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भारतीय संस्कृति

शिक्षा में सिद्ध प्रयोग का साधक

कलकत्ते में पैदा हुए, दिल्ली आई,आई टी से सिविल इंजिनियरिंग मे पढ़ाई की और कुछ दिन तक उत्तर बिहार में रसायन का उद्योग चलाया। लेकिन मन उखड़ा और कुछ अलग करने की धुन लगी तो चले आये मसूरी। पिछले बीस साल से सिद्ध संस्था के माध्यम से मसूरी के आस पास के इलाके में शिक्षा का प्रयोग कर रहे है। इनका नाम है पवन कुमार गुप्ता। आप पूछ सकते हैं कि ये पवन गुप्ता आखिर हैं कौन? पवन गुप्ता ऐसे शिक्षा और समाजशास्त्री है जो शिक्षा को केवल विषय के रूप में नही देखते। बल्कि मानते है कि ”शिक्षा सामाजिक ,राजनैतिक ,आर्थिक और सांस्कृतिक सम्बंधो से घिरी होती है। इसलिए जब तक शिक्षा के व्यापक संदर्भो की तलाश नही होती और उन्हे परिभाषित करके प्रगट नही किया जाता तब तक शिक्षा में किसी मूलभूत परिर्वतन की बात करना बेमानी है। तब तक भारतीय समाज का पश्चिमी आधिपत्य से मुक्त होना भी संभव नही है।”यानि कि शिक्षण को भारतीय परिवेश में ढाले बगैर समाज की समस्याओं और विशेषताओ को देखने समझने की दृष्टि पैदा नही होती। इस दृष्टि के बगैर वर्तमान की आधुनिक व्यवस्थाओं से मुक्ति संभव नही हैं। लेकिन वे कहते है कि यह दृष्टि अचानक नही आती। बचपन से ही बच्चो को वह परिवेश देना पड़ता है जिसमें उसका जिज्ञासु स्वभाव प्रगट हो, उसमें आत्मविश्वास पैदा हो। वे अफसोस पूर्वक कहते हैं कि हमारी परम्परा में शिक्षा का वह परिवेश मौजूद रहा है जिसे मैकालेवादी शिक्षा पद्घति ने ध्वस्त कर दिया। सीधे शब्दो में कहे तो पवन गुप्ता आधुनिक शिक्षा को , उसके ही शब्दो , तर्को और आयामों से चुनौती देने वाले ऐसे व्यक्ति है जो प्रयोगो से आधुनिकता की तमाम मान्यताओं को ध्वस्त कर रहे है। अब बात करते है उनके काम की। 1989 में पवन गुप्ता और उनकी पत्नी अनुराधा जोशी मसूरी चले आये। मसूरी के नजदीक कैम्पटी में ‘ बोधीग्राम’ की स्थापना कर आस पास गाँव में स्कूल चलाना शुरू किया। स्कूल माध्यम था लोगो से संवाद का। दरअसल वे केवल बच्चो के साथ ही नही बल्कि पूरे समूह के साथ प्रयोग कर रहे थे। टिहरी जनपद के जौनपुर अंचल में आस पास के परिवेश के मसध्यम से बच्चो को शिक्षित करना यथार्थ रूप में समझदार बनाने की कोशिशे धीरे-धीरे असरकारी होने लगी। आधुनिक शिक्षा की कमियो , उसके प्रभाव से भारतीय समाज में पैदा हुई हीन भावना और अपने जड़ो के टूटने की बात अक्सर होती है। लेकिन कम लोग जानते है कि आधुनिक शिक्षा का सचांलन सूत्र क्या है और उसका भारतीय समाज पर क्या प्रभाव है। जो इसकी गहरी समझ रखते हैं उनमें पवन गुप्ता भी है। यूँ अधुनिक शिक्षा में रचे -बसे न होने के बवजूद केवल देख- सुनकर उसके प्रभाव में रहने वाले ग्रामीणों को जड़ों की ओर लौटाने या ‘सही’ की पहचान कराने का काम आसान नही था। लेकिन वह होता चला गया। पवन गुप्ता कहते है कि यह इसलिए संभव हुआ क्योकि शिक्षा आधार जरूर था पर क्रेन्द्र मे समाज था। वे बताते है कि