अब तनिक विचार करें पुण्य की महत्ता पर

महाभारत के दो प्रसंग बड़े ही प्रेरणादायक और अनुकरणीय हैं। पहला प्रसंग जब पाण्डुओं ने राजसूय यज्ञ किया था तब उसमें अग्र पूजा भगवान कृष्ण ने की। इस पर शिशुपाल उत्तेजित हो गया। शिशुपाल ने भगवान कृष्ण के लिए अपशब्दों का भी प्रयोग किया। भगवान कृष्ण ने उसे सौ गाली तक तो क्षमा किया किंतु जब शिशुपाल की सौ गाली पूरी हो गयीं तो भगवान कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र उठा लिया और शिशुपाल का वध कर दिया। भगवान कृष्ण ने सुदर्शन चक्र को जिस अंगुली से घुमाया था वह चोटिल हो गयी थी। परिणाम स्वरूप उनकी अंगुली से रक्त बहने लगा था उस चोटिल अंगुली पर पट्टी बांधने के लिए पास खड़े लोग इधर उधर कपड़ा ढूंढऩे लगे। वही द्रोपदी भी खड़ी हुई थी। द्रोपदी ने आव देखा न ताव तत्क्षण उसने अपनी नई साड़ी में से दो अंगुल कपड़ा फाड़कर भगवान कृष्ण की लहूलुहान अंगुली पर कसकर पट्टी बांध दी। भगवान कृष्ण का रूधिर बहना बंद हो गया और उन्हें आराम भी मिला, किंतु द्रोपदी की नई साड़ी का पल्लू फटा देखकर भगवान कृष्ण ने कहा बहन तुमने आज मेरे ऊपर बहुत बड़ा उपकार किया है। वक्त आया तो इस दो अंगुल कपड़े के एक एक धागे का ऋण चुकाऊंगा। कालचक्र की गति बड़ी वक्र होती है, अंतत: वह समय आ गया जब द्रोपदी को दुर्योधन ने भरी सभा में निर्वस्त्र करने का आदेश दिया। दुर्योधन के इस अमानवीय कृत्य और अभद्र व्यवहार से समस्त सभा में सन्नाटा छा गया। द्रोपदी अपनी रक्षा के लिए परिवार के सबसे बड़े मुखिया व वयोवृद्घ भीष्म पितामह के पास पहुंची और अनुनय करती हुई कहती हैं-हे पितामह आप इस सभा में ही श्रेष्ठ नही अपितु कुलश्रेष्ठ हैं। मैं आपकी कुलवधु हूं आज आप मेरे शील और सतीत्व की रक्षा कीजिये। इस पर दुर्योधन ने अट्टहास किया और बड़े ही कटाक्षपूर्ण शब्दों में कहा- नही पितामह यह स्त्री कुलवधु नही अपितु एक वेश्या है। यह एक पुरूष की पत्नी नही अपितु पांच पांच पतियों की पत्नी है। इसे एक से अधिक पुरूषों के साथ रहने में जब शर्म नही आती तो निर्वस्त्र होने में शर्म क्यों आती है? यह एक कुल्टा है, इसका शील और सतीत्व कैसा? द्रोपदी ने पितामह भीष्म से अश्रुपूर्ण नेत्रों से अनुनय विनय किया, किंतु भीष्म पितामह ने नजरें झुका लीं और मुंह मोड़ लिया। इसी प्रकार बारी बारी से उसने गुरू द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, मामा शल्य और ज्येष्ठ पिता श्री महाराज धृतराष्टï्र से यहां तक कि पांचों पांडवों से अपनी लाज की रक्षा करने की हृदय विदारक विनती की, किंतु सब ने मुंह मोड़ लिया। तब भरी सभा में उसने अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान कृष्ण को पुकारा। द्रोपदी की करूणा भरी पुकार सुनकर भगवान कृष्ण तुरंत सभा में प्रकट हुए और द्रोपदी का चीर हरण होने से रोक दिया। यह उसी दो अंगुल कपड़े के पुण्य का प्रताप था। इसलिए द्रोपदी की लाज की रक्षा की। सभी कौरव हतप्रभ रह गये थे। सभा में सन्नाटा छा गया था। सभी की बोलती बंद हो गयी थी।
उपरोक्त घटना घटित होने से पहले की एक किवदंती और भी है। कहते हैं कि हरिद्वार में गंगा के घाट पर एक साधु गंगा में स्नान कर रहा था। गंगाजल का प्रवाह बहुत तेज था। उस तेज प्रवाह में उस साधु की कोपीन (लंगोटी) बह गयी। उसी घाट के समीप कुछ महिलाएं भी गंगा स्नान कर रही थीं। गंगा का जल वेगवान तो था ही साथ ही शीतल बहुत था, वैसे ही सर्दी की ऋतु थी। साधु विस्फारित नेत्रों से घाट की तरफ देख रहा था। शीतल जल में खड़े रहने तथा सर्दी की वजह से उसके दांत से दांत बजने लगे थे। घाट पर खड़ी द्रोपदी की नजर उस साधु पर पड़ गयी। द्रोपदी ने साधु से पूछा बाबा आप इतनी देर से इस शीतल जल में खड़े हैं, न तो आप कोई जाप कर रहे हैं और न ही स्नान कर रहे हैं, आप क्रियाशून्य होकर खड़े हो, आखिर क्या बात है? साधु ने बड़े संकोचवश कहा बेटी! मेरी कोपीन इस जल में बह गई है और मैं निर्वस्त्र हूं जब ये महिलाएं चली जाएंगी तभी मैं जल से निकलूंगा। द्रोपदी ने कहा बाबा यदि ये महिलाएं चली जाएंगी तो दूसरी आ जाएंगी। ठहरो, मैं आप को कपड़ा देती हूं। तत्क्षण ही द्रोपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ा और उस साधु को दे दिया। साधु ने उसे कोपीन के स्थान पर बांध लिया और जल से बाहर निकल कर द्रोपदी के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देता हुआ बोला बेटी जैसे आज तुमने मेरी लाज की रक्षा की है, ऐसे ही भगवान आप की लाज की भी रक्षा करें।
उपरोक्त दोनों प्रसंगों से यह प्रेरणा मिलती है कि पुण्य बेशक छोटा हो, किंतु परमात्मा उसका फल अनंत गुणा करके देता है। इसलिए हमें अपने जीवन में दान पुण्य अवश्य करते रहना चाहिए।
जगद्गुरू शंकराचार्य अपनी प्रसिद्घ पुस्तक विवेक चूड़ामणि में दान-पुण्य के संदर्भ में कहते हैं जब कोई भिखारी आपके द्वार पर भीख मांगने आता है तो वह केवल भीख मांगने ही नही आता अपितु धनवानों को यह चेताने आता है कि दान पुण्य करते रहिए अन्यथा भीख का कटोरा जो आज हमारे हाथ में है। वह कल तुम्हारे हाथ में भी आ सकता है, याद रखो जो पहले कुछ दान पुण्य करके आए हैं वे ही फलते-फूलते नजर आ रहे हैं।
प्रभु कृपा से यदि आपके अंदर कोई ऐसी सामथ्र्य है जिसके कारण आप दान अथवा पुण्य का कार्य कर रहे हैं तो इसके लिए अपने मन में दम्भ अथवा अहंकार का भाव न आने दें और न ही किसी सत्कार्य पुण्य का अमुक व्यक्ति को ताना अथवा उलाहना दें अन्यथा भगवान कृष्ण गीता के दसवें अध्याय के पृष्ठ 707 पर अर्जुन से कहते हैं-हे कौन्तेय मेरी किसी भी विभूति को जो व्यक्ति अपनी मानता है अथवा इस पर अहंकार करता है उसका पुण्य नष्टï हो जाता है पतन हो जाता है और मैं उस विभूति (देन) के दिव्य गुण को वापिस ले लेता हूं। इसीलिए आम कहावत है यदि आपके एक हाथ से कोई दान पुण्य का कार्य हो जाए तो दूसरे हाथ को पता भी नही चलना चाहिए। पुण्य के किये हुए कर्म को ऐसे भूल जाओ जैसे हवन में आहूति डाल कर भूल जाते हैं। इस संदर्भ में हमें प्रकृति से भी यह शिक्षा लेनी चाहिए जैसे बीज पौधे को पैदा कर स्वयं मिट्टी में मिल जाता है और मिट्टी ही बन जाता है। ठीक इसी प्रकार यदि प्रभु कृपा से आपके हाथों से कोई पुण्य का कार्य हो गया है तो अपने अहंकार को मिट्टी में मिला दो और प्रभु के प्रति कृतज्ञता का भाव व्यक्त करते हुए मन ही मन धन्यवाद दो कि प्रभु तेरा लाख लाख शुक्र गुजार हूं, तूने मुझे इस लायक किया जो पुण्य का कार्य मेरे हाथों कराया। यह भाव ही तुम्हें ऊंचा उठाएगा, महान बनाएगा और स्वर्ग में स्थान सुरक्षित कराएगा। इस लोक में तुम्हारे धन और यश में वृद्घि कराएगा।
कैसी विडंबना है इस मानव नाम के प्राणी की? किसी से पूछकर देखो-मरने के बाद आप स्वर्ग में जाना चाहेंगे या नरक में? टोटके सा जवाब मिलता है-नरक में जायें हमारे दुश्मन, हम तो स्वर्ग में जाएंगे। अरे भोले भाई स्वर्ग तो सत्कर्मों से मिलता है, पुण्यों से मिलता है, इसलिए सत्कर्म किया करो, पुण्य किया करो ऐसा कहने पर मानव नाम का प्राणी बहाने पर बहाने बनाता है और तो और प्रभु भजन के लिए भी घड़ी दो घड़ी इसके पास नही, उसके लिए भी बहाने बनाता है। कैसी हास्यास्पद स्थिति है? जाना चाहता है स्वर्ग में और पुण्य करे और? परलोक की मुद्रा तो पुण्य है। इसका संचय करो। बिना पुण्य के स्वर्ग में प्रवेश कैसे मिलेगा? कवि प्रश्न करता है-
स्वर्ग की इच्छा सब करें
पर पुण्य करे कोई और।
बिना मुद्रा परलोक में,
कैसे मिलेंगी ठौर?

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betnano
Hititbet Giriş
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betorder giriş
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet
betgaranti giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betgaranti giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
xslot giriş
xslot giriş
sahabet
sahabet
hititbet
meritbet
bets10
meritbet
bets10
betnano
bets10
bets10
betnano
betnano
atlasbet
atlasbet
betnano