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भारतीय संस्कृति

भारतीय समाज में विवाह के अनुशासन की झलक

 भारतीय समाज में विवाह के अनुशासन की झलक ऋग्वेद के यम-यमी सूक्त में मिलती है । 

दम्पति में परस्पर सखा-भाव को प्रधानता है ।
विवाह को नियमों में बाँधे जाने का प्रथम कार्य दीर्घतमस ऋषि द्वारा किया गया था. इसका अगला संस्करण औद्दालकि द्वारा हुआ.
हिन्दू विवाह अग्नि के साक्षित्व , सप्तपदी और ध्रुव-अरुन्धति दर्शन की प्रक्रिया से सम्पन्न होता है ।

सूर्याया वहतुः प्रागात्सविता यमवासृजत् ।
अघासु हन्यन्ते गावोऽर्जुन्योः पर्युह्यते ॥
ऋ.१०.८५.१३
विवाह सम्बन्धी वैदिक मन्त्र में भी अघा>मघा
और अर्जुनी>फाल्गुनी नक्षत्र का कथन है।
मिथिलापति विदेह जनक सीरध्वज भी अयोध्यापति दशरथ से कहते हैं…

मघा हि अद्य महाबाहो तृतीये दिवसे प्रभो ।

फल्गुन्याम् उत्तरे राजन् तस्मिन् वैवाहिकम् कुरु ।
॥बालकाण्ड-७१-२४॥
हे (कानून के जैसे ) लम्बे हाथों वाले प्रभु ! आज मघा नक्षत्र है, तीसरे दिन (परसों) उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र है , उसमें विवाह कार्य सम्पन्न करें।
ဓီयम याम यमी जामि अजामि और अजामिलီဓ
वेदमन्त्रों/ऋचाओं में प्रायः जामि तथा अजामि शब्द साथ-साथ प्रकट होते हैं। उदाहरणार्थ, ऋग्वेदसंहिता १०.१०.१०(यम-यमी सूक्त) एवं अथर्ववेदशौनकशाखासंहिता १८.१.११(पितृमेध सूक्त) –

आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि ।।
{ऋचा के आरम्भ में आये तीन पद आ घा॒ ता इनके विशिष्ट अर्थ हो भी सकते हैं और नहीं भी, इन्हें सामान्य वार्तालाप में सहज प्रयुक्त आरारारा या अरेरेरे के समान भी माना जा सकता है।
इसी प्रकार की ताल अन्य ऋचा ४.५१.७ में भी है – ता घा॒ ता }
इस पद का अर्थ है कि हम उस उत्तर युग में प्रवेश करें जहां जामियों को अजामि बना लिया जाता है । ब्राह्मण ग्रन्थों में जामि का अर्थ पुनरुक्ति/पुनरावृत्ति वाला और अजामि का अर्थ पुनरावृत्ति से रहित किया गया है । दिवा-रात्रि, श्वास-प्रश्वास क्रिया जामि, पुनरावृत्ति वाली कहलाएगी ।
वैदिक ऋचाओं में अजामि को जामि बनाने का भी निर्देश है { जामि व अजामि दोनों को समाप्त करने के भी निर्देश हैं ( ४.४.५, ६.४४.१७) }।
वैदिक निघण्टु में जामयः शब्द का वर्गीकरण अंगुलि नामों में तथा जामि: व जामिवत् शब्दों का वर्गीकरण उदक व पद नामों में किया गया है ।
प्रतीत होता है कि जामि शब्द यम/यामि से निष्पन्न हुआ है । यम/यामि का अभिप्राय दो प्रकार से लिया जा सकता है । पहले प्रकार में यम का अर्थ यम – नियम आदि गुणों के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। दूसरे प्रकार में यम का अर्थ है – संयत करना, नियन्त्रित करना, वश में करना । अतः तदनुसार यम/यामि चेतना पर नियन्त्रण स्थापित करने की स्थिति है । इसके विपरीत अजामि वह स्थिति है जब चेतना पर नियन्त्रण स्थापित करने की आवश्यकता न पडे, सभी प्रक्रियाएं स्वाभाविक रूप से होने लगें ।

      जामि शब्द का एक रहस्योद्घाटन इस तथ्य से होता है कि पुराणों में दक्ष-कन्या व धर्म-पत्नी जामि को यामि/यामी भी कहा गया है । यामि से यदु, ययाति आदि १२ याम देव उत्पन्न होते हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि जामि/यामि यम - नियम की स्थिति है, अपनी चेतना पर नियन्त्रण स्थापित करने की स्थिति है । लेकिन ऋग्वेद १०.१०.१० से संकेत मिलता है कि साधना की उत्तर स्थिति में अपनी चेतना पर से सारा नियन्त्रण हट जाता है , सभी प्रक्रियाएं स्वाभाविक रूप में, स्वतः होनी चाहिये । यह अजामि/अयामि की स्थिति है । 

इस मन्त्र का एक विचित्र आयाम/अर्थ भी है कि भविष्य में ऐसा युग आयेगा जब यमुना(यमी ही यमुना नदी रूप हुई) को जमुना/जमना कहने वाले लोग होंगे और उनमें भाई-बहिन परस्पर विवाह करेंगे। आजकल प्रबुद्ध जन इसे जमनी तहजीब कहते हैं।
भागवत पुराण में अजामिल इसी अजामि स्थिति का लालन-पालन करता है, तब वह वेश्या के, इन्द्रिय भोगों के वशीभूत हो जाता है । उस स्थिति से बचने का एक ही उपाय है – नारायण । नारायण के संदर्भ में कहा गया है कि आपः नारा हैं और जो इन नार: का अयन है, वह नारायण है । आपः व्यक्त आनन्द की स्थिति है । इस आनन्द के स्रोत की खोज करनी है । अजामिल की कथा में नारायण को अजामिल का दश पुत्रों में कनिष्ठतम पुत्र कहा गया है। अजामिल के ९ पुत्र वेश्या से उत्पन्न हुये थे और दसवाँ पत्नी से। यह पुत्र रूप अजामिल की साधना का एक फल हो सकता है ।
कथा संकेत करती है कि सबसे पहले मनुष्य यम – नियम आदि ९ गुणों को अपने व्यक्तित्व में प्रयत्नपूर्वक धारण करे । ये ९ गुण पतञ्जलिमुनि द्वारा निर्दिष्ट सत्य,अहिंसा,अस्तेय,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह,शौच, सन्तोष,स्वाध्याय तथा ईश्वर-प्रणिधान भी हो सकते हैं अथवा अजामिल-कथा में ही निर्दिष्ट तप, ब्रह्मचर्य, शम, दम, त्याग, सत्य, शौच, यम तथा नियम (भा.पु. ६.१.१३) भी हो सकते हैं । इन यम-नियमों अथवा ९ गुणों को अपने व्यक्तित्व में प्रयत्नपूर्वक धारण करना जामि(यम – यामि) कहलाता है परन्तु शनैः – शनैः जब मनुष्य इन यम-नियमों को आत्मसात् कर ले अर्थात् उसका प्रयत्न समाप्त होकर ये गुण मनुष्य में स्वाभाविक रूप से ओतप्रोत हो जाएं तब वह स्थिति ही अजामि कहलाती है ।
✍🏻अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी

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