कांग्रेस और जद (यू) की बिछती शतरंजी चालों के चलते लंगर कसे मोदी को देखकर भागते नितीश

नई दिल्ली। नितीश राजग क्यों छोडऩा चाहते हैं? यह बात आज की तारीख में बड़ी अहम हो गयी है कि इस प्रश्न का उत्तर खोजा जाये। ऊपरी तौर पर वह नरेन्द्र मोदी से खिन्न और उनके जातीय विरोधी नजर आते हैं। लेकिन भीतर ही भीतर उनके दिल में भी एक नई महत्वाकांक्षा जन्म ले चुकी है। 2010 में उन्हें बिहार की जनता ने दुबारा गद्दी सौंपी तो उनके भीतर एक नया नितीश पलने लगा। वह उसे जितना ही शांत करते हैं, उतना ही वह उन्हें बिहार से निकलकर दिल्ली चलने के लिए प्रेरित करता है। यह बात अलग है कि पटना से नई दिल्ली की दूरी तय करना उनके लिए आसान नहीं है। लेकिन वह राजनीति भी क्या जिसने सपने नहीं दिखाये? हर व्यक्ति को सपने लेने का अधिकार है, पर जहां तक नरेन्द्र मोदी और नितीश के सपनों का सवाल है तो इनमें जमीन आसमान का अंतर है। नरेन्द्र मोदी अपने बलबूते सारे विघ्नों को दूर कर भाजपा को बहुमत दिलाकर केन्द्र में सरकार बनाने की दिशा में बढऩा चाहते हैं। जबकि नितीश केन्द्र के लिए गठबंधन की राजनीति को अपना आधार बनाकर चलना चाहते हैं। जाहिर है कि नितीश के मुकाबले नरेन्द्र मोदी अधिक जोखिम लेने को तैयार हैं, पर नितीश राजनीति में गठबंधन की पुरानी परंपरा को अपने लिये आसान समझते हैं। वह कांग्रेस भाजपा से अलग तीसरे मोर्चे की तलाश में है, और यदि कोई स्थिति ऐसी बनी कि कांग्रेस को सत्ता से हटना पड़ा और तीसरा मोर्चा ताकतवर होकर उभरा तो उस समय के लिए अब नरेन्द्र मोदी का जितना तीखा विरोध कर लिया जाएगा उतना ही लाभदायक रहेगा। इस प्रकार वह नरेन्द्र मोदी का विरोध करके मानो ब्याज पर पैसा बांट रहे हैं। कांग्रेस ने भी स्थिति को समझा है और उसने भी राजग के भीतर ही फूट डालकर नरेन्द्र मोदी का जवाब तलाशने की कोशिश की है। इसलिए नितीश को कांग्रेस राष्ट्रपति पद के चुनावों के दृष्टिगत अपने साथ ले आयी है। दोनों की कूटनीति की शतरंजी चालें हैं और भविष्य में ये चालें कुछ गुल खिला सकती हैं।
इस वर्ष के अंत में गुजरात, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश सहित कुछ प्रांतों में चुनाव होने हैं। पर इन चारों राज्यों में भाजपा सत्तारूढ़ है। कांग्रेस राजग को तोड़कर इन राज्यों में भाजपा को पटकनी देना चाहती है। दूसरे कांग्रेस तृणमूल नेता ममता बैनर्जी की रोज रोज की हठ से परेशान आ चुकी है और मुलायम व मायावती पर उसे भरोसा नहीं है। इस प्रकार कांग्रेस की म यानि मनमोहन सिंह के लिए तीन म (मायावती, मुलायम सिंह यादव और ममता) भारी पड़ रही हैं, या पड़ सकती हैं। इसलिए भविष्य के साथी के रूप में नीतीश को साथ लेने में कांग्रेस लाभ देख रही है, लेकिन ये सारी चीजें नरेन्द्र मोदी के लिए खास परेशानी वाली नहीं लगती। वास्तव में नरेन्द्र मोदी के प्रति कांग्रेस और नितीश की यह शतरंजी चाल आक्रामक नहीं बल्कि बचाव की मुद्रा की दीख पड़ती है। ये दोनों ही नरेन्द्र मोदी केवामन से विराट बनते व्यक्तित्व से भयभीत हैं, इसलिए वह भयातुर होकर शोर कर रहे हैं। नीतीश का ये सोचना कि हिंदुत्ववादी का प्रधानमंत्री बनना ठीक नहीं है और तत्संबंधी उनकी घोषणा के दो अर्थ हैं। एक तो यह कि वह नरेन्द्र मोदी से खासे भयभीत हैं और दूसरे यह कि धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री