सनातन से वर्तमान का आर्थिक सिंहावलोकन : वैश्विक परिदृश्य के संदर्भ सहित

images (87)

पुस्तक समीक्षा

प्रस्तुत पुस्तक “भारतीय आर्थिक दर्शन एवं पश्चिमी आर्थिक दर्शन में भिन्नत्ता – वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारतीय आर्थिक दर्शन की बढ़ती महत्ता” के लेखक श्री प्रहलाद सबनानी आर्थिक विषयों के महत्वपूर्ण जानकार एवं विश्लेषक के रूप में सामने आए हैं। उन्होंने निरंतर विभिन्न वित्तीय विषयों पर जानकारी पूर्ण आलेख प्रस्तुत किए हैं। उनका गहन अध्ययन एवं विभिन्न आर्थिक विषयों पर चिंतन इस पुस्तक की भूमिका बना है। इस पुस्तक के द्वारा उन्होंने प्राचीन भारत में अर्थशास्त्र की क्या अवधारणा थी उस पर विस्तार से प्रकाश डाला है और उसके साथ ही आज के भारत की सुदृढ़ होती हुई अर्थव्यवस्था के बारे में अपना चिंतन प्रस्तुत किया है।

लेखक ने धर्म आधारित भारतीय आर्थिक दर्शन को प्रस्तुत करने के साथ अर्थ की शुद्धि पर भी अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। जीवन चक्र में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की क्या भूमिका होती है, इस पर उनका आध्यात्मिक चिंतन सामने आता है। प्रकृति के संरक्षण पर उन्होंने जोर दिया है। प्राचीन भारतीय समाज में कुटुंब व्यवस्था बहुत ही सुंदर थी और उस कुटुंब व्यवस्था में अर्थ का व्यवस्थापन बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से होता था इस विषय पर आपने विस्तार से लिखा है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद का उन्होंने विस्तार से अध्ययन किया है और इस विषय पर अपना मूल चिंतन प्रस्तुत करते हुए उन्होंने उस अर्थशास्त्र के महत्व को प्रतिपादित किया है। लेखक मर्यादित सुखोपभोग के पक्षधर हैं और जीवन को संतुष्ट जीवन के रूप में जीना पसंद करते हैं। धर्म आधारित जीवन संरचना किस प्रकार जीवन के आर्थिक पक्ष में प्रविष्ट रहती है यह विश्लेषण अपने आप में उस कालखंड के साथ पाठक को जोड़ता है। श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी के प्राचीन भारतीय आर्थिक दर्शन पर उनके विचार आर्थिक अध्यात्मवाद से पुष्ट हैं। जीवन की आर्थिक समस्याओं पर उस समय के हिंदू चिंतन के विभिन्न सिद्धांतों पर उन्होंने विवेचना की है और उन्हें पाठक को समझ में आने वाली भाषा में प्रस्तुत किया है।

लेखक ने पश्चिम के आर्थिक दर्शन पर अपना चिंतन प्रस्तुत किया है। पश्चिम केवल अर्थ एवं काम पर ध्यान देता है, प्रकृति का शोषण करता है। उनकी जीवनचर्या बिल्कुल भिन्न है तथा खाओ पियो मौज करो वाली प्रकृति किस तरह से अपने आर्थिक जीवन को जीती है उसे दर्शाने का काम पुस्तक में किया गया है। चार्वाक का सूत्र वाक्य ‘ऋण कृत्वा घ्रतम पीवेत’ पश्चिम के जीवन का भी मूल वाक्य है। वहां का जीवन तंत्र ऋण में अपने जीवन के सुख खोजता है। वहां की अर्थव्यवस्था ऋण के जाल में फंसी हुई अर्थव्यवस्था के रूप में सामने आती है। पश्चिम का आर्थिक दर्शन समस्या पैदा करने वाला है। वहां पर संपत्ति में वृद्धि से सुख की प्राप्ति नहीं होती है, अपितु वहां का जीवन दुख से परिपूर्ण हो जाता है, नीरसता से भर जाता है। वहां का जो विकास मॉडल है वह शोषणकारी है। उनके आर्थिक दर्शन में आर्थिक समस्याओं का विकास बहुत तेजी के साथ हो जाता है। इन सारी बातों पर विस्तार से चिंतन परक विवेचना प्रस्तुत की गई है। एक रोजगार विहीन समाज में भौतिकवाद के सिद्धांत का क्या परिणाम आता है उस पर आपका चिंतन महत्वपूर्ण है। पश्चिम में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था विकास की सही अवधारणा को प्रस्तुत नहीं करती है। आज का भारत भी पूंजीवादी दबाव में उलझता जा रहा है। आर्थिक जीवन को खंडित एवं यांत्रिक दृष्टिकोण किस प्रकार प्रभावित करता है यह आपने बताया है। अर्थ के प्रति मानव मन का सूक्ष्म दृष्टिकोण क्या होना चाहिए और स्थूल दृष्टिकोण क्या होना चाहिए, मनुष्य को एक आर्थिक मानव के रूप में किस तरह से जीवन जीना चाहिए, यह सब आपके महत्वपूर्ण विषय है जो इस पुस्तक में शामिल किए गए हैं। लेखक ने भारत के आर्थिक दर्शन को और पश्चिम के आर्थिक दर्शन को पूरी तरह आत्मसात किया है और तत्पश्चात इस पुस्तक को लिखने का काम किया है, इसलिए इस पुस्तक में भारतीय आर्थिक दर्शन एवं पश्चिमी आर्थिक दर्शन में अंतर, भारतीय और पाश्चात्य दर्शन में भिन्नता, एकात्म दर्शन, भारतीय एवं पश्चिमी अर्थ विचार में भिन्नता का प्रभाव, सौ हाथों से संग्रह कर हजार हाथों से बांटो, आर्थिक एवं गैरआर्थिक कारकों को महत्व आदि विषयों पर विस्तार से विचार अभिव्यक्त किए गए हैं।

