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भारतीय संस्कृति

बच्चों का रखें ख्याल

हमारे समाज के अधिकांश लोग गांवों में ही रहते हैं। उनका रहन सहन खान पान आधार व्यवहार आदि प्रकृति के अधिक नजदीक है। किंतु अब पाश्चात्य सभ्यता संस्कृति के प्रभाव से हमारा समाज भी प्रभावित हो रहा है। जबकि, प्रवृत्ति, प्रकृति परिवेश और परिस्थितियां इससे मेल नही खाती हैं। इसलिए अच्छे स्वास्थ्य के लिए अपने देशी खान पान और सरल, सौम्य और शालिन जीवन की जरूरत है। इसी तरह देशी दवा या उपचार ही हमारे स्वास्थ्य को ठीक रखने और बीमार होने पर ठीक करने के लिए अधिक उपर्युक्त है। सदियों से हमारे गांवों की बड़ी बूढ़ी स्त्रियां दादा दादियां या बड़े बुजुर्ग देश काल और परिस्थितियों के अनुसार साधारण जड़ी बूटियों और पेड़ पौधों और यहां तक कि मसालों आदि का भी इस्तेमाल स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए करते रहे हैं। यह आसानी से हमें अपने घर बाहर प्राप्त भी हो जाते हैं। गुर्जर उदय के समझदार पाठक पाठिकाओं के लाभ के लिए हम बुजुर्ग ग्रामीण जानकारों से मिलकर ऐसी उपयोगी जानकारी इकट्ठी करेंगे और आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे। इस अंक में हम बच्चों के लिए ऐसे साधारण नुस्खे लिख रहे हैं जो कम उमर की नई मांओं के लिए बहुत ही उपयोगी है।
बच्चा बिस्तर गिला करे तो क्या करें?
दो ढाई साल तक तो लगभग सभी बच्चे बिस्तर में ही पेशाब करते हैं। किंतु कुछ बच्चे काफी बड़े होने पर भी बिस्तर गीला करते हैं। इनकी बिस्तर गीला करने की आदत छुड़ाने के कुछ सरल उपाय नीचे दिये जा रहे हैं।
1. जो बच्चा बिस्तर पर पेशाब करता हो उसे सोने से पहले पेशाब करवा कर सुलाना चाहिए।
2. बच्चों को जहां तक हो सके सोने से पहले पानी, दूध, चाय, दही लस्सी, कोल्ड ड्रिंक या चावल आदि न दें। यदि देना आवश्यक हो तो थोड़ी थोड़ी देर बाद मात्र थोड़ा थोड़ा दें। एक साथ अधिक न पिलाएं।
3. बच्चों को डराएं धमकाएं नही। उत्तेजना या पेशाब की हालत होने पर जगा दें। सोने से पहले पेशाब करने को कहें। सोते वक्त रात में भी दो एक बार मूत्र त्याग करवाएं। बच्चे को आसानी से पचने वाला अच्छा पौष्टिक खाना खिलाएं। आहार में अंगूर, जामुन, गूलर, छुआरे, तिल और चना आदि दें।
4. पेट में कब्ज व पेट के कीड़े होने से भी बच्चों का मूत्रेन्द्रिय पर कंट्रोल नही हो पाता और वह बिस्तर में ही मूत्र त्याग कर बैठता है। ऐसी हालत में कब्ज और पेट के कीड़ों का इलाज पहले करना चाहिए। प्या या रख पिलासे पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं।
5. छुआरे को एक सप्ताह तक खिलाएं।
6. खाने के बाद एक दो चम्मच शहद पिलाएं।