के रूप में स्वयं को पेश करना चाहते हैं। यदि वह नरेन्द्र मोदी से भयभीत हैं तो उन्हें रोकने के लिए उन्हें स्वयं को नरेन्द्र मोदी से ऊपर सिद्घ करना होगा और यदि वह स्वयं को धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित करना चाहते हैं तो पहले उन्हें यह बताना होगा और देश की जनता को समझाना होगा कि 85 प्रतिशत हिंदुओं की जनसंख्या वाले इस देश में हिंदुत्व वादी व्यक्ति प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकता? देश की जनता के लिए यह चर्चा खासी रोचक सिद्घ हो सकती है। नरेन्द्र मोदी यह सिद्घ करें कि हिंदुत्ववादी व्यक्ति ही प्रधानमंत्री होना चाहिए और नीतीश कुमार यह सिद्घ करें कि वह नहीं होना चाहिए।
लेकिन आर.एस.एस. के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने लातूर में जब से नितीश से पूछा है कि देश का प्रधानमंत्री हिंदुत्ववादी व्यक्ति क्यों नहीं हो सकता? तब से उनके तेवर ढीले पड़ गये लगते हैं। नितीश मुस्लिमपरस्त राजनीति करते हैं और इसी कारण उन्होंने फतवे के अंदाज में ये कह दिया कि भारत का प्रधानमंत्री धर्मनिरपेक्ष विचार धारा का व्यक्ति होना चाहिए। मानो वह देश की 85 प्रतिशत हिंदू जनता के प्रवक्ता हों। लेकिन उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि देश की जनता अपना प्रवक्ता स्वयं होती है। प्रवक्ता पार्टियों में होते हैं, जनता के नहीं। जनता पांच साल तक केवल देखती है और सुनती है पर बोलती केवल एक बार है। उसका एक बार का बोलना ही जनादेश बन जाता है। नितीश कुमार चाहते हैं कि जयललिता, मुलायम सिंह यादव, नवीन पटनायक और चंद्रबाबू नायडू जैसे लोग उनके साथ जुडें और उन्हें अपना नेता मानें। इनमें से मुलायम सिंह यादव स्वयं महत्वाकांक्षा पाले हुए हैं, और वह प्रधानमंत्री से कम पर इस बार राजी होने वाले नहीं हैं। उत्तर प्रदेश को अपने बेटे के हाथों में सौंपकर अब वह निश्चिंत हैं और अब केन्द्र में प्रधानमंत्री की तैयारी कर रहे हैं। जबकि चंद्रबाबू नायडू की स्थिति अभी हाल ही में आंध्र प्रदेश में हुए उपचुनावों में हम सबने देख ली है। उनकी फजीहत हुई है और वह केवल नितीश के साथ किसी मंच पर भीड़ बढ़ाने के अलावा और किसी काम के नहीं हो सकते। लेकिन नितीश को यह बात ध्यान रखनी होगी कि 1977 में केन्द्र में गठबंधन सरकार जनता पार्टी के नेतृत्व में बनी तो क्या हुआ? 1989 में वी.पी. सिंह ने बनाई तो क्या हुआ? उन्हें कांग्रेस की चाल में नहीं फंसना चाहिए, अपितु केन्द्र में एक दलीय सरकार बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए, अन्यथा कहना पड़ेगा कि वह केन्द्र में सरकार बनाने के लिए अपेक्षित प्रयासों से जी चुरा रहे हैं और नरेन्द्र मोदी परिश्रम के लिए लंगर कस चुके हैं। वह लंगर कसे मोदी से भाग रहे हैं, निश्चित रूप से उन्हें इस समय सिद्घांतों की चिंता नहीं है बल्कि राजनीति के खेल में पिटती अपनी गोटियों की चिंता है।

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betnano
betyap giriş
hititbet giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betnano
betnano
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
casibom giriş
casibom giriş
casibom giriş
jojobet
jojobet
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet