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भारत तो आगे बढ़ रहा है पर संस्कार पीछे छूट रहे हैं

ललित गर्ग

नये बन रहे समाज एवं पारिवारिक संरचना में माता-पिता का जीवन एक त्रासदी एवं समस्याओं का पहाड़ बनता जा रहा है, समाज में बच्चों के द्वारा बुजुर्ग माता-पिता की उपेक्षाओं एवं उनके प्रति बरती जा रही उदासीनता इतनी अधिक बढ़ गयी है कि अदालतों को दखल देना पड़ रहा है। माता-पिता भोजन-पानी, दवाई, जरूरत की चीजों से महरूम ही नहीं हो रहे हैं बल्कि उनके सम्मान की स्थितियां भी नगण्य होती जा रही है। वृद्ध माता-पिता की यह दुर्दशा एक विकराल समस्या के रूप में उभर रही है। सुविधावाद, भौतिकता एवं धन के बढ़ते वर्चस्व के बीच माता-पिता अपने ही बच्चों की प्रताड़ना के शिकार है। ऐसी बढ़ती समस्याओं पर नियंत्रण के लिये अदालतों को न सिर्फ दखल देना पड़ रहा है बल्कि बच्चों को पाबंद करना पड़ रहा है कि वे अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करें और उनको सम्मान दें। मद्रास उच्च न्यायालय का ऐसा ही एक फैसला आज के समाज में खून के रिश्तों पर सवाल खड़ा करने वाला है। न्यायालय ने अपने फैसले में साफ किया है कि बुजुर्ग अभिभावकों की इच्छा पूरी करना बच्चों का दायित्व है। न्यायालय का यह फैसला सिर्फ किसी बच्चे और अभिभावकों के बीच संपत्ति विवाद तक सीमित नहीं है। इसे व्यापक अर्थों में देखने और समझने की जरूरत है। संवेदनशील मानसिकता के निर्माण से समाज का माहौल बदल सकता है।

अदालत चाहती है कि वृद्ध माता-पिता को उदासीनता एवं उपेक्षा से मुक्ति देकर उन्हें सुरक्षा कवच मानने की सोच को विकसित किया जाये ताकि एक आदर्श परिवार की संरचना को जीवंत किया जा सके एवं वृद्धों के स्वास्थ्य, निष्कंटक एवं कुंठारहित जीवन को प्रबंधित किया जा सकता है। वृद्धों को बंधन नहीं, आत्म-गौरव के रूप में स्वीकार करने की अपेक्षा को अदालत ने उजागर कर समाज को जागृत करने का सराहनीय काम किया है।

ऐसा युग जहां रिश्तों की जगह धन हावी होता जा रहा है। इसी कारण वृद्धों को लेकर गंभीर समस्याएं आज पैदा हुई हैं, ये समस्याएं अचानक ही नहीं हुई, बल्कि उपभोक्तावादी संस्कृति तथा महानगरीय अधुनातन बोध के तहत बदलते सामाजिक मूल्यों, नई पीढ़ी की सोच में परिवर्तन आने, महंगाई के बढ़ने और व्यक्ति के अपने बच्चों और पत्नी तक सीमित हो जाने की प्रवृत्ति के कारण खड़ी हुई हैं। चिन्तन का महत्वपूर्ण पक्ष है कि वृद्धों की उपेक्षा के इस गलत प्रवाह को रोके, इसी बात पर अदालत ने अपने फैसले में बल दिया है। क्योंकि सोच के गलत प्रवाह ने न केवल वृद्ध माता-पिता के जीवन को दुश्वार कर दिया है बल्कि आदमी-आदमी के बीच के भावात्मक फासलों को भी बढ़ा दिया है। सवाल यह है कि जो माता-पिता कष्ट सहकर भी अपने बच्चों को अच्छी जिंदगी देने की भरपूर कोशिश करते हैं, उन्हीं मां-बाप के बुजुर्ग होने पर बच्चे उनकी देखभाल से जी क्यों चुराने लगते हैं? बच्चों की नजर मां-बाप की संपत्ति तक ही सीमित होकर क्यों रह जाती है? ऐसी बात नहीं है कि सभी बच्चे अपने मां-बाप की उपेक्षा कर रहे हैं, लेकिन आसपास नजरें घुमाने पर ऐसे मामले हर कहीं नजर आ जाते हैं। जाहिर है ऐसे मामले बढ़ रहे हैं।

वर्तमान युग की बड़ी विडम्बना एवं विसंगति है कि वृद्ध अपने ही घर की दहलीज पर सहमा-सहमा खड़ा है, वृद्धों की उपेक्षा स्वस्थ एवं सुसंस्कृत परिवार परम्परा पर काला दाग बनता जा रहा है। अदालत की यह संवेदनशील सोच है जिससे बच्चों एवं माता-पिता के बीच बढ़ते फासलों को दूर किया जा सकता है, अदालत चाहती है कि ऐसा परिवेश निर्मित हो जिसमें परिवार के वृद्ध हमें कभी बोझ के रूप में दिखाई न दें, हमें यह कभी नहीं सोचना पडे़ कि इनकी उपस्थिति हमारी स्वतंत्रता को बांधित करती है। उन्हें पारिवारिक धारा में बांधकर रखा जाये। लेकिन हम सुविधावादी एकांगी एवं संकीर्ण सोच की तंग गलियों में भटक रहे हैं तभी वृद्ध माता-पिता की आंखों में भविष्य को लेकर भय है, असुरक्षा और दहशत है, दिल में अन्तहीन दर्द है। इन त्रासद एवं डरावनी स्थितियों से वृद्ध माता-पिता को मुक्ति दिलानी होगी। सुधार की संभावना हर समय है। हम पारिवारिक जीवन में वृद्ध माता-पिता को सम्मान दें, इसके लिये सही दिशा में चले, सही सोचें, सही करें। वृद्ध माता-पिता से जुड़े मामलों का बोझ अदालतों में बढ़ना एक गंभीर समस्या है, इसके लिये आज विचारक्रांति ही नहीं, बल्कि व्यक्तिक्रांति एवं परिवार-क्रांति की जरूरत है।