7. जामुन की गुठली का चूर्ण बना लें। एक चाय के चम्मच जितना चूर्ण फांक कर पानी पिलाएं।
8. कमजोर बच्चे जौ को रात में गरम पानी में भिंगो कर रख दें। सुबह उसमें दूध शक्कर डाल के मंद आंच पर गरम करें। उसमें थोड़ा सा सेंधा नमक डालकर पिलावें। अगर कमजोर बच्चे पुष्ठ न हो तो हमें बतावें।
जब बच्चों के दांत निकले
छोटे बच्चों को जब दांत निकलते हैं तो प्राय: बच्चा चिड़चिड़ा हो जाता है। कभी ज्वर भी हो जाता है। दस्त भी लग जाते हैं। पहलौठी की माएं परेशान हो जाती हैं। दांत जल्द निकल आएं और परेशान कम हो इसके लिए लाहौरी नमक का एक ढेला लेकर उसे पानी में डालकर हाथ से तब तक रगड़कर मलें जब तक वह चिकना न हो जाए। ढेले को इतना छोटा न होने दें जिससे बच्चा उसे सटक सके। उसे बच्चे को खेलने के लिए दे दें। आदतन बच्चा जब मसूढ़ों में अन्य कष्ट भी कम होंगे और भूख भी लगेगी।
1. मसूढ़ों पर यवक्षार या सुहागे की खील शहद में मिलाकर लगाए।
2. शहद से मसूढ़ों की मालिश करें।
3. पिप्पली का चूर्ण शहद में मिलाकर लगाएं।
4. काली तुलसी के पतों का चूर्ण दो रत्ती की मात्रा में अनार के रस के साथ दिन में तीन बार दें।
5. ज्वर होने पर ताजा पिप्पली औरगज पिपली का काढ़ा बनाकर उसमें शहद और मिसरी मिलाकर दें।
6. दस्त लगने पर बेल का गूदा खस के चूर्ण के साथ में मिलाकर दें।
7. बेर और मकोय के पतों को पीसकर सेवन करें। उल्टी, सिरदर्द ठीक हो जाता है।
बच्चों की अस्वस्थता-अतीत का चूर्ण बनाकर रखें। किसी भी प्रकार की अस्वस्थता में एक सक चार रत्ती भर शहद के साथ चटाएं। बच्चों की खांसी, जुकाम, उल्टी दस्त या अन्य रोग में अतीस, काकड़ा सिंगी, नागर मोथा और वच को बराबर मिलाकर चूर्ण बनाकर रख लें। ढाई रत्ती से दस रत्ती की मात्रा में चूर्ण को शहद मिलाकर चटाएं।
खांसी-अदरक और पान का रस बराबर शहद में मिलाकर चटाए। अडूसा (वासा) के रस में मुनक्का पीसकर चटाएं। धनिया (बीज) इन्द्रजौ आदि मिसरी बराबर लेकर चावल के धोवन के साथ में पीसकर दें।
खूनी दस्त-मरोड़ फली और इसबगोल 6-6 ग्राम लेकर एक पाव पानी में पीसकर छानकर पिलाएं। दही का पानी मिसरी डालकर पिलाएं। गोरखमुंडी, मिसरी और सौंफ बराबर मिलाकर चूर्ण बनाकर रख लें। तीन ग्राम चूर्ण ताजे फल के साथ दें। पका हुआ बेल फल (बेल पत्थर) खिलाएं। बेल गिरि पानी में घिसकर दें। छुआरे की गुठली घिसकर चटाएं।
ज्वर में-वंशलोचन मां के दूध में मिलाकर पिलाएं। या गिलोय नीम गिलोय का रस शहद में मिलाकर पिलाएं या छोटी पिपली का चूर्ण शहद में मिलाकर दें।
दूध की उल्टी लगने पर-छोटे इलायची और दालचीनी बराबर मिलाकर चूर्ण शहद में मिलाकर दें। या फिर हींग को पानी में घोलकर पेट पर लेप करें।
मां क्या करें?
