख 91 हजार अर्थात 15.52 प्रतिशत स्पष्ट की गई है।
जाति आधारित राजनीति के लिए मशहूर रहे बिहार में यादव 14 प्रतिशत, भूमिहार 2.86 प्रतिशत, राजपूत 3.45 प्रतिशत, ब्राह्मण 3.66 प्रतिशत, कुर्मी 2.87 प्रतिशत, मुसहर 3 प्रतिशत, तेली 2.81 प्रतिशत, मल्लाह 2.60 प्रतिशत हैं। नीतीश कुमार द्वारा कराई गई इस जाति आधारित जनगणना में यह भी स्पष्ट हो गया है कि बिहार में किस संप्रदाय अथवा मजहब को मानने वाले लोगों की कितनी जनसंख्या है ? इसके अनुसार हिंदुओं की जनसंख्या इस समय बिहार में 10 करोड़ 71 लाख 92 हजार बताई गई है। क्योंकि यह जनसंख्या बिहार की कुल जनसंख्या का 81.99 प्रतिशत होती है। वहीं मुस्लिमों की आबादी 2 करोड़ 31 लाख 49 हजार है। जो कि बिहार की कुल जनसंख्या का 17.70 प्रतिशत होते हैं। बौद्ध एक लाख 11 हजार अर्थात 0.08 प्रतिशत हैं । इसके अतिरिक्त ईसाई जनसंख्या 75 हजार अर्थात 0.05 प्रतिशत है।
कुछ लोग इस समय बिहार में हुई जाति आधारित जनगणना को लेकर बहुत उत्साहित हैं ।अखिलेश यादव, मायावती, कांग्रेस के राहुल गांधी जैसे कई बड़े नेता हैं जो इस प्रकार के कार्य को उचित बता रहे हैं। इन सब का कहना है कि पिछड़ों, दलितों और शोषितों का विकास या उत्थान ही तब होगा जब देश में जाति आधारित जनगणना को राष्ट्रीय स्वीकृति प्राप्त होगी। इनका मानना है कि जिसकी जितनी जनसंख्या है, उसे उतने ही अनुपात में शासन प्रशासन में भागीदारी दी जानी चाहिए।
ये सारे नेता ऐसे हैं जो लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं और उन्हें आजादी के बाद से लेकर अब तक कई बार अलग-अलग किस्म के कई झुनझुने पकड़ा चुके हैं। जैसे ही जातियां या वर्गों के लोग किसी झुनझुने से दुखी होते हुए दिखाई देते हैं तो तुरंत ये लोग उसे दूसरा झुनझुना पकड़ा देते हैं। आजादी के बाद के अब तक के 75 साल इसी प्रकार की झुनझुना राजनीति में व्यतीत हो गए हैं। 2024 के आगामी चुनावों को भुनाने के लिए अब यह नया झुनझुना दिया गया है, जो कि संविधान विरोधी और राष्ट्र विरोधी है। क्योंकि जाति भारतीय समाज का एक विकृत स्वरूप है, जिसे मिटाया जाना अपेक्षित है। भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही जाति न होकर वर्ण व्यवस्था थी। जिसमें व्यक्ति के गुण, कर्म, स्वभाव के अनुसार उसका वर्ण निश्चित किया जाता था। मूर्ख और अज्ञानी लोगों ने वर्ण व्यवस्था की वास्तविकता को न समझ कर इसी को जाति के अस्तित्व के रूप में देखा है।
इन नेताओं के जाति के समर्थन में दिए जा रहे वक्तव्य सुनने में तो अच्छे लगते हैं पर वास्तव में यह जहरीले वक्तव्य हैं। देश के संविधान निर्माताओं ने संविधान निर्माण करते समय जाति के आधार पर किसी के साथ भी पक्षपात न हो , ऐसा संकल्प व्यक्त किया था। पर जब देश में जाति के आधार पर आरक्षण की बात आई तो कुछ जातियां ऐसी रहीं, जिनके साथ अन्याय होना आरंभ हो गया। इस जाति आधारित अन्याय ने जहां कुछ लोगों को तथाकथित आधार पर न्याय दिया तो कुछ को अन्याय देना भी आरंभ कर दिया। यह कोई तुक नहीं है कि एक को रोटी देने के लिए दूसरे के हाथ की रोटी छीन ली जाए। अच्छी बात यह होती कि देश में सर्व समाज को ऐसे अवसर उपलब्ध कराए जाते जिससे भोजन, वस्त्र ,आवास के साथ-साथ राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक न्याय प्राप्त करने में सबको सुविधा प्राप्त होती।