हमारा भारत तो बुजुर्गों को भगवान के रूप में मानता है। इतिहास में अनेकों ऐसे उदाहरण हैं कि माता-पिता की आज्ञा से भगवान श्रीराम जैसे अवतारी पुरुषों ने राजपाट त्याग कर वनों में विचरण किया, मातृ-पितृ भक्त श्रवण कुमार ने अपने अन्धे माता-पिता को काँवड़ में बैठाकर चारधाम की यात्रा कराई। फिर क्यों आधुनिक समाज में वृद्ध माता-पिता और उनकी संतान के बीच दूरियां बढ़ती जा रही है। इस समस्या की शुरुआत तब होती है, जब युवा पीढ़ी अपने बुजुर्गों को उपेक्षा की निगाह से देखने लगती है और उन्हें बुढ़ापे और अकेलेपन से लड़ने के लिए असहाय छोड़ देती है। आज वृद्धों को अकेलापन, परिवार के सदस्यों द्वारा उपेक्षा, तिरस्कार, कटुक्तियां, घर से निकाले जाने का भय या एक छत की तलाश में इधर-उधर भटकने का गम हरदम सालता रहता। इन्हीं स्थितियों से जुड़े मामले न्याय पाने के लिये अदालत की शरण लेते हैं।

माता-पिता की उपेक्षा करने वाले बच्चे यह क्यों नहीं समझते कि उम्र के जिस दौर से उनके माता-पिता गुजर रहे हैं, कल उसका सामना उन्हें भी करना पड़ेगा। विचारणीय सवाल यह है कि क्या न्यायालय का काम बच्चों को मां-बाप की सेवा करने की नसीहत देने का होना चाहिए? जब पानी सिर से ऊपर गुजरने लगता है, तब न्यायालयों को ऐसे मामलों में कड़े निर्णय लेने पड़ते हैं और तीखी टिप्पणी करनी पड़ती है। भारत ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की सोच रखने वाला देश है। ऐसी सोच जिसमें पूरा विश्व एक परिवार है। ऐसे विलक्षण विचार को जन्म देने वाले देश में यदि बच्चे अपने मां-बाप की देखभाल से बचने लगें और उनका अपमान तक करने लगें, तो चिंता होना स्वाभाविक है। एकल परिवारों की वजह से भी यह समस्या बढ़ी है। स्वच्छंद जीवन एवं सुविधावाद ने भी इस समस्या को गहराया है, तभी वृद्ध माता-पिता इतने कुंठित एवं उपेक्षित होते जा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं उनकी सरकार अनेक स्वस्थ एवं आदर्श समाज-निर्माण की योजनाओं को आकार देने में जुटी है, उन्हें वृद्धों को लेकर भी चिन्तन करते हुए वृद्ध-कल्याण योजनाओं को लागू करना चाहिए, ताकि वृद्धों की प्रतिभा, कौशल एवं अनुभवों का नये भारत-सशक्त भारत के निर्माण में समुचित उपयोग हो सके एवं आजादी के अमृतकाल को वास्तविक रूप में अमृतमय बना सके। अपने को समाज एवं परिवार में एक तरह से निष्प्रयोज्य समझे जाने के कारण वृद्ध माता-पिता सर्वाधिक दुःखी रहता है। वृद्ध माता-पिता को इस दुःख और संत्रास से छुटकारा दिलाने के लिये सरकार के द्वारा ठोस प्रयास किये जाने की बहुत आवश्यकता है।

संवेदनशून्य समाज में इन दिनों कई ऐसी घटनाएं भी प्रकाश में आई हैं, जब संपत्ति मोह में वृद्ध माता-पिता की हत्या तक कर दी गई। ऐसे में स्वार्थ का यह नंगा खेल स्वयं अपनों से होता देखकर वृद्ध माता-पिता को किन मानसिक आघातों से गुजरना पड़ता होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता। वृद्धावस्था में माता-पिता मानसिक व्यथा के साथ सिर्फ सहानुभूति की आशा जोहती रह जाती है। बड़े शहरों में ही नहीं अब तो छोटे ग्रामों में भी परिवार से उपेक्षित होने पर बूढ़े-बुजुर्गों को ‘ओल्ड होम्स’ की शरण लेनी पड़ती है। बड़ी संख्या में ‘ओल्ड होम्स’ का होना विकास का नहीं, अभिशाप का प्रतीक है। यह हमारे लिए वास्तव में लज्जा एवं शर्म का विषय है।

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