श्रावणी पर्व : ज्ञान प्राप्ति और स्वास्थ्य रक्षा का स्वर्णिम अवसर है ‘श्रावणी पर्व’

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डॉ डी के गर्ग
भाग-2
श्रावण माह में स्वास्थ्य रक्षा कैसे करें –
१ . आयुर्वेद में उपवास रखना स्वास्थय के लिए जरुरी बताया है।
२ सात्विक भोजन ,शाकाहारी और प्याज ,लहसुन से दूर रहे
३ हरी पत्तेदार सब्जिया ,पत्ता गोभी में कीट होने की सम्भावना होती है। ध्यान रखें
४ दही और कढ़ी , उड़द की दाल ,राजमा ,छोले
५ वर्षा जल अमृत होता है और त्रिदोष नाशक होता है ,वर्षा जल एकत्र कर ले और पी ले।
६ खीर पित्त नशल होती है ,इसलिए सावन में खीर खाये ,इसीलिए हमारे पूर्वजो ने सावन में खीर पार्टी के आयोजन को पुण्य कार्य बताया है।
७ बेलपत्र का सेवन पूरे सावन में रोजाना करें। आयुर्वेद की प्रसिद्द पुस्तक चिकित्सा चंद्रोदय के अनुसार यदि मधुमेह रोगी दो तोला बेल के पत्तो का रस पीये तो मधुमेह समाप्त हो जाता है।
शायद इसीलिए इस माह बेल पत्र की महिमा बतायी है। बेल पत्र चढाने का वास्तविक अर्थ बेल के पत्तो के सेवन है। और आयुर्वेद आचार्य कहते है की केवल इसी माह बेल पत्र में ही ये मेडिसिनल प्रॉपर्टीज मिल सकती है ,बाकी महीनो में नहीं। इसलिए ये अवसर ना छोड़े।
8. सुबह जल्दी सोकर उठे, पानी पी लें और कुंजर क्रिया से बाहर निकाल दे,आपका बढ़ा हुआ पित्त बाहर निकल जायेगा।
9 सुबह का घूमना, व्यायाम बिलकुल ना छोड़े,पसीने आने दे।
10.इस मौसम में स्वस्थ रहने के लिए ईश्वर ने जामुन का फल दिया है,खूब जामुन खाए,लेकिन खाली पेट ना लें।जामुन मधुमेह, चर्म रोग पेट के रोगों में लाभदायक है।इसकी गुठली,पत्ते भी दवाई का काम करते हैं।

श्रावणी पर्व का वास्तविक संदेश-
1 हमारे वैदिक धर्म में स्वाध्याय की प्रधानता और महिमा हमेशा से रही है। ब्रह्मचर्य की समाप्ति पर तथा समावर्तन के समय स्नातक को आचार्य एक उपदेश देता है- “स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ और “स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्‌’ अर्थात्‌ अपने जीवन में कभी भी स्वाध्याय और प्रवचन (सुनने और सुनाने) से प्रमाद (आलस्य) नहीं करना। ये वाक्य केवल ब्रह्मचारी के लिए ही नहीं, अपितु सब मनुष्यों पर लागू हैं।
2 . इस पर्व का नाम श्रावणी होने के कारण यह शब्द, श्रुति व श्रवण शब्दों से जुड़ा हुआ है। श्रुति से श्रवण, श्रवण शब्द श्रावणी बनकर आज का श्रावणी पर्व अस्तित्व में आयें हैं। श्रुति वेद को कहते हैं जिसका एक कारण आरम्भ में ब्रह्मचारियों को वेदों का ज्ञान श्रवण से व सुना कर कराया गया और कराया जाता रहा है। इसका सीधा सम्बन्ध वेदाध्ययन से है।
3. वर्षाऋतु के चार मास के अन्तर्गत विशेषरूप से पारायण यज्ञों का आयोजन किया जाता है।
श्रावणी पर्व के अवसर पर बड़े-बड़े यज्ञ किये जाते हैं जिससे वायुमण्डल सुगन्धित होकर स्वास्थ्य की दृष्टि से हितकर होता है।
– निकामेनिकामे नः पर्जन्यों वर्षतु फलवत्यों नः ओषधयः पच्यन्तां योमक्षेमों नः कल्पताम्।
अर्थात – यजुर्वेद में प्रार्थना है कि यज्ञों का प्रभाव वर्षा पर भी पड़ता है। हम जब-जब चाहें बादल आयें और वर्षा करें। हमारी सारी वनस्पितियां फलों व अमोघ ओषधियों से लदी हों।
इस प्रकार यह विशेष वेदपाठ प्रारम्भ होकर साढ़े चार मास तक नियमपूर्वक बराबर चला जाता था और पौष मास में उसका ‘उत्सर्जन’ (त्याग या समापन) होता था। ‘उत्सर्जन’ भी एक विशेष संस्कार व पर्व के रूप में किया जाता था।
4 वर्तमान रक्षा बन्धन की प्रथा भी इस श्रावणी पूर्णिमा के दिन से कुछ शताब्दियों पहले जोड़ दी गई। रक्षा बन्धन का अर्थ है कि भाईयों द्वारा अपनी बहनों के सम्मान व जीवन की रक्षा का वचन व उसके लिए स्वयं को समर्पित रखना।
यदि हर व्यक्ति इस महान पर्व के मुख्य उद्देश्यों को जान ले और उसे अपने जीवन में पूर्ण करने की भावना को जगा सके तो यह पर्व सफल होगा। हमें इस पर्व के उद्देश्यों को पूरा करने की लिए प्रयास करना चाहिये। तभी इस श्रावणी पर्व मनाना सफल होगा।

