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भारतीय राजनीति का स्याह चेहरा है गोपाल कांडा

गीतिका शर्मा आत्महत्या मामले में पुलिस से आंख मिचौली करने वाले हरियाणा सरकार के पूर्व गृहराज्य एवं स्थानीय विकास मंत्री गोपाल कांडा ने आखिरकार शाही अंदाज में आत्म समर्पण कर ही दिया। जो तथ्य गीतिका की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आ रहे हैं उससे कांडा के लिए आने वाला समय और परेशानी वाला होने वाला है। रिपोर्ट में उसके साथ संबंधों की पुष्टि ने इस घटना को एक नया मोड़ दे दिया है, जिसके लिए पुलिस कांडा से सैंपल लेगी जिससे स्थिति साफ हो सके। एमडीएलआर एयर लाइंस कंपनी के मालिक कांडा इस समय जेल में हैं, लेकिन उनको घर का भोजन खाने व मिनरल वाटर पीने की छूट है। पुराने समय की कहावत है झगड़े की केवल तीन वजह होती हैं-जर, जोरू और जमीन। हमारे राजनेताओं ने इन तीनों पर एक साथ कब्जा जमा लिया है। वो भी समय था जब जनता नेताओं को देखने व सुनने के लिए घंटों इंतजार किया करती थी और आज नेताओं को भीड़ जुटाने के लिए फिल्मी सितारों और कलाकारों का सहारा लेना पड़ता है। उसकी मूल वजह भी इनके आचरण की गिरावट ही है। व्यक्ति पर प्रभाव केवल मापक नही डालते, केवल शब्दों की जादूगरी से किसी को अपना नही बनाया जा सकता। उसके लिए जरूरी है, कि जो कहा है उस पर खुद अमल करें और अमल हमारे महानुभावों से कोसों दूर है। इनमें होड़ लगी है नीचे गिरने की, घोटाले करने की, चरित्रहनन की, पिछले दिनों दर्जनों उदाहरण प्यारे नेताओं की तरफ से आये जिनमें इनकी रंगरलियों का नंगा रूप जनता ने देखा। इन्हीं में से कांडा भी एक है। हमारे जनप्रतिनिधियों ने नेहरू के जमाने से ही एक बात अपने लिये खोज ली कि व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन अलग है और सार्वजनिक जीवन अलग है। सार्वजनिक जीवन को कभी व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन प्रभावित नही कर सकता। जबकि सार्वजनिक जीवन की बुनियाद व्यक्तिगत जीवन होता है। व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन में कैसा है, यह बात उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इसी बात को हमारे संस्कृति के सूत्रधारों में प्राचीन काल से स्वीकार किया है। चाणक्य ने कहा है कि यथा राजा तथा प्रजा। इस सूक्ति का भावार्थ यही है कि राजा के व्यक्तिगत जीवन का प्रभाव जनता पर पड़ता है। गोपाल कांडा यदि एक प्रदेश के कैविनेट मंत्री हो सकते हैं तो उनके जीवन से बहुत से बच्चे प्रेरणा ले सकते हैं, लेकिन जब ये लोग अश्लील कृत्यों में फंसे हों तो इनका जीवन किसी के लिए आदर्श नही हो सकता। आज कांडा अपने व्यक्तिगत जीवन के कारण मुंह छिपाए घूम रहा है।
यदि व्यक्तिगत जीवन की परछाईं सार्वजनिक जीवन पर न पड़ती तो कांडा को इस प्रकार मुंह छिपाने की आवश्यकता न होती। इसी से साफ जाहिर हो जाता है कि व्यक्तिगत जीवन की पारदर्शिता राजनीति में कितनी आवश्यक है। इसे देखकर साफ पता पड़ रहा है कि गोपाल कांडा आज की राजनीति का एक बदनुमा काला चेहरा है, जिसकी स्याही से सारी राजनीति पर गंदगी की कालिख पुत गयी है।

 

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