1. दूध का बर्तन हर बार दूध बनाने से पहले साफ करें। बोतल को गरम पानी से धो लें। उबाल लें। निप्पल को गरम पानी में नमक मिलाकर उबाल लें। फिर धो लें। यह देख लें कि निप्पल का छेद न छोटा हो और बड़ा हो। यदि बड़ा हुआ तो दूध मुंह से नाक में चला जाएगा। छोटा होगा तो दूध खींचने में बच्चा जोर लगाएगा। तालुए में सूजन आ सकती है।
2. बच्चे को कभी भी लेटकर दूध न पिलाएं। उसके कान में दूध चले जाने से कान में परेशानी हो सकती है।
3. दूध पिलाने के बाद बोतल में दूध बच जाए उसे दोबारा इस्तेमाल न करें। अगर बहुत जरूरी हे तो उबाल कर ही इस्तेमाल करें। दूध में यदि दुर्गंध आने लगे तो उसे बिल्कुल भी न पिलाएं।
4. बच्चा जितना दूध पचा से उतना ही पिलाएं। अगर आपको गुस्सा आ रहा हो तो बच्चे को दूध न पिलाएं।
5. छाती में कफ जमा हो जाने पर या बहुत दस्त या उल्टी होने से यदि बच्चा निस्तेज हो रहा हो तो देर न करें। नजदीक के डॉक्टर के पास ले जाएं।
यदि बच्चा रोता हो
बालक के रोने पर रोने का कारण तलाश करें। बालक को बड़े या फिर तंग कपड़े न पहनाएं। पेशाब करने पर नैपीज बदल दें। बालक के बिस्तर पर कोई नुकीली चीज न रहने दें। ध्यान रखें कि सोते में मां के बाल बच्चे की आंख में तो नही जा रहा है। बच्चे के नाखून बड़े नही होने चाहिए। अनजाने में बच्चा अपनी ही आंख में मार सकता है। कई मोटी तगढ़ी माएं बेसुध होकर सोती हैं। सास को चाहिए कि ऐसी बहू के पास पोते या पोती को न सुलाएं। सोती हुई बेसुध मां अनजाने में बच्चे को दबा सकती है। बालक के सोने की जगह शांत होनी चाहिए। अगर रोते हुए बच्चा पैरों को मले, मल के स्थान को खुजलाए या सोते समय मुंह से लार बहे तो समझना चाहिए कि बच्चे के पेट में कीड़ा है। जीभ पर मैल जमा हो तो कब्ज है। बार बार सिर पटके तो सिर दर्द या सिर की ही कोई बीमारी है। बच्चे को बुखार हो या सांस जल्दी जल्दी ले, सांस लेते समय नथुने फूले और पसली में गढ़ा पड़े तो समझो उसे निमोनिया है।
बच्चे को कोई भी खट्टी चीज खिलाने या पिलाने के कम से कम दो घंटे बाद तक दूध नही पिलाना चाहिए। दूध पिलाने के दो घंटे बाद तक कोई खट्टी चीज खिलाने या पिलाने के कम से कम दो घंटे बाद तक दूध नही पिलाना चाहिए। यदि बच्चे को कब्ज या अजीर्ण हो तो मात्र एक चम्मच कैस्ट्रायल अरण्ड का तेल पिलाने से दूर हो जाएगी। मां जो भी खाती है वही दूध पीने बच्चे के पेट में चला जाता है। इसलिए मां को अरबी या गरिष्ठ बदहजमी करने वाली चीजें नही खानी चाहिए। शहद मिलाकर यदि कैस्ट्रायल दिया जाए तो अन्य कई रोग भी मिट जाते हैं। निमोनिया में आधा कच्चा भुना जायफल, एक भाग चीनी दो भाग सोहागा तवे का फूला हुआ एक रत्ती, सबाके पीसकर मिला लें। एक साल के बच्चे को एक चुटकी सुबह और एक चुटकी शाम को दें। निमोनिया का असर दूर हो जाएगा। बच्चा तंदुरूस्त होने लगेगा।
आशा है उपरोक्त जानकारी से माताओं को अपने बच्चे की देखभाल करने में लाभ पहुंचेगा।

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