इस जातिगत आधारित जनगणना का सबसे दु:खद पक्ष यह है कि अब से आगे हिंदुओं की जाति के आधार पर जूते में दाल बंटेगी। जबकि मुस्लिम समाज को केवल मुस्लिम रहने दिया जाएगा। जाति के आधार पर समाज का विकास होना संभव है तो मुसलमानों में भी 300 से अधिक फिरके हैं, उनको भी इसी प्रकार फिरकों में बांट दिया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है। वोट की राजनीति करते हुए आज के नेता फूट डालो और राज करो कि अंग्रेजों वाली नीति पर काम कर रहे हैं। भारत के प्रमुख समाज अर्थात हिंदू समाज को बताकर यह लोग अपनी राजनीतिक चाशनी उतारना चाहते हैं। इन्हें नहीं पता कि इसका परिणाम क्या होगा ? निश्चित रूप से इसका परिणाम देशघातक होगा। आने वाले समय में आज की जातियां संप्रदाय के रूप में यदि मान्यता स्थापित कर गईं तो इसमें कुछ बुराई नहीं होगी। याद रहे कि कभी भारत वर्ष में महात्मा बुद्ध ने देश के वैदिक समाज में आई कुछ कमियों के विरुद्ध आंदोलन खड़ा करके उसको ठीक करने का प्रयास किया था । उसका परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे बौद्ध समाज ही हमसे अलग अस्तित्व बना गया । इसी प्रकार जैन समाज और सिखों के लिए भी कहा जा सकता है। ये सारे के सारे आंदोलन कालांतर में एक संप्रदाय बन गए। ऐसा तभी होता है जब संप्रदायों को अलग-अलग खड़ा करने की पैरोकारी की जाती है। आज जिन जातियों के नाम पर राजनीतिक लोग अपनी राजनीति कर रहे हैं, जब ये अलग-अलग संप्रदायों के रूप में दिखाई देंगी तो हिंदू समाज की शक्ति कमजोर होगी और इसका लाभ उन देशद्रोही शक्तियों को प्राप्त होगा जो संप्रदाय के आधार पर पहले ही देश का एक विभाजन करा चुकी हैं। तब हिंदू समाज जातियों में बंटा हुआ रह जाएगा और शत्रु फिर अपना काम कर जाएगा।
हम यह स्वीकार करते हैं कि हमारे देश में जाति के आधार पर कुछ लोगों का शोषण किया गया है ,पर जिन लोगों ने उस समय शोषण किया था या कहीं-कहीं आज भी कर रहे हैं, अब उनका शोषण करते हुए प्रतिशोधात्मक दृष्टिकोण अपनाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। प्रतिशोध से जहर बढ़ता है जबकि प्रतिबोध से जहर को बुझाया जा सकता है। अच्छी बात यही होगी कि प्रतिबोध के आधार पर हम एक दूसरे का सम्मान करना सीखें और एक दूसरे के अधिकारों को अभिस्वीकृति प्रदान करने का साहस दिखाएं। देश के राजनीतिक लोग देश के राष्ट्रीय समाज को बांटने के स्थान पर लोगों के भीतर प्रतिबोध का भाव उत्पन्न करें तो वास्तव में उन्हें नेता और राजनेता कहा जा सकेगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं। )

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