हिंदू-राष्ट्रध्वज के भाष्यकार सावरकर

सावरकर निर्मित अभिनव हिंदू ध्वज अखिल हिंदू जाति का हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति का प्रतीक है। हिंदुओं में किसी को भी वह आपत्ति जनक नहीं होगा। इतना ही नहीं बल्कि समस्त मानव समाज का परम श्रेय व्यक्त कर सकेगा ऐसा वह उदात्त, भव्य और दिव्य है।
कैसे यह देखिये जो समाज धारण करता है वह धर्म। ऐसे धर्म से दो बातें साध्य की जाती हैं-अभ्युदय और नि:श्रेयस (आत्मकल्याण) इन दोनों के चिन्ह इस ध्वज पर अंकित हैं।
परमेश्वर का साक्षात्कार, आत्मा का परमात्मा से मिलन अथवा आत्मा से ही परमात्मा पद को पहुंचाना यह हिंदू धर्म की विशेषताा है। शक्ति का शिव से जो संयोग होता है उसे ही योग कहते हैं। समस्त संसार को दिव्य संदेश देने के लिए हिंदू धर्म में एक ही सुयोग्य शब्द है-योग। योग का प्रमुख प्रतीक है कुण्डलिनी। इसीलिए अपने धर्म तथा संस्कृति का प्रमुख ध्येय जो नि:श्रेयस अर्थात आत्मकल्याण वह सुव्यक्त हो, इस हेतु सावरकर जी ने ध्वज पर कुण्डलिनी अंकित की। कुण्डलिनी किसी जाति विशेष या वर्ण विशेष की संपत्तिा नहीं है। वह समस्त मनुष्य मात्र में है। अपनी रीढ़ की हड्डी को मेरूदण्ड कहते हैं। उसकी दोनों ओर, ज्ञानतंतुओं से बनी दो नाडिय़ां होती हैं। एक का नाम इडा और दूसरी का पिंगला। मेरूदण्ड में अंग्रेजी आठ (8) के आकार की लडिय़ों की माला है। उसमें से एक तीसरी नाड़ी जाती है। उसका नाम सुषुम्ना। इडा और पिंगला नाडिय़ों से अपने ज्ञानतंतुओं के उपकेन्द्र संबद्घ हुए हैं। उन्हें योग की भाषा में कमल कहते हैं। मूलाधार से सहस्रार तक सात प्रमुख कमल हैं।
मूलाधार चक्र में बसने वाली सुप्त शक्ति की कुण्डलिनी होती है। वह योग ध्यान से जाग्रत होती है और मूलाधार से ऊपर-ऊपर चढक़र अंतिम सहस्रार केन्द्र में पहुंचती है। वह वहां पहुंचने पर, साधक को एक अलौकिक अतीन्द्रिय अननुभूत आनंद की अनुभूति होती है। इस आनंद को भिन्न भिन्न पंथ भिन्न भिन्न नाम देते हैं। योगी इसे कैवल्यानंद कहते हैं वज्रयानी महासुख कहते हैं, अद्वैती ब्रहानंद कहते हैं, भक्त उसे प्रेमानंद कहते हैं, जबकि नास्तिक उसे परमानंद कहेंगे। जिस प्रकार पानी को जल, उदक, नीर, वॉटर कुछद भी कहो उससे प्यास बुझती ही है, उसी प्रकार जब कुण्डलिनी जाग्रत होती हो तो केवल आनंद ही प्राप्त होता है, फिर वह मनुष्य हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई कोई भी हो। इसलिए हिंदू धर्म का प्रमुख और महान ध्येय जो नि:श्रेयस उसका उत्तम प्रतीक है कुण्डलिनी। कारण वह हर मनुष्य को बुद्घिगम्य है और हर कोई उसका अनुभव कर सकता है। पलभर पारलौकिक कल्पना बाजू रखी जाए तब भी, हिंदुओं ने संसार को जो अनमोल उपहार दिये हैं उनमें सर्वोत्तम है योगशास्त्र। योगशास्त्र के संबंध में मतभेद के लिए कोई स्थान नहीं है। कारण, भौतिक परिभाषा में तथा भौतिक परिमाण में व्यक्त किया जा सकने वाला वह अनुभावानात्मक