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भारतीय संस्कृति

भारतीय संस्कृति और कला–कु. कीर्ति शर्मा

किसी भी देश की संस्कृति उसकी आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा कलात्मक उपलब्धियों की प्रतीक होती है। यह संस्कृति उस संपूर्ण देश के मानसिक विकास को सूचित करती है। किसी देश का सम्मान उस देश की संस्कृति पर ही निर्भर करता है। संस्कृति का रूप देश तथा काल की परिस्थितियों के अनुसार ढलता है। भारतीय संस्कृति का विकास लगभग पांच सहस्र वर्षों में हुआ और इस संस्कृति ने विविध क्षेत्रों में इतना उच्च विकास किया कि संसार आज भारतीय संस्कृति के विविध क्षेत्रों से प्रेरणा ग्रहण करता है। संस्कृति का यह रचनाक्रम भूत, वर्तमान तथा भविष्य मेें निरंतर संचरित होता रहता है।
मानव संस्कृति में कलात्मक तथा आध्यात्मिक विकास का उतना ही महत्व है जितना वैज्ञानिक उपलब्धियों का। कलात्मक, विकास में मुख्यत:  साहित्य, कला अथवा शिल्प, स्थायत्य, संगीत मूर्ति, नृत्य एवं नाटक का विशेष महत्व है। अत: किसी देश की संस्कृति का अध्ययन करने के लिए उस देश की कलाओं का ज्ञान परम आवश्यक है। कला के द्वारा ही देश के समाज दर्शन तथा विज्ञान की छवि प्रतिम्बित हो जाती है। दर्शन यदि मन की क्रिया है, तो विज्ञान शरीर की क्रिया है परंतु कला आत्मा की वह क्रिया है जिसमें मन तथा शरीर दोनों की अनुभूति निहित है। अत: कला मानव संस्कृति का प्राण है। जिसमें देश तथा काल की आत्मा मुखरित होती है।
कला संस्कृति का वह महत्वपूर्ण अंग है जो मानव मन को प्रांजल सुंदर तथाा व्यवस्थित बनाता है। यही कला प्राचीनकाल से भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहरों को अपने में समाविष्टï किये हुए है। यह भारतीय धर्म, दर्शन व संस्कारों का प्रतिबिम्ब है। यह बिम्ब आज या कल से नहीं अपितु प्रागैतिहासिक काल से दृष्टिïगोचर होता है। जब मनुष्य अपनी प्रारंभिक अवस्था में खानाबदोस्त रूप में जीवनयापन कर रहा था। उस समय के उस द्वारा बनाये अनेक चित्र प्राप्त होते हैं जिनसे हमारी धार्मिक मान्यताओं व कलात्मक प्रवृतियों का ज्ञान प्राप्त होता है। वैसे यदि देखा जाए तो प्रारंभ से ही भारतीय संस्कृति में कला के दो रूप प्रचलित हैं।
1 शास्त्रीय कला 2 लोककला
जब निश्चित सिद्घांतों व उच्च आदर्शों को लेकर कला निर्मित की जाती है तो वह शास्त्रीय कला कहलाती है। भारतीय कला में आचार्य वात्स्यायन के कामसूत्र में चित्रकला के छह अंगों के सिद्घांतों का विवरण है जिसको आधार मानकर भारतीय चित्रकला एवं मूर्तिकला का रूप विकसित हुआ। अजंता बाघ व एलोरा आदि गुफाओं में चित्रित चित्र भारतीय शास्त्रीय कला के उत्तम उदाहरण हैं। अजंता के चित्रों में षडंग के छह सिद्घांतों को ध्यान में रखते हुए भाव व लावण्य से युक्त बौद्घ चित्रों का सुंदर निरूपण हुआ है जिसको ख्याति आज भी संपूर्ण विश्व में फेेली हुई है। इन कलाओं ने भारतीय संस्कृति के धार्मिक प्राचरक के रूप में भी कार्य किया है जैसे अजंता की गुफा के चित्रों की गुफाएं ये तीनों धर्मों की पावन त्रिवेणी के रूप में विख्यात हैं।
शास्त्रीयकला के उत्तम उदाहरण भारतीय संस्कृति में मूर्तिकला व वास्तुकला के रूप में भारत की अमूल्य धरोहर के रूप में विद्यमान है।
जिसका उत्तम उदाहरण मौर्यकालीन कला है जिससे निर्मित सारनाथ का सिंह स्तंभ आज राष्टï्रीय प्रतीक के रूप में विद्यमान है। इसके अतिरक्त कुषाण कला, भरहूत के स्तूप, विभिन्न भारतीय संस्कृति के उत्तम प्रमाण के रूप में हैं। खजुराहो के मंदिर का मूर्तिशिल्प व एलिफैंटा गुफा मंदिर व मुगलकाल में बने भवन (ताजमहल, लालकिला) आदि विश्व को अपनी ओर आकर्षित करते हंैं और साथ ही भारतीय शास्त्रीय कला के अद्भुत रूप का बखान करते हैं।
इसी के साथ शास्त्रीय कला से भिन्न प्रत्येक भारतवासी के हृदय में छिपी लोककला मनुष्य के विकास के साथ आगे बढ़ी। क्योंकि दैनिक जीवन में व्याप्त परंपरागत रूप की कला की लोककला कहा जाता है। लोककला में परंपरागत रूपों, रीति रिवाजों व धार्मिक विश्वासों को महत्व दिया जाता है। जो प्रागैतिहासिक काल के समाज से प्रारंभ होकर आज भी हमारी ग्रामीण लोक-संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है। यह कला प्रशिक्षित कलाकारों की कला न होकर सामान्य व्यक्तियों की कला होती है। जिसके पीछे परंपरागत अनुकरण निहित हैं। ये लोक कलाएं विभिन्न क्षेत्रों व राज्यों के गांवों व कस्बों में विभिन्न रूप में विकसित होकर भारत को विविध कलाओं व संस्कृतियों का देश बनाती हैं। कालांतर में यह कला जातिगत आचरण से जुडकर लोक जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुकी है। लोक कलाएं जीवन में आनंद, उल्लास व उत्साह का संचार कर रीति रिवाजों को पीढी दर पीढी हस्तांतरित करती हैं तथा सामाजिक जीवन धारा को अखंडरूप में प्रवाहित कर भारतीय संस्कृति के निर्माण में सदैव सहायक रही हैं। हम यह भी कह सकते हं कि भारत की संस्कृति का निर्माण यहां के छोटे छोटे क्षेत्रों में फेेली विभिन्न प्रकार की लोक कलाओं के द्वारा ही होता है।
इस प्रकार निष्कर्ष रूप में यह कह सकते हैं कि रंगों से भरी भारतीय संस्कृति के प्राण यहां की विभिन्न प्रकार की कलाओं में निहित हैं। जो चिरकाल से भारतीय संस्कृति को जीवित रखते हुए उसमें नित्य नवीनता ला रही है। सामान्य मनुष्य से संबंधित होने के कारण ये कलाएं भारत व प्रत्येक भारतीय को विश्व में एक भिन्न स्थान प्रदान कर उसे सदैव गौरवान्वित करती हैं व भविष्य में भी करती रहेंगी।
शोध-छात्रा, ललित कला विभाग, कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरूक्षेत्र
साभार

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