स्थानीय सामाजिक व भौगोलिक परिवेश को माध्यम बनाकर भाषा एवं अन्य विषयो की समझ देना एवं ‘क्या सोचना’ की जगह ‘ कैसे सोचना’ की हमारी दृष्टि साफ थी। इसके साथ ही हमने शिक्षा व्यवस्था को राजनैतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जोड़कर देखने की प्रक्रिया अपनायी तो लोगो को बात पकड़ में आयी। लेकिन वे इस बात का दावा नही करते कि लोगो में भारतीयता की पूरी समझ आ गयी है और वे आधुनिकता से बाहर आना चाहते है या उसके लिए प्रयास कर रहे है। क्योकि आधुनिक शिक्षा के सरकारी-गैरसरकारी तंत्र के पास लोगो को लुभाने के संसाधन है। फिर भी हमारी कोशिश जारी है। पिछले बीस वर्षो में अनेक उतार -चढ़ाव देखने को मिल़े। सरकारी- गैरसरकारी दान दाता संस्थाओं की कही – अनकही शर्तो के बीच मानने -न मानने की जद्दोजहद के साथ प्रयोग आगे बढ़ रहा है। पवन गुप्ता 1996 की एक घटना का जिक्र करते हुए बताते है कि विश्व बैंक जैसी दुनिया भर की दान दाता संस्थाए किस तरह अपनी शर्ते मनवाती है और अपनी जरूरतो के हिसाब से योजनाएं संचालित करवाती है। 1996 तक इलाके में ही नही बाहर भी साख बन चुकी थी। यह बात विश्व बैंक के स्थानीय कारिदों को भी पता चली। जिन गाँवो में पीने के पानी की कमी थी उनमें वे पानी की आपूर्ति करना चाहते थे। इसके लिए उन्होने मुझसे प्रोजेक्ट बनाने को कहा। कहने को तो वे कह रहे थे कि सब कुछ ग्रामीणों की जरूरत और सुविधा के हिसाब से होगा। लेकिन उनकी कुछ शर्ते ऐसी थी जिन पर वे समझौता नही कर सकते थे। मैंने उन्हे मना कर दिया। तभी इन संस्थााओ के कारनामो से परिचित हुआ कि कैसे उन्होने पानी को समाज से निकाल कर बाजार में पहुचा दिया। बहरहाल! उसके बाद हमने कौशानी में ‘इकोनॉमिक आर्डर’ पर सप्ताह भर की एक कार्यशाला की। उसी कार्यशाला में समाजवादी नेता किशन पटनायक ने स्वीकार किया की आदमी की आध्यात्मिक जरूरत भी होती है। जिसे गाँधीजी समझते थे। जिसकी आधुनिक शिक्षा अवहेलना करता है। पवन गुप्ता कहते है कि 1996 हमारे लिए महत्वपूर्ण साल रहा। उसी वर्ष प्रख्यात इतिहासकार और दार्शनिक धर्मपाल से मुलाकात हुई। धर्मपाल की मुलाकात ने हमारी दृष्टि बदल दी। भारतीय समाज को देखने की भारतीय दृष्टि पैदा हुई। इसके बाद हमारी यात्रा ने गति पकड़ ली। जिसे आचार्य नागराज शर्मा के ‘मध्यस्थ दर्शन’ से निकली जीवन विघा ने और आगे बढाया। धर्मपाल ने ही पहली बार महात्मा गाँधी के बारे में भी सही समझ दी। सिद्ध से प्रकाशित पुस्तक ‘हमारे जौनपुर के पेड़, पौधे ‘ में शिक्षको के लिए व्यापक मार्गदर्शिका दी गयी है। जिसमें बच्चों से ज्यादा शिक्षको की शिक्षण पद्धति पर जोर है। पवन गुप्ता कहते है ‘प्रत्येक भाषा का अपना विलक्षण और विशिष्ट विचारों का संसार होता है। बच्चा उस समाज का अंग होने के नाते अपनी आयु और क्षमता के अनुसार उन विचारो के संसार को पकड़ता है। ‘इसलिए बच्चो की शिक्षा स्थानीय बोली भाषा में ही बेहतर हो सकती है। साभार

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