और त्यागात्मक शास्त्र है। विश्व संस्कृति में हिंदुओं ने जो अमूल्य योगदान दिया है वह है योगशास्त्र और उसका प्रतीक है कुण्डलिनी। वह मानव मात्र की है, भले वह हिंदू हो या अहिंदू, आस्तिक हो या नास्तिक, गृहस्थ हो या वनस्थ। इस ध्वज पर अंकित ओउमकार का बहुत महत्व है। वेद का प्रारंभ ओउम से ही हुआ है। तस्य वाचक: प्रणव: इस योग सूत्र में प्रणव शब्द ओउम अर्थात ईश्वर वाचक है। ओउम मणिपदमे हुम इस बौद्घ मंत्र में भी ओउम का समावेश है। ओउम भी गुरू प्रसादी ऐसा सिख भी कहते हैं। जैनों को भी ओउम पूज्य है। अत: सारे हिंदुओं को ओउमकार समान रूप में पूज्य है तथा स्वीकार्य है। इस प्रकार नि:श्रेयस अर्थात आत्मकल्याण यह जो हिंदू धर्म तथा हिंदू जाति का पारलौकिक ध्येय है वह व्यक्त करने के लिए सावरकरजी ने ध्वज पर कुण्डलिनी और ओउम ये चिन्ह अंकित किये।
उसके पश्चात धर्म का जो दूसरा साध्य अभ्युदय (अर्थात लौकिक उत्कर्ष) वह व्यक्त करने के लिए उन्होंने कृपाणु यह चिन्ह ध्वज पर अंकित किया। धर्म के पीछे कृपाण का अर्थात शस्त्र का संरक्षक सामथ्र्य होता है, इसलिए धर्म सुरक्षित रहता है। मध्य काल में हिंदू जाति की अवनति होने का कारण यही था। अभ्युदय कारक शस्त्र शक्ति की ओर हिंदू जाति ने ध्यान नहीं दिया था। अभ्युदय और नि:श्रेयस अर्थात भक्ति और मुक्ति ये धर्म के दौ पैर हैं। किंतु दुर्भाग्य से अभ्युदय की, और वह जिन साधनों से साध्य होता है उन साधनों की हिंदू जाति ने उपेक्षाा की। परिणाम स्वरूप धर्म का एक पैर पंगु बना और समाज की ऐहिक अर्थात सांसारिक धारणा करने में धर्म उतना असमर्थ बना। भविष्य में वह भूल कभी नहीं होनी चाहिए। शक्ति से राज्य मिलते हैं ऐसा समर्थ रामदास भी कहते हैं। वह शक्ति वह सांसारिक अभ्युदय लाने वाला खड्ग हिंदुओं के हाथ से कभी ढलना नहीं चाहिए। कृपाण और कुण्डलिनी, भुक्ति और मुक्ति, शक्ति और शांति, भोग और योग, अभ्युदय और नि:श्रेयस ये दोनों चाहिए। हमें ज्ञानयोग की वह कुण्डलिनी और कर्मयोग का कृपाण भी चाहिए। अकेला योगेश्वर कृष्ण नहीं अकेला धनुर्धारी अर्जुन नहीं, हमें तो दोनों चाहिए। यत्र योगेश्वर कृष्ण यत्र पार्थों धनुर्धर: वहीं श्री, विजय शाश्वत ऐश्वर्य तथा नीति वास करती है। परित्राणार्थ साधुओं के दुष्टïों के नाशनार्थ भी शस्त्र अवश्य चाहिए।
किंतु इस कृपाण से इस शक्ति से प्राप्त होने वाला राज्य अनीति से कलंकित न हो, भ्रष्टïाचार से दूषित नहो इसलिए ईशावास्यम इदं सर्वयत किं च जगत्यां जगत। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: यह नीति का सार सूत्र हमारे सम्मुख सदैव रहेे और इसलिए हिंदू ध्वज का रंग भगवा गेरूआ है। यह है त्याग और साधुत्व का रंग। जोन हो उसे पाना यहै योग और जो पाया हो उसकी रक्षाा करना यह है क्षेम। किंतु योग और क्षेम न हो तो त्याग कैसे होगा? अत: योग क्षेम के लिए भी कृपाण होना ही चाहिए।

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