Categories
प्रमुख समाचार/संपादकीय

वेद, महर्षि दयानंद और भारतीय संविधान-42

निर्मम कानून निर्मम समाज बनाता है

भारत का संविधान भारत में विधि का शासन स्थापित करता है। विधि को हमने कानून का पर्यायवाची मानकर स्थापित और व्याख्यायित किया है। जबकि कानून से कुछ बढ़कर है विधि। कानून मानवकृत है। विधि मानवकृत होकर भी सृष्टिï के विधायक परमपिता परमेश्वर के सृष्टि विधान का सम्पुंजन है। विधि में भौतिक नियम, उपनियम और मर्यादाएं ही नही हैं, अपितु इसमें अध्यात्म विज्ञान और ब्रहम विज्ञान के वो सूक्ष्म सूत्र भी समाहित हैं जो मानव की भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के हेतु हैं। विधि का निर्माण ईश्वरीय व्यवस्था को समझने के लिए और उस व्यवस्था में स्वयं ढलकर समाज को उस व्यवस्था में सहज रूप से ढालने के लिए किया जाता है। इस लक्ष्य को प्राप्त कराने में वेद सहायक है, इसलिए वेद एक संपूर्ण विधि है। यही कारण है कि बहुत लोगों का विचार है कि वेद सृष्टिï का संविधान है।
आज वेद नाम के संविधान की व्यवस्था को छदम धर्मनिरपेक्षता की छदमवादी अवधारणा डस गयी है। मध्यकालीन इतिहास में जब संप्रदायों का उद्भव हुआ तो उन्होंने सर्वप्रथम यही कार्य किया कि हम वेद को मानव जाति का संविधान नही मानते और ना ही इसे ईश्वरीय वाणी मानते हैं। इसलिए उन्होंने अपने अपने साम्प्रदायिक ग्रंथ तैयार किये और उन सांप्रदायिक ग्रंथों की मान्यताओं और अवधारणाओं को समाज और संसार पर थोपने का अनैतिक और अनुचित कार्य किया। इससे संसार में संप्रदायों के नाम पर बने संविधानों को लेकर भारी रक्तपात हुआ। इन संविधानों में विपरीत लोगों पर अत्याचार करने और उन्हें समूल नष्टï करने की बातें कही गयीं। सदियों तक इन कृत्रिम संविधानों के नाम पर होने वाले युद्घ रक्तपात से संसार थक गया। इसलिए संप्रदाय निरपेक्ष संविधान बनाकर उसके आधार पर शासन संचालन करने की वर्तमान लोकतांत्रिक अवधारणा ने अपना विकास करना आरंभ किया। इस व्याख्या ने संसार को किसी सीमा तक तनावमुक्त और युद्घ मुक्त करने में महत्वपूर्ण योगदान भी दिया, परंतु उतनी सीमा तक सफलता नही मिल पायी, जितनी सफलता की आशा की गयी थी। इस असफलता का कारण रहा कि हमने जब सांप्रदायिक कानूनों को पीछे छोड़कर आगे बढऩे का निर्णय लिया तो उस समय सृष्टि के आदि संविधान वेद और उसकी व्यवस्था पर विचार नही किया गया। उसे एक ओर रख दिया गया। तब तक इस संविधान पर इतनी धूल जम चुकी थी कि साधारण मनुष्य इसे संविधान मानने को भी उद्यत नही था। संसार में महर्षि दयानंद का अतीव उपकार है कि उन्होंने सर्वप्रथम संसार से वेदों की ओर लौटने का आवाहन किया और मानव को बताया कि संसार की सारी समस्याओं का निदान केवल और केवल वैदिक व्यवस्था को स्थापित करने से ही संभव है। भारत के संविधान ने भारत की वेद प्रतिपादित सामासिक संस्कृति को विकसित करने और विश्व शांति की स्थापना करने को अपना लक्ष्य घोषित किया। इसका अभिप्राय था कि अब भारत की शासन व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था को वेद प्रतिपादित व्यवस्था के द्वारा अनुशासित और शांसित किया जाएगा। परंतु ऐसा हुआ नही? वेदों को सांप्रदायिक ग्रंथ मानकर एक ओर रख दिया गया। फलस्वरूप भारत में सामासिक संस्कृति के स्थान पर सांप्रदायिक संस्कृति विकसित होने लगी और विश्व शांति की स्थापना की दिशा में बढऩे का संकल्प लेने वाला भारत स्वयं ही अशांति की लपटों में झुलसने लगा। भारत में विधि का शासन स्थापित न होकर कानून का राज स्थापित हो गया है। कानून के राज में भौतिकवाद बढ़ता है, अध्यात्मवाद विखंडित होता है ब्रहमाविज्ञान चर्चा तक में भी नही आता। आज के भारत की यही विडंबनापूर्ण स्थिति बन चुकी है।
हमने जिस प्रकार के कानूनों से राष्ट्र का संचालन आरंभ किया है वो अंग्रेजों के समय के ही कानून हैं। कानूनों का निर्माण निर्मम शासकों की निर्मम शासन व्यवस्था के लिए किया था। इसलिए इनकी मूल प्रवृत्ति निर्मम है। कानून और विधि में यही सूक्ष्म सा अंतर है। कानून निर्मम बनकर रह गया। जबकि विधि की निर्मल भावना नैतिकता को उपेक्षित कर दिया गया। कानून और विधि में उतना ही अंतर है जितना संप्रदाय और धर्म में अंतर है। जैसे संप्रदाय धर्म की मूल भावना को लील गया उसी प्रकार कानून नीति की मूल भावना को लील गया। विधि नीति का सौंदर्यीकरण कर उसे नये आयामों तक पहुंचाती है, जबकि कानून नीति को परिष्कृत और परिमार्जित करने का प्रयास तो करता है पर वह अपने प्रयास में असफल ही रह जाता है। जैसे संप्रदाय लाख प्रयास करने के उपरांत भी धर्म की स्थापनपा नही कर पाता। उसी प्रकार कानून लाख प्रयास करने पर भी नीति की स्थापना नही कर पाता। यह वर्तमान भारतीय शासन व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना है कि इसने विधि और धर्म के संकीर्ण अर्थों में ग्रहण किया है और इनकी सही परिभाषा या व्याख्या करके इन्हें सही स्वरूप में मान्यता प्रदान नही की है। यदि भारत की शासन व्यवस्था में इन दोनों आधारभूत सत्यों को सही समझ लिया जाए और उन्हें यथोचित स्थान प्रदान कर दिया जाए तो निस्संदेह भारत में वास्तविक लोकतंत्र स्थापित हो जाए। हमारा संविधान इस ओर बढऩा चाहता है, पर उसे कुछ लोगों और राजनीतिक प्रतिष्ठानों के द्वारा रोक दिया जाता है।