पर्व विधि :
१ आर्य पर्व पद्धति में कहा गया है कि आर्य पुरुषों को उचित है कि श्रावणी पर्व के दिन बृहद् हवन और विधिपूर्वक उपाकर्म करके वेद और वैदिक ग्रन्थों के विशेष स्वाध्याय का उपाकर्म करें और उस को यथाशक्ति और यथावकाश नियमपूर्वक चलाते रहें।
हम यहां शतपथ ब्राह्मण के 11/5/7/1 वचन का हिन्दी भावार्थ भी प्रस्तुत कर रहे हैं। इसमें स्वाध्याय की प्रशंसा करते हुए कहा गया है कि स्वाध्याय करने वाला सुख की नींद सोता है, वह युक्तमना होता है, अपनी कायिक, मानसिक व इतर सभी समस्याओं का परम चिकित्सक होता है, स्वाध्याय से इन्द्रियों का संयम और एकाग्रता आती है और प्रज्ञा की अभिवृद्धि होने से विद्या की प्राप्ति होती है।
२ श्रावणी पर्व के दिन यज्ञ करने के साथ पुराने यज्ञोपवीत का त्याग करने व नये यज्ञोपवीत को धारण करने की भी परम्परा है। इसका भी निर्वहन किया जाना चाहिये। यज्ञोपवीत का अपना महत्व है। शिवाजी महाराज ने राज्याभिषेक के अवसर पर यज्ञोपवीत धारण करने के लिए करोड़ों रुपये व्यय किये थे। यज्ञोपवीत के तीन धागे गले में पड़ते ही पितृऋण, देवऋण तथा ऋषि ऋण से जुड़े कर्तव्यों की याद दिलाते हैं। जिस देश में श्रावणी पर्व पर यज्ञोपवीत बदलने व धारण करने की परम्परा होगी तथा जहां वेदों का स्वाध्याय किया जायेगा, वहां मनुष्य अपने तीन ऋणों को स्मरण कर कभी वेद विमुख, नास्तिक व मिथ्या मत-मतान्तरों में नहीं फंसेंगे। अतः श्रावणी पर्व को स्वाध्याय, यज्ञ व यज्ञोपवीत परिवर्तन के साथ व वेदोपदेश आदि का श्रवण करने सहित सत्यार्थप्रकाश के सातवें समुल्लास के अध्ययन का व्रत लेकर मनाया जाना चाहिये।
३ श्रावणी पर्व के आठवें दिन कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है। सुदर्शनचक्रधारी योगेश्वर कृष्ण वैदिक भारतीय संस्कृति के गौरव हैं। श्री कृष्ण जी ने अर्जुन के द्वारा रणभूमि में कौरवपक्ष के प्रमुख योद्धाओं को धराशायी किया था अन्यथा महाभारत युद्ध का परिणाम धर्म में स्थित पाण्डवों के पक्ष में नहीं हो सकता था। योगिराज कृष्ण के गुणों को धारण करें ,गौ पालन करें ,व्यायाम करें ,गौ पलको का सम्मान करें और दूध ,घी के सेवन से स्वास्थय अच्छा करें।
४ वर्षा ऋतु में छायादार ,फलदार पेड़ लगाए,प्रकृति और मानव का हमेशा से साथ रहा है।ऐसे पेड़ भी लगाए जिसके पत्ते पशु खाकर अपनी भूख मिटा सके और जिन पर पक्षी अपना घोंसला बनाकर रहे,उनकी चहचहाट वायुमंडल में गूंजती रहे।

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