आज के समय में पूंजीवाद का ढहता किला एवं ध्वस्त होते पश्चिमी आर्थिक सिद्धांत जिस तरह से सामने आ रहे हैं, उनसे भारत का सनातन मजबूत हो रहा है। साम्राज्यवादी देशों द्वारा औपनिवेशिक देशों का भरपूर आर्थिक शोषण किस तरह से किया जा रहा है यह भी इस पुस्तक में बतलाया गया है। पश्चिमी सिद्धांतों का भारत में भी उपयोग किया जा रहा है, लेकिन वह कितने फायदे के हैं और कितने नुकसान के हैं यह तो इस पुस्तक को पढ़ने के बाद ही पता चल सकता है। उदारीकृत मुक्त व्यापार पर लेखक ने खुले दिल से बात की है। पूंजीवाद का ढहता किला किस तरह से विश्व की अर्थव्यवस्था के सामने आ रहा है यह भी इस पुस्तक में शामिल है। आज के समय में साम्यवाद एवं पूंजीवाद पर आधारित आर्थिक विचारधाराएं समाप्ति की ओर अग्रसर होती जा रही है। पूंजीवादी सिद्धांतों का अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बहुत खराब प्रभाव पड़ा है। विनिर्माण इकाइयों का बंद होना, लगातार महंगी होती स्वास्थ्य सेवाएं, विश्व में गरीबों की बढ़ती हुई संख्या, बढ़ती हुई आय की असमानता, बढ़ती हुई बेरोजगारी, विश्व में बढ़ता हुआ उर्जा का खर्च, विश्व के विभिन्न देशों के द्वारा सुरक्षा व्यवस्था पर किया जाने वाला बेतहाशा खर्च, सामाजिक सुरक्षा पर बढ़ता हुआ खर्च का बोझ, लगातार बढ़ता हुआ फेडरल बजट घाटा, अमेरिका के विदेश व्यापार में लगातार बढ़ता हुआ व्यापार घाटा, अमेरिका का बिगड़ता हुआ सामाजिक ताना-बाना और वहां के वित्तीय क्षेत्र की उथल-पुथल इस पुस्तक में पूरे विश्लेषण के साथ प्रस्तुत की गई हैं।

यह पुस्तक आर्थिक विकास के न सिर्फ पश्चिमी मॉडल को प्रस्तुत करती है अपितु नवीन मॉडल का सुझाव भी सामने लेकर आती है। भारत के मॉडल को भी यह पुस्तक प्रस्तुत करती है। आर्थिक विकास आंकने के नए मॉडल से अपेक्षाएं क्या है उन पर विस्तार से बातचीत है। उत्पादों का संयमित उपभोग किस प्रकार किया जाना है, उसे भी बताया गया है। विभिन्न देशों के आपसी संबंध कैसे होना चाहिए उसे भी समझाया गया है। भारत को लेकर लेखक बहुत उत्साह से भरे हुए है। उन्होंने परिवार प्रथा के महत्व को समझाया है, स्वदेशी तकनीक पर जोर दिया है, स्वावलंबी ग्रामीण अर्थव्यवस्था उनके चिंतन का महत्वपूर्ण भाग है। जनशक्ति का पूरा उपयोग और पूंजी का उपयोग किस प्रकार किया जाए इस पर उनका अनूठा चिंतन इस पुस्तक में सामने आया है।

निजी तथा सरकारी क्षेत्र परस्पर पूरक किस तरह से हो सकते हैं यह उन्होंने बताया है। नियोजन में वरीयता क्रम निर्धारण किस प्रकार होना चाहिए, आर्थिक प्रगति आंकने के पैमाने में नागरिकों की प्रसन्नता को भी आंकना चाहिए, भारतीय गृहणियों के घरु कार्य का आकलन कर इसे सकल घरेलू उत्पाद में शामिल किया जाना चाहिए, यह सब उन्होंने विशाल ह्रदय के साथ प्रस्तुत किया है और इस नए चिंतन को नई दृष्टि के साथ देखा जाना बहुत जरूरी है। प्राचीन भारत की आर्थिक व्यवस्था में छुपे हैं विश्व की वर्तमान आर्थिक समस्याओं के हल, इस बात को लेखक ने स्थापित किया है। कहा जा सकता है कि वैश्विक स्तर पर उभर रही समस्याओं के हल हेतु सारा विश्व आज भारत की ओर देख रहा है। आर्थिक विकास को गति देने हेतु नए मॉडल क्या होगा, कृषि एवं ग्रामीण विकास के लिए एक नया मॉडल क्या होगा, ग्रामों के क्लस्टर बनाकर आर्थिक विकास को गति देने सम्बंधी एक नया मॉडल क्या होगा, स्वदेशी जागरण मंच द्वारा सुझाया गया आर्थिक मॉडल क्या होगा, इस पर नए दृष्टिकोण के साथ बातचीत की गई है।

लेखक का यह मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने हेतु भारतीयता के “स्व” को जगाना आवश्यक है। राष्ट्रवाद का भाव जगाकर कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं विकसित अवस्था में पहुंची हैं। कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता देकर आर्थिक विकास को गति दी जा सकती है। कृषि क्षेत्र की समस्याओं का निदान आवश्यक है। कृषि क्षेत्र के विकास हेतु किए जाने योग्य उपाय उपयोग में लाना बहुत जरूरी है। ग्रामों को केंद्र में रखकर आत्म निर्भरता को व्यापक स्वरूप दिया जा सकता है। भारत में सर्व समावेशी विकास से ही तेज आर्थिक प्रगति सम्भव हो सकती है। भारत की आत्मा ग्रामों में बसती है अतः देश में ग्रामीण विकास जरूरी है। स्वदेशी को बढ़ावा देना आवश्यक है। स्वावलंबी भारत अभियान को सफल बनाना महत्वपूर्ण है। देश की अर्थव्यवस्था को गति देने हेतु भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देना जरूरी है। श्रम को पूंजी का दर्जा देकर आर्थिक विकास को गति देना सम्भव हो सकता है। आर्थिक प्रगति में शुचितापूर्ण नीतियों का अपनाया जाना जरूरी है। वर्तमान में भारत में आर्थिक विकास एवं अर्थतंत्र को मजबूत करने हेतु लागू की जा रही नवीन योजनाओं का परिणाम क्या सामने आ रहा है इसकी भी चर्चा पुस्तक में है।

आर्थिक चिंतन को भारत के सनातन के साथ जोड़कर उसके आध्यात्मिक पक्ष को प्रस्तुत करते हुए और आज के इस वक्त में उसकी उपादेयता को सामने रखते हुए लेखक ने जो स्थापनाएं इस पुस्तक में की हैं वह आज के समय को नए रूप से देखने की एक दृष्टि है और एक दृष्टिकोण भी है। इसे भारतीय समाज के द्वारा स्वीकार किया जाएगा, ऐसा मेरा पूरा विश्वास है।

श्री प्रहलाद सबनानी को बैंकिंग क्षेत्र का वृहद अनुभव है। आपकी अर्थशास्त्र विषय में गहरी समझ एवं आपका इस विषय पर गहरा अध्ययन इस पुस्तक में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है एवं आपने अर्थशास्त्र से सम्बंधित जटिल विषयों को सामान्य भाषा में सुस्पष्ट विश्लेषण करते हुए प्रस्तुत किया है, जिसे आम नागरिक भी बहुत आसानी से समझ सकते है। पुस्तक को हिंदी भाषा में लिखने के लिए लेखक को साधुवाद क्योंकि भारत में आर्थिक विषयों पर हिंदी भाषा में बहुत कम लिखा जाता है। यह पुस्तक प्रत्येक भारतीय द्वारा पढ़ी जानी चाहिए, इसमें दिए गए विभिन्न विषयों पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए एवं भारत को विश्व गुरु बनाने में अपना योगदान देना चाहिए। अतः यह पुस्तक भारत के नीति निर्धारकों, अर्थशास्त्रियों, व्यवसाईयों, अनुभवी व्यक्तियों, विद्यार्थियों, ग्रहणियों एवं समस्त नागरिकों के लिए उपयोगी साबित होगी।

सतीश राठी
सेवा निवृत्त मुख्य प्रबंधक
भारतीय स्टेट बैंक
आर 451 महालक्ष्मी नगर
इंदौर 452010
मध्य प्रदेश
मोबाइल 94250 67204

Comment:

betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betpark giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
mavibet giriş
mavibet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betorder giriş
mavibet giriş
mavibet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
timebet
timebet
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
realbahis giriş
realbahis giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
vaycasino
vaycasino giriş
gobahis giriş
gobahis giriş
vdcasino giriş
pusulabet giriş
betorder giriş
betorder giriş
ikimisli
ikimisli
ikimisli