कानून की निर्ममता
देश के वर्तमान कानून ने देश को एक निर्मम व्यवस्था दी है। हम थोड़ा सा विचार करें भारत की प्राचीन सामाजिक विधिक मान्यता और वर्तमान कानून के प्राविधानों पर तो स्थिति स्पष्टï हेा जाएगी। हमारी सामाजिक मान्यता रही है कि जब दो भाई अपनी संपत्तिा का बंटवारा करते थे तो बड़ा भाई कुर्रे बनाता था और छोटा भाई छांटता था। माता पिता के प्रति दोनों श्रद्घाभाव से भरे हुए रहते थे, इसलिए उनका हिस्सा संपत्ति में रखकर भी उन्हें उपेक्षित नही किया जाता था। यह समाज की एक विधि थी। आज भी लोग किसी भी समस्या के समाधान को खोजने के लिए एक दूसरे से कहते हैं कि कोई विधि लगाओ ताकि समस्या का समाधान मिले। विधि का अर्थ है कि कोई न्यायसंगत उपाय खोजो और सोचो, जिससे कि पीडि़त पक्ष स्वयं को सम्मानित अनुभव करे और उसे किसी भी प्रकार से आहत न होना पड़े। कोई भी व्यक्ति यह नही कहता कि कोई कानून लगाओ और समस्या का समाधान खोजो।
विधि के अनुसार जब दो भाईयों का बंटवारा उपरोक्त व्यवस्था के अनुकूल होता था तो दो भाईयों में संपत्ति के विभाजन को लेकर अधिक वैमनस्य नही बढ़ता था। थोड़ी बहुत बातें हुई और समाधान हो जाता था। कुछ समय के उपरांत दोनों भाई पुन: एक साथ उठने बैठने व खाने पीने लग जाते थे। परंतु आजकल कानून ने विभाजन के बाद के लिए उत्तर प्रदेश जमींदारी खात्मा कानून एवं भू सुधार अधिनियम की धारा 176/178 की व्यवस्था की है। इस व्यवस्था के अंतर्गत कई कई वर्षों तक दो भाईयों में वाद विवाद चलता है, कटुता बढ़ती है, और वैमनस्य के वातावरण में ही कई वर्ष व्यतीत हो जाते हैं। कई बार ये कई वर्ष 10 से 20 वर्ष तक भी चले जाते हैं।
क्रमश:

Facebook पर जुड़े हमसे
https://www.facebook.com/ugtabharat
यहाँ जाकर आप जैसे ही अपना account खोलेंगे तो आप उगता भारत के पेज पर पाहुच जाएंगे
ताजा लेखो से जुड़े रहने के लिए उगता भारत को लाइक करे ।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
ngsbahis giriş
artemisbet güncel
bettilt giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti
kolaybet giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
betnano güncel giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet
sahabet
sahabet
kolaybet giriş
Kolaybet Giriş
betgaranti giriş
casibom giriş
betgaranti giriş
holiganbet
sahabet
sahabet
onwin
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
holiganbet
onwin
onwin
onwin
grandpashabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
bettilt giriş
Betgaranti
sahabet giriş
sahabet giriş
betgaranti
norabahis giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
tipobet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
Kolaybet Giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
onwin giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
onwin giriş
onwin giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
grandpashabet giriş