अपनी साधना का काफिला सजाये रहो

राकेश कुमार आर्य
जीवन हर सांस के साथ कम होता जा रहा है। पल पल, क्षण-क्षण आयु घटती जा रही है। जीवन पल-पल के साथ बीत रहा है, और हम अपने बहुत से कार्यों को कल-कल करते कल पर टालते चले जा रहे हैं। हम जीवन नदी के प्रवाह के न तो साथ बह रहे हैं और न विपरीत बह रहे हैं, बल्कि हम जीवन नदी के प्रवाह को निकम्मे भाव से खड़े होकर देख रहे हैं, उसे बहने दे रहे हैं, और हाथ से समय को निकलने दे रहे हैं। किसी ने अपमान के दो शब्द कह दिये तो उसकी अकल को ठिकाने लगाने के लिए हम वहीं खड़े हो गये और ये सौगंध उठा ली कि जब तक ये सॉरी नही कहेगा, क्षमायाचना नही करेगा तब तक आगे नही बढूंगा। अपने समय और ऊर्जा का अपव्यय करने के लिए हमने अपनी सारी ताकत इसी बात के लिए झोंक दी कि अपमानित करने वाले व्यक्ति को किस प्रकार सीधा किया जाए?
जीवन नदी बहती गयी, सालों गुजर गये, हमें सफलता नही मिली। कई बसंत जीवन में आये-उन्होंने भी कई बार समझाया कि पतझड़ को छोड़ और आगे बढ़, पर हम थे कि बढ़े ही नही। जितना बाहर निकलने का प्रयास कर रहे थे, उतना ही क्रिया प्रतिक्रिया के भंवरजाल में फंसते चले गये। आंखें खुलीं तो पता चला कि जीवन नदी में हमारे साथ-साथ चलने वाला एक तिनका भी अपनी मंजिल पर पहुंच गया है और हम खड़े ही रह गये। मूंछों की लड़ाई लडते रह गये। तब कहीं से आवाज आयी-
हम फूल चुनने आये थे बागे हयात में।
दामन को खार-जार में उलझा के रह गये।।
हमने जीवन को प्रवाहमान नदिया नही बनने दिया। अपनी गलतियों को और दूसरों की गलतियों को इस प्रवाहमान नदिया में बहने नही दिया। हम उन्हें जाल फैलाकर मछलियों की तरह पकड़-पकड़ कर इकट्ठा करने लगे। हमने एक दूसरे की गलतियों को पकड़कर मछलियों का ढेर लगा लिया। इतना बड़ा ढेर कि अब उठाये से भी नही उठता। ये मछलियां भी ऐसी हैं कि इनका हमें चाहकर भी खरीदार नही मिलता। इसलिए अब सडऩे लगी हैं। हमारी अपनी नाक में ही दम कर दिया है-इनकी सड़ांध ने। जीवन से भागना चाहते हैं, पर भाग नही सकते, क्योंकि अब शरीर ने भी साथ छोड़ दिया है। इंद्रियां बैरागी हो गयी हैं, हमारे साथ नही चलतीं। जिनके साथ-साथ हम जीवन भर भागते रहे वो ही अब अपनी बेवफाई दिखा रही हैं। अब सोचने लगे कि कुछ किया जाए, ईश्वर भजन किया जाए। कुछ यत्न किया जाए कि जीवन सफल हो जाए।
जीवन निकल गया तो जीने का ढंग आया।
शमां बुझ गयी तो महफिल में रंग आया।।
प्रसंगवश एक कहानी याद आ रही है। किसी जमाने में एक सुंदर सी नगरी पर एक राजा राज करता था। राजा बड़ा कंजूस था। इतना कंजूस कि राजा होकर भी अपने बेटे तक को भी जेब खर्चा नही दिया करता था, और अपनी विवाह योग्य बेटी का विवाह भी नही कर रहा था, कि कहीं धन खर्च ना हो जाए।
इसी राजा की नगरी में एक बार एक नट और नटनी अपनी कला दिखाने के लिए आ गये। उन्होंने राजा के दरबार में अपनी अर्जी पहुंचवा दी कि राजा कृपादृष्टिï करके हमारी कलायें देख लें।
समय बीतता गया। राजा ने नट और नटनी को कोई जवाब उनके पत्र का नही दिया। नट और नटनी बड़े दुखी थे। उन्होंने ऐसा व्यवहार अब से पूर्व किसी राजा का नही देखा था। अंत में उन्होंने राजा के मंत्री के लिए एक अंतिम पत्र लिखा और कहा कि या तो आप हमारी कलायें देख लें, नही तो हम बिना कला दिखाई ही यहां से प्रस्थान कर जाएंगे। तब मंत्री ने राजा को समझाया कि यदि कलायें बिना देखे ही हमने नट और नटनी को जाने दिया तो बड़े अपमान को झेलना होगा। दूसरे राजाओं के यहां भी ये जाकर कहेंगे तो हमको नाहक ही अपयश का भागी बनना पड़ेगा। इसलिए महाराज आप चाहें कुछ भी धन इस नट दंपत्ति को ना दें, हम दे लेंगे, पर इन लोगों की कला अवश्य देख लें। राजा ने मंत्री की बात को सुनकर अपनी सहमति दे दी। कलाओं के प्रदर्शन का समय दे दिया गया। नियत समय पर कलायें आरंभ हुईं। राजा को तो कुछ धन देना नही था। इसलिए राजा ने नट और नटनी को कोई दान नही दिया। सारी रात कलायें चलती रहीं।
जब थोड़ी सी रात रह गयी तो नटनी का नाचते गाते शरीर थक गया, वह निराश हो उठी, तो उसने नट को समझाते हुए कहा-
रात गयी थोड़ी रही थाके पिंजर आय।
कह नटनी सुनि मालदेव माधुरी राग बजाए।
नटनी कहने लगी रे नट अब मध्यम राग बजा, क्यों शरीर को कष्टï दे रहा है? यहां कुछ नही मिलने वाला। नट समझदार था वह नटनी की निराशा को समझ गया। तब उसने उसकी निराशा को भंग करते हुए कहा-
सारी गयी थोड़ी रही ये भी बीती जाए।
कह नट सुन री नायिका ताल में भंग न आय।।
नट कहने लगा कि जब सारी रात ही समां बंधा रहा तो अब थोड़ी देर के लिए रंग में भंग क्यों करती है? लोगों पर जो रंग जम चुका है, उसे फीका मत कर, मंजिल के निकट जाकर निराशा के पराजित भाव पैदा मत कर। थोड़ी प्रतीक्षा कर सब ठीक हो जाएगा।
नट की बात को सुनकर सभा में बैठे एक साधु ने तुरंत अपना कंबल उसे दान में फेंक दिया। उसके बाद राजा के लड़के ने अपने हीरे की अंगूठी उसे दान में दे दी और राजा की बेटी ने अपना हीरे का हार ही नट को दान कर दिया।
राजा हैरान होकर सब देख रहा था। उसने सर्वप्रथम साधु से पूछ लिया कि तुमने अपना कंबल नट को क्यों भेंट कर दिया? यही सवाल उसने अपने बेटे और बेटी से किया। तब साधु ने उसे बताया कि महाराज मुझे आपके महलों को देखकर आपसे ईष्र्या हो रही थी। मैं अपनी साधना को ही भूल गया था। पर नट की बात को समझकर मुझे लगा कि अब तो साधना थोड़े ही समय की रह गयी है। इसलिए थोड़ी देर और इसी में लगा रह, प्रतीक्षा कर, अच्छा ही परिणाम मिलेगा।
राजा के लड़के ने राजा से कहा कि पिताश्री आप मुझे मेरा जेब खर्च भी नही देते, इसलिए मैं आपके प्रति हिंसा के भावों से भरा रहता था। आपकी हत्या करके राज हड़पने का प्रयास कर रहा था।
नट की बात सुनकर मुझे लगा कि राजा अब अपने आप ही वृद्घ हो गये हैं। इसलिए थोड़ी प्रतीक्षा कर ली जाए तो ना तो पितृ हत्या का दोष लगेगा और ना ही लोक में अपयश का भागी बनना पड़ेगा। राज्य ही मिल जाएगा तो अपनी मर्जी से खर्च किया करूंगा। इसलिए मैंने दान दिया।
तब राजा की बेटी ने कहा पिताश्री आप मेरा विवाह नही कर रहे थे। इसलिए मैंने अपना विवाह मंत्री के बेटे के साथ पक्का कर लिया था, पर जब मैंने नट की बात को समझा तो लगा कि पिताश्री वैसे ही वृद्घ हो गये हैं, इनका अंतिम समय निकट है। कुछ समय में चले जाएंगे तो उस समय अपने आप ही विवाह कर लेंगे। इसलिए मैंने मंत्री के बेटे के साथ भागने का अपना इरादा त्याग दिया और नट की बात को समझकर उसे इस बात के लिए धन्यवाद देते हुए दान दिया कि उसने तो बड़े पते की बात कह दी है।
राजा ने सबके तर्क सुने और गंभीर हो गया उसे भी पता चल गया कि सारी गयी थोड़ी रही का राज क्या है? इसलिए उसने भी निर्णय लिया और अपने बेटे को अपना राज्य सौंप दिया, बेटी का विवाह मंत्री के बेटे के साथ कर दिया। और स्वयं वनों में जाकर साधना करने लगा।
जब हम अपने लक्ष्य के निकट होते हैं तो हमारा धैर्य छलक जाता है। साहस टूट जाता है। हम पराजित मानसिकता के भावों से भर जाते हैं। हमें लगने लगता है कि जैसे सारी जिंदगी की साधना व्यर्थ ही गयी है। हम भूल जाते हैं।
मुतमईन न होना राही करीबे मंजिल पे कभी।
काफिले लुटते हैं अक्सर मंजिल के करीब।।
अपनी साधना के काफिले को सजाये रखो। उस पर सावधान होकर नजर रखो। कही कोई भी मोती गिर ना जाए।
मेरा ये लेख एक ऐसे ही साधनारत जीवन के धनी पूज्य ज्येष्ठ भ्राताश्री एवं उगता भारत के संरक्षक श्री बिजेन्द्र सिंह आर्य के लिए सादर समर्पित है। समस्त उगता भारत परिवार उनके जन्मदिवस की 65वीं वर्षगांठ पर उनके दीर्घायुष्य और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता है।

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betyap giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betgaranti güncel giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
xslot giriş
betpark giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino
vdcasino
vdcasino
vdcasino
hititbet giriş
meritbet
meritbet
kolaybet giriş
betkom giriş
betgaranti giriş
